ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों का तो कितना-कितना आभार मानें !

सब एक ही चीज चाहते हैं, चाहे हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी हों, इस देश के हों चाहे दूसरे देश के हों, इस जाति के हों या दूसरी जाति के हों ।

गुरु की ऊँचाई व शिष्य की श्रद्धा का संगम : गुरुपूर्णिमा

और सब पूनमें हैं लेकिन यह पूनम गुरुपूनम, बड़ी पूनम है । और उत्सव व पर्व उल्लास, आनंद के लिए मनाये जाते हैं लेकिन यह उत्सव और पर्व आत्मा-परमात्मा की एकता के लिए मनाया जाता है ।

मंत्रदीक्षा

गुरु मंत्रदीक्षा के द्वार शिष्य की सुषुप्त शक्ति को जगाते हैं । दीक्षा का अर्थ है: ‘दी’ अर्थात जो दिया जाय, जो ईश्वरीय प्रसाद देने की योग्यता रखते हैं तथा ‘क्षा’ अर्थात जो पचाया जाय या जो पचाने की योग्यता रखता है ।

आत्ममहिमा में जगानेवाला पर्व : गुरुपूनम

जन्म-जन्मांतर तक भटकानेवाली बुद्धि को बदलकर ऋतम्भरा प्रज्ञा बना दें, रागवाली बुद्धि को हटाकर आत्मरतिवाली बुद्धि पैदा कर दें, ऐसे कोई सद्गुरु मिल जायें तो वे अज्ञान का हरण करके, जन्म-मरण के बंधनों को काटकर तुम्हें स्वरूप में स्थापित कर देते हैं ।

सत्कर्मों का महाफल देनेवाला काल : चतुर्मास

जिसने चतुर्मास में संयम करके अपना साधन-भजन का धन नहीं इकट्ठा किया मानो उसने अपने हाथ से अमृत का घड़ा गिरा दिया। और मासों की अपेक्षा चतुर्मास में बहुत शीघ्रता से आध्यात्मिक उन्नति होती है।

आत्मज्ञानी गुरु से बढ़कर कुछ नहीं

भावार्थ रामायण में आता है कि महर्षि वसिष्ठजी द्वारा रामजी को आत्मज्ञान का उपदेश मिला और वे आत्मानंद में मग्न हो गये । तत्पश्चात् अद्वैत आनंद-प्रदाता सद्गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए श्रीरामजी कहते हैं : ‘‘हे गुरुदेव !

जामुन

जामुन दीपक, पाचक, स्तंभक तथा वर्षा ऋतु में अनेक उदर रोगों में उपयोगी है। जामुन में लोह तत्त्व पर्याप्त मात्रा में होता है अत: पीलिया के रोगियों के लिये जामुन का सेवन हितकारी है ।

वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य-सुरक्षा

ग्रीष्म ऋतु में अत्यधिक दुर्बलता को प्राप्त हुए शरीर को वर्षा ऋतु में धीरे-धीरे बल प्राप्त होने लगता है। आर्द्र (नमीयुक्त) वातावरण जठराग्नि को मंद कर देता है।

5700 अधिक विद्यार्थियों ने शिविर का लाभ लिया ।

‘सर्वभाषाविद्’ हैं भगवान

बोलते हैं : ‘भगवान सर्वभाषाविद् हैं । भगवान सारी भाषाएँ जानते हैं ।’ भाषाएँ तो मनुष्य-समाज ने बनायीं, तो क्या भगवान उनसे सीखने को आये ? नहीं । तो भगवान सर्वभाषाविद् कैसे हुए ?