Books

Jhule LaL Avtar Leela
Jhule LaL Avtar Leela
   

सिंधु सागर का तट है। महापर्व का मेला हो ऐसा लगता है। नगर की हिन्दू जनता विभिन्न मंडल और मंडलियों के साथ वहाँ उमड़ पड़ी है। मेले में आबालवृद्ध हैं, स्त्रियाँ हैं। सभी के अंतर में एक ही तड़प है कि हिन्दू धर्म पर छाये हुए संकट के बादलों से कैसे छुटकारा पायें। सभी के हृदय में मानो एक ही निश्चय मचल रहा है कि 'स्वधर्म की रक्षा में प्राण भी दे दो, पर धर्म न छोड़ो। धर्म छूटा तो सब कुछ छूट गया।" सबके हृदय में इस श्रद्धा ने मानो जड़ जमा लिया है कि प्रत्यक्षदेव दरिया लाल निश्चय दी दया सिंधु हैं, वे ही हमें संकट से पार उतारेंगे। बात लगभग आज से 900 वर्ष पहले की है। वीर यशराज की मृत्यु के दौ सौ वर्ष सिंध का लौहर साम्राज्य विनष्ट हो चुका था। उसकी जगह इस्लामी सल्तनत अपनी जड़ें जमाने लगी थी। उसी समय मकबरखान नामक एक महत्त्वाकांक्षी अहंकारी सरदार ने शाह सादतखान को तलवार के घाट उतार दिया और स्वयं सिंध के सिंहासन पर बैठ गया और मरखशाह के नाम से अपनी धाक जमाने में जुट गया। वर्त्तमान नगरठट्टा नामक नगर उस समय की नगरसमै कही जाने वाली नगरी थी, जो कभी सिंध राज्य की राजधानी..

Previous Article Rishi Prasad
Next Article Baal Sanskar Kaise Chalaye ? (Hindi)
Print
304 Rate this article:
No rating
Please login or register to post comments.