वास्तु सूत्र

वास्तु सूत्र

घर, कारखाना या किसी भी वास्तु का निर्माण कार्य प्रारम्भ करते समय नींव खुदाई ईशान दिशा से ही शुरु करना चाहिए एवं रसोई घर, जनरेटर कक्ष, बॉयलर, बिजली मीटर या मेन स्विच आदि आग्नेय दिशा में ही बनाये जायें।
प्रत्येक मास का प्रथम दिन अग्निस्वरूप होता है। इस दिन अग्नि पूजा अवश्य करनी चाहिए। अग्नि सब प्रकार के गुणों को प्रज्वलित करती है और वास्तु में अग्नि तत्त्व को क्रियाशील करती है। अग्नि की पूजा करने वाला तेजस्वी बनता है।
जप ध्यान आदि के समय दीप प्रज्वलित रखने से जप, ध्यान, साधना सूक्ष्म होकर अधिक प्रभावी होती है।
प्रवेश द्वार के सामने गंदगी या कचरा नहीं होना चाहिए। इससे अनिष्ट शक्तियाँ, कार्बन मोनॉक्साइड, कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन आदि हानिकारक गैसें घर के अन्दर प्रवेश कर वहाँ रहने वालों को कष्ट देती हैं।
घर के अन्दर ईशान – कक्ष के कोने में पीने के पानी का घड़ा या बर्तन पानी भरकर अवश्य रखना चाहिए। सूर्य से निकलने वाली प्राकृतिक परा बैंगनी (Ultra Violet) किरणों की शक्ति से यह पानी शुद्ध व शक्तिशाली बनता है और परिवार के सदस्यों द्वारा इसके पीने से स्वास्थ्य, सुख, समाधान, आनंद तथा सम्पदा का लाभ होता है।
घर के आग्नेय स्थल या कमरे के आग्नेय कोण की जगह पर सोने से चिड़चिड़ापन, क्रोध व वाद-विवाद का स्वभाव बढ़ता है। यह अग्नि का स्थान है।
वास्तु, प्लाट या घर के नैऋत्य भाग में पानी की टंकी, टयूबवेल, कुआँ, मुख्य दरवाजा या कम्पाउन्ड गेट आदि नहीं बनाना चाहिए। इसके होने से अनिष्टकारी घटनाएँ बढ़ती हैं तथा कष्ट, अड़चन, दुःख तथा आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है।
सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय वातावरण में प्राकृतिक चुम्बकीय अदृश्य हितकारी शक्ति अधिक मात्रा में होती है। इसलिए प्रातःकाल एवं सन्ध्याकाल में साफ हवा में गहरी श्वसन क्रिया के साथ भ्रमण एवं सन्ध्या-वन्दन करने से हमारे शरीर में यह शक्ति अधिक मात्रा में आती है और हमें उत्तम स्वास्थ्य देती है।
प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में वातावरण में निसर्ग की शुद्ध एवं शक्तियुक्त ओजोन वायु रहती है। इस समय पर जल्दी उठने व गहरे श्वास लेने से यह प्राकृतिक ओजोन वायु शरीर के अन्दर प्रवेश कर मांसपेशियों को मजबूत व शरीर को स्वस्थ रखती है। पशुओं का राजा सिंह सुबह 3.30 से 5.00 बजे के दौरान अपने बच्चों के साथ उठकर गुफा से बाहर निकलकर साफ हवा में भ्रमण कर आसपास की किसी ऊँची टेकरी पर सूर्य की ओर मुँह करके बैठ जाता है। सूर्य का दर्शन कर शक्तिशाली कोमल किरणों को  अपने शरीर में लेने के पश्चात ही गुफा में वापस आता है। यह उसके बलशाली होने का एक राज है।
वास्तु शास्त्र के नियमों के पालन से शरीर की जीव-रासायनिक क्रिया संतुलित रखने में सहायता मिलती है।
किसी मुख्य इमारत या कारखाने की कम्पाउन्ड वाल के अन्दर चारों तरफ छोटा रास्ता (फुटपाथ) बनाने से घर या कारखाने में होने वाली गुप्त बातें बाहर के व्यक्तियों को पता नहीं लगती हैं।
घर या वास्तु के मुख्य दरवाजे में देहरी (दहलीज) लगाने से अनेक अनिष्टकारी शक्तियाँ प्रवेश नहीं कर पातीं व दूर रहती हैं। प्रतिदिन सुबह मुख्य द्वार के सामने हल्दी, कुमकुम व गोमूत्र मिश्रित गोबर से स्वास्तिक, कलश आदि आकारों से रंगोली बनाकर देहरी एवं रंगोली की पूजा कर परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हे ईश्वर ! मेरे घर व स्वास्थ्य की अनिष्ट शक्तियों से रक्षा करें।' आधुनिक वातावरण में संभव न हो तो गौमूत्र से बनी फिनाइल का उपयोग भी उपयुक्ति फल देता है।
प्रवेश द्वार के ऊपर बाहर की ओर गणपति अथवा हनुमानजी का चित्र लगाना एवं आम, अशोक आदि के पत्ते का तोरण (बंदनवार) बाँधना भी मँगलकारी है।
जिस घर, इमारत, प्लाट आदि के मध्यभाग (ब्रह्मस्थान) में कुआँ या गड्ढा रहता है वहाँ रहने वालों की प्रगति में रुकावट आती है एवं अनेक प्रकार के दुःख एवं कष्टों का सामान करना पड़ता है। अन्त में मुखिया का व कुटुम्ब का नाश ही होता है।
शौचकूप (सेप्टिक टैंक) उत्तर दिशा के मध्य में बनाना सर्वोचित रहता है। यदि वहाँ संभव न हो तो पूर्व के मध्य में बना सकते हैं। परंतु वास्तु के नैऋत्य, ईशान, दक्षिण, ब्रह्मस्थान एवं अग्नि के भाग में सेप्टिक टैंक बिल्कुल नहीं बनाना चाहिए।
फूल मध्यमा एवं अनामिका उँगली के बीच पकड़कर चढ़ाना विशेष शुभ होता है।
दान दक्षिण या पश्चिम की ओर मुँह करके या सिर नीचा करके नहीं देना चाहिए।
तिजोरी में एक कटोरी में 5 हल्दी की गाँठें एवं बिना पिसा (खड़ा) नमक रखें। ऐसा करने से अशुभ शक्तियाँ वहाँ से दूर रहती हैं। जब नमक गीला हो जाय तो वह बदलते रहना आवश्यक है।
वास्तु के कम्पाउन्ड दीवाल के ईशान कोने में कोई भी निर्माण-कार्य या पेड़ आदि न लगाकर वह जगर खाली छोड़ देना या तुलसी वन और स्वच्छ, खुला ध्यान-स्थल रखना ज्यादा हितकर है।
अध्ययन करते समय पूर्व (अथवा उत्तर) की ओर मुँह करके बैठना विद्यार्जन में विशेष लाभकारी रहता है।
अध्ययन करते समय कमर झुकाकर नहीं बैठना चाहिए। सीधे बैठना चाहिए। कमर झुकाकर बैठने से शरीर की कुंडलिनी शक्ति को नीचे से ऊपर जाने में रूकावट पैदा होती है।
उत्तर, पूर्व और ईशान ज्ञान एवं तेजस्विता की दिशाएँ हैं। इन दिशाओं से ज्ञान, तेज, सुख, आनंद, समाधान की स्पन्दन लहरें आती हैं। अतएव अध्ययन, भोजन, पूजा एवं अन्य शुभ कार्य करते समय इन दिशाओं की ओर मुँह रखने से सफलता व प्रसिद्धि की संभावनाओं में बढ़ोतरी होती है।
प्लाट, वास्तु या घर के ईशान कोण में यदि मुख्य बिजली वितरण बोर्ड, मीटर, मेन स्विच आदि हो तो उसे वहाँ से हटवाकर आग्नेय कोण में लगवाना हितकारी है।
प्लाट या मकान के नैऋत्य कोने में बना कुआँ अथवा भूमिगत जल की टंकी सबसे ज्यादा हानिकारक होती है। इसके कारण अकाल मृत्यु, हिंसाचार, अपयश, धन-नाश, खराब, प्रवृत्ति, आत्महत्या, संघर्ष आदि की संभावना बहुत ज्यादा होती है।
कुएँ पर बनी दीवार, तुलसी-वृंदावन एवं जमीन पर बनी पानी की टंकी घर के (फर्श) (प्लींथ लेवल) से ऊँची नहीं होनी चाहिए।
अत्यधिक विद्युत, चुम्बकीय व ऋणात्मक ऊर्जा वाला क्षेत्र आतंकवाद को आमंत्रित करता है।
टेलिफोन हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा में रखना चाहिए। नैऋत्य या वायव्य में रखने से बार-बार बिगड़ने की संभावना बनी रहती है।
वास्तु के मुख्य दरवाजे के सामने भोजन कक्ष, रसोई घर अथवा खाने की मेज नहीं होना चाहिए।
मुख्य द्वार के अलावा पूजाघर, भोजन कक्ष एवं तिजोरी के कमरे के दरवाजे पर देहरी अवश्य लगवानी चाहिए।
घर के मध्यभाग (ब्रह्मस्थान) एवं ईशान में शौचालय कभी भी नहीं होना चाहिए।
पूर्व तथा पश्चिम की ओर मुँह करके शौच अथवा लघुशंका के लिए नहीं बैठना चाहिए। इसलिए टॉयलेट सीट उत्तर दक्षिण ही लगानी चाहिए।
दक्षिण दिशा में पैर करके कभी सोना नहीं चाहिए। इसके कारण हमारे शरीर का उत्तरी ध्रुव (मस्तिष्क) पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की ओर आने से रक्त संचार में विकर्षण (repulsion) पैदा होता है, जिससे मस्तिष्क में रक्त का पूर्व संचार नहीं हो पाता विचारशक्ति व निर्णयशक्ति प्रभावित होती है तथा कार्य में यश प्राप्त नहीं होता। गृहस्थ व्यक्तियों को दक्षिण की ओर तथा विद्यार्थियों को पूर्व की ओर सिर करके सोना चाहिए।
गृहस्थियों के शयनकक्ष में सफेद संगमरमर नहीं लगवाना चाहिए। सफेद संगमरमर पत्थर मंदिर में लगाने हेतु उचित है, क्योंकि यह पवित्रता का द्योतक है।
भूमि-पूजन, वास्तु-शान्ति, गृहप्रवेश आदि सामान्यतः शनिवार एवं मंगलवार को नहीं करना चाहिए।
स्नानगृह में आईना (दर्पण) एवं शयन कक्ष में ड्रेसिंग टेबल (दर्पण) उत्तर या पूर्व दिशा में ही रखना चाहिए।
स्नानगृह में नल, शावर, वाश-बेसिन, पानी रखने की बालटी पूर्व या ईशान में रखना चाहिए एवं स्नान करते समय मुँह पूर्व या उत्तर में होना चाहिए।
वायव्य में अनाज एवं अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं की व्यवस्था या भंडार रखना वास्तु अनुरूप होगा। इससे जीवन में अन्न की कमी नहीं आयेगी।
परिवार में किसी महिला को मासिक धर्म चालू रहते समय घर का निर्माण कार्य प्रारम्भ नहीं करना चाहिए।
रसोई घर में भोजन बनाते समय मुँह कभी दक्षिण की ओर नहीं होना चाहिए। दक्षिण दिशा से आने वाले स्पन्दन अनिष्ट शक्ति (Negative Energy) युक्त होते हैं।  इस प्रकार पका भोजन उत्कृष्ट स्वादवाला नहीं होता। खाने वाले व्यक्ति सामान्यतः उस खाने में दोष निकालने लगते हैं तथा गृहिणी (रसोइये) का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता।
भोजन कक्ष वास्तु के पश्चिमी भाग में होना चाहिए। भोजन कक्ष में निसर्ग-रम्य चित्र लगाने चाहिए। भोजन करने की मेज (यदि हो तो) चौकोर या आयताकार होनी चाहिए, गोल नहीं। गोल मेज पर खाना खाते समय वाद-विवाद हो सकता है। खाना खाते समय पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करना ही उचित है, दक्षिण की ओर मुँह नहीं करना चाहिए।
भोजन कक्ष व रसोई कक्ष एक ही मंजिल पर होना चाहिए।
किसी भी कारखाने में-
नैऋत्य या दक्षिण में कुआँ, बोरिंग अथवा भूमिगत जल का भंडारण (Storage) बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इसके कारण झगड़े, अपघात एवं अर्थनाश होता है।
ईशान के भाग में निर्माण करने से उत्पादन में कमी आती है, उत्पादित माल बिना बिका रह जाता है अथवा कोई विशेष कारण नहीं होने पर भी माल विक्रय का ऑर्डर हाथ से निकल जाता है।
विद्यार्थियों को आग्नेय एवं वायव्य भाग में बने कमरों में बैठकर अध्ययन नहीं करना चाहिए। इस क्षेत्र में मन स्थिर नहीं रहता एवं स्मरणशक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
किसी भी वास्तु में पूर्व या उत्तर की चार दीवार पर ऊपर चढ़ाने वाली फूल-पत्तियों की बेल नहीं होना चाहिए। मनी प्लांट घर में लगाना चाहिए परंतु घर के बाहर अथवा पेड़ पर बेल के रूप में नहीं चढ़ाना चाहिए।
विचार विनिमय, सलाह चर्चा हेतु बैठक या निस्तारण कक्ष दक्षिण में नहीं बनाना चाहिए। इस दिशा के कमरे में चर्चा में निरसता व थकान के साथ तकरार की संभावना रहती है। इस हेतु ब्रह्म स्थल, पूर्व या ईशान सर्वश्रेष्ठ है।
कम्पाउन्ड दीवार का आधार लेकर पोर्च (पोर्टिको) नहीं बनाना चाहिए। पोर्च हेतु उत्तर या पूर्व अभीष्ट है। नैऋत्य को छोड़कर अन्य दिशाओं में भी पोर्च बना सकते हैं यदि वास्तु के अन्य नियमों (जैसे- उत्तर में दक्षिण से अधिक, पूर्व में पश्चिम से अधिक खुला स्थान हो) के अनुसार बने। पार्किंग करते समय गाड़ी का मुँह (Front) दक्षिण की ओर नहीं होना चाहिए।
वास्तु के अनुरूप बने मकान या कार्यालय में रहने से शरीर की जीव-रासायनिक क्रिया संतुलित रखने में सहायता मिलती है। लम्बे समय तक (वर्षों से) वास्तुदोष स्थल में निवास करने से शरीर की आण्विक (सूक्ष्म) संरचना में बदलाव आ जाता है। आधुनिक एक्यूप्रेशर के यंत्रों और आभामंडल के चित्रों की सहायता से वास्तुदोषयुक्त घर के निवासियों की जाँच करके भी उनके घर के वास्तुदोषों का पता लग सकता है। दोषयुक्त वास्तु के सुधार के साथ-साथ योगासन, प्राणायाम आदि योगाभ्यास एवं एक्यूप्रेशर के सम्मिलित प्रयास से अस्वस्थ शरीर की आण्विक संरचना को सुधारा जा सकता है।
यदि किसी घर में वास्तुदोष पता नहीं हो अथवा ऐसा वास्तुदोष हो जो ठीक करना संभव न हो तो उस मकान के चारों कोनों में एक-एक कटोरी मोटा (ढेलावाला) नमक रखा जाय। प्रतिदिन कमरों में नमक के पानी का अथवा गौमूत्र (अथवा गौमूत्र से निर्मित फिनाइल) का पौंछा लगाया जाय। इससे ऋणात्मक ऊर्जाओं का प्रभाव कम हो जायेगा। जब नमक गीला हो जाये तो वह बदलते रहना आवश्यक है। वास्तु दोष प्रभावित स्थल पर देशी गाय रखने से भी वास्तुदोष का प्रभाव क्षीण होता है।

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