विदिशा भूखण्ड व विदिशा में निर्माण

मुख्य दिशाएँ वास्तु या मकान की मध्य रेखा से 22.5 अंश या ज्यादा घूमी हुई हो तो ऐसे वास्तु को विदिशा में बना मकान या वास्तु कहा जाता है। ऐसे विदिशा मकान में वास्तु के उक्त सभी नियम व प्रभाव पूरी तरह नहीं लागू होते। ऐसे वास्तु ज्यादातर शुभ नहीं होते और वहाँ शुभ फल केवल निम्न कुछ दिशाओं में ही प्राप्त होता है अधिकतर ऐसे दिशाओं में बने मकान आदि धीमी गतिवाले, अशुभफलदायक और कई दशा में अत्यन्त हानिकारक परिणाम दर्शाते हैं।

विदिशा में अच्छे फलदायक मकान या वास्तु बनाने के नियमः

  • प्रवेश द्वार केवल ईशान दिशा से होने से ही विशिष्ट मंगलकारी होता है। मध्य पूर्व अथवा मध्य उत्तर से भी प्रवेश शुभ होता है।
  • विदिशा प्लाट में कमरे, मकान या वास्तु केवल ईशान और नैऋत्य दिशा को लम्बाई में रखकर बनाना हितकारी मंगलकारी है।
  • विदिशा प्लाट के ईशान में नैऋत्य से अधिक खाली जगह व ईशान को हल्का न नीचा रखना चाहिए।
  • अग्नि व वायव्य दिशा में एकदम बराबर खाली जगह रखना चाहिए।

उक्त 4 नियमों व लक्षणों से युक्त पूर्ण विदिशा (45 अंश घूमा) में बने वास्तु से भी अधिक और त्वरित अति मंगलकारी फलदायक पाये गये हैं परन्तु इनसे विपरीत विदिशा में बने वास्तु अमंगलकारी ही होते हैं। विदिशा के वास्तु में यदि प्रवेश, और खाली जगह नैऋत्य अग्नि व वायव्य से होता है तो ऐसे वास्तु अत्यन्त अशुभ फलदायक पाये गये हैं। विदिशा में नैऋत्य का प्रवेश वंशनाश, धन नाश का द्योतक है तथा आग्नेय से प्रवेश अग्निभय, चोरी लड़ाई-झगड़ा, पतिपत्नि का नाश, अनैतिकता का जन्मदाता कहा गया है वायव्य का प्रवेश द्वार चोरी, कानूनी झगड़े, जेल, व्यापार-नाश, अधिक व्यय कराने वाला आदि पाया गया है। विदिशा के वास्तु अगर सही नियमानुसार न होने पर कई दशाओं में अपमृत्यु का कारण भी बनते हैं।

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