कुम्भ का वास्तविक लाभ कैसे पायें ?
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कुम्भ का वास्तविक लाभ कैसे पायें ?

- पूज्य बापूजी

(प्रयागराज कुम्भ : 14 जनवरी से 4 मार्च)

वैदिक संस्कृति का अनमोल प्रसाद

कुम्भ पर्व की महिमा हजार साल, लाख साल, पाँच लाख साल पहले की है ऐसी बात नहीं है । भगवान राम का प्राकट्य करने के लिए वैदिक संस्कृति में जो विधि-विधान लिखा था, उसका आश्रय लेकर यज्ञ किया गया और भगवान राम का, परमात्मा का आवाहन हो इस प्रकार का संकल्प करके यज्ञ किया गया । तो मानना पड़ेगा कि भगवान राम के पहले वेद हैं और वेदों में कुम्भ पर्व की महिमा आ रही है ।

अथर्ववेद में भगवान ब्रह्माजी ने कहा है कि ‘‘हे मनुष्यो ! मैं तुम्हें सांसारिक सुखों को देनेवाले 4 कुम्भ पर्वों का निर्माण कर 4 स्थानों - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में प्रदान करता हूँ ।’’

प्रयागराज कुम्भ की महिमा

प्रयागराज तीर्थ ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा प्रकट किया गया है । जब बृहस्पति मेष राशि पर एवं चन्द्र-सूर्य मकर राशि पर होते हैं तब प्रयागराज में कुम्भ-मेला होता है ।

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी ।

तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम् ।।

‘जैसे ग्रहों में सूर्य व ताराओं में चन्द्रमा उत्तम हैं, ऐसे ही तीर्थों में प्रयाग उत्तम तीर्थ है ।’

प्रयाग, प्रयाग, प्रयाग... उच्चारण से, कीर्तन करने से घोर पापों से छुटकारा मिलकर हृदय आनंदित होता है ।

सहस्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नानशतानि च ।

वैशाखे नर्मदा कोटिः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।।

‘कार्तिक में एक हजार बार गंगा-स्नान करने से, माघ में सौ बार गंगा में स्नान करने से और वैशाख में करोड़ बार नर्मदा में स्नान करने से जो फल होता है, वह प्रयाग में कुम्भ पर्व पर केवल एक ही बार स्नान करने से प्राप्त होता है ।’

शिवजी बोलते हैं : ‘‘यह तीर्थ, वह तीर्थ... ये सब बाहर के तीर्थ हैं, आत्मतीर्थ ही सर्वोत्तम तीर्थ है ।’’ आत्मतीर्थ में स्नान करना नहीं जानते तो मुक्ति का लाभ नहीं मिलता है । इसलिए आत्मतीर्थ में स्नान करने की युक्ति शास्त्रों ने बतायी है । एक तो प्रयाग का कुम्भ त्रिवेणी-संगम है और दूसरा हृदय का त्रिवेणी-संगम है - दायाँ स्वर (पिंगला) - गंगा, बायाँ स्वर (इड़ा) - यमुना और बीच में (सुषुम्ना) - सरस्वती । यह ध्यान की जो आंतरिक त्रिवेणी है, वह बाहर की त्रिवेणी से हजार गुना ज्यादा हितकारी है ।

कुम्भ में संत व सत्संग की महिमा

ब्रह्मनिष्ठ संत की दृष्टि से जो तरंगें निकलती हैं, उनकी वाणी से जो शब्द निकलते हैं वे वातावरण को पावन करते हैं । संत के शरीर से जो तन्मात्राएँ निकलती हैं वे वातावरण में पवित्रता लाती हैं । अगर कुम्भ में सच्चे साधु-संत न आयें तो फिर देखो, कुम्भ का प्रभाव घट जायेगा । कुम्भ का प्रभाव संतों के कारण है ।

आस्थावाला स्थान और फिर ग्रहों का योग - यह संयोग आपके अंदर अपूर्व1 की उत्पत्ति कर देता है, पुण्य प्रकट कर देता है । फिर उसमें आस्था हो, रहने, खाने-पीने में संयम हो और कुछ जप-तप का अनुष्ठान हो तो उस पुण्य में कई गुना बढ़ोतरी हो जाती है ।

सामान्य व्यक्ति को जो पुण्य होता है उससे श्रद्धालु को ज्यादा पुण्य होता है । श्रद्धालु को जो पुण्य होता है उससे श्रद्धासहित जो सत्संगी है उसको ज्यादा होता है । श्रद्धासहित जो सत्संगी है उससे भी ज्यादा उनको परम पुण्य होता है जिनके जीवन में सत्संग के साथ आत्मविचार का प्रकाश भी है । उनको तो परम पुण्य - परमात्मस्वरूप की प्राप्ति के द्वार खोलने का अवसर मिल जाता है ।

जिनको सत्संग नहीं मिलता, सद्वृत्ति जगाने की युक्ति नहीं मिलती, वे बेचारे तीर्थ में आ के भी श्रीहीन हो के, शरीर को भिगोकर चले जाते हैं । मेहनत-मजूरी हो जाती है और थोड़ा फल मिलता है पुण्य का । लेकिन जिनको सत्संग मिलता है, उनको श्री, विजय, विभूति (ऐश्वर्य), ध्रुवा नीति (अचल नीति) - यह सब साथ में मिल जाता है ।

1. पुण्य या अपूर्व उसे कहते हैं जो हमें पावन करे; जो हमें इस शरीर में अभीष्ट दिलाये, सुखद पदार्थ दिलाये और यह शरीर छोड़ने के बाद परलोक में भी हमें अभीष्ट दिलाये ।


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How to reap the true benefit from Kumbha?

(Prayagraj Kumbha: 14th January to 4th March)

The invaluable gift of Vedic culture:

It is not that the glory of Kumbha is a thousand years, lac years or 5 lac years old. A Yajna was performed by Dasharatha for having Lord Rama as his son, according to rules prescribed in the Vedic culture. And a fire sacrifice was performed with a resolve to invoke Lord Rama, the Supreme Lord. It implies that the Vedas are older than the advent of Lord Rama. The glory of Kumbha is described in the Vedas.

Narrations are also found in the Atharva Veda, wherein Lord Brahma said, “I create four festivals of Kumbha, bestowing worldly pleasures; and give four places – Haridwar, Prayag, Ujjain and Nashik- to celebrate them for the salvation of humans.”

The glory of Kumbha at Prayagraj:

The holy place of Prayagraj has been created by the Creator Brahma and other Gods. Upon the event of Jupiter’s entrance in Aries circle and the entrance of the Sun and Moon in Capricorn, the Kumbh Festival is held at Prayagraj.

 

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी ।

तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम् ।।

 

“Just like the Sun in planets (stars) and the Moon in constellations, Prayagraj is best among all holy places.”

One is delighted at heart and delivered from grave sins by chanting Prayag… Prayag… Prayag… and doing Kirtan of the same.

सहस्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नानशतानि च ।

वैशाखे नर्मदा कोटिः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।।

 

“The religious merit of taking a holy bath one thousand times in the river Ganges in the month of Karttik, a hundred times in  the month of Magha, a crore times in the river Narmada in the month of Vaishakh, is obtained by taking a holy bath only once during the Kumbha festival.”

Lord Shiva says: “People say ‘this is a holy place’… ‘that is a holy place’ these are all external holy places, Atman-Teertha (the holy place of Self) is the best.” If one does not know how to plunge in the Atman-Teertha, one cannot get liberation. So the shastras have mentioned the method of plunging in the Atman-Teertha. One is triveni-sangama (the confluence of the holy rivers Ganges, Yamuna and Saraswati located in Prayagraj where Kumbha is held); and another one is triveni-sangama of heart – breathing through the right nostril (Pingla) – Ganges, breathing through left nostril (Ida) – Yamuna, and the central channel is (Sushumna) – Saraswati. This internal confluence of meditation is a thousand times more beneficial than the external triveni-sangama of Prayag.

The importance of saints and Satsang in the Kumbha:

The spiritual vibrations emitted from the eyes of Self-realized saints and the words from their speech, purify the environment. The vibrations emanated from the bodies of saints make the environment pious. If true saints do not come to Kumbha, the influence of Kumbha will get diminished. The effect of Kumbha is due to saints.

The holy place which is the centre of faith for millions, and planetary combination – these create Apoorva (latent fruit of an action) which purifies us, gives us our desired things of pleasure in this life and in the other world after death. But if you have faith in it, you observe restraint in food, drink and accommodation and you practice some austerity and do anushthana of mantra Japa, then the resultant religious merits get multiplied.

A devout person gets more religious merit than an ordinary (skeptic) person. One who is a devout satsangi gets more religious merit than a devout person. The devout satsangi, having the light of atma-vichara (self-inquiry) gets more religious merit than others, the highest religious merit. They get the highest religious merit which consequently opens the door to the attainment of the Supreme Self.

Those who do not get satsang, do not get to know the method of arousing the concept in the form of Truth, those poor guys come to the holy place, drench their body and go back being deprived of wealth. They do hard laborious work and get a small fruit in the form of religious merit. But those who get satsang, they also get shree (fortune), vijaya (victory), vibhuti (prosperity), and dhruva-neeti (unfailing prudence) – all at once.

[Rishi Prasad-Issue311-December-2018]


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