शुभ संकल्प करने एवं सुसंग व सुज्ञान पाने का पर्व : उत्तरायण
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शुभ संकल्प करने एवं सुसंग व सुज्ञान पाने का पर्व : उत्तरायण

- पूज्य बापूजी

भगवान के होकर आगे बढ़ो !

उत्तरायण का वाच्यार्थ यही है कि सूर्य का उत्तर की तरफ प्रस्थान । ऐसे ही मानव ! तू उन्नति की तरफ चल, सम्यक् क्रांति कर । सोने की लंका पा लेना अथवा बाहर की पदवियाँ ले लेना, मकान-पर-मकान बना के और कम्पनियों-पर-कम्पनियाँ खोलकर उलझना - यह राक्षसी उन्नति है । आधिभौतिक उन्नति में अगर आध्यात्मिक सम्पुट नहीं है तो वह आसुरी उन्नति है । रावण के पास सोने की लंका थी लेकिन अंदर में सुख-शांति नहीं थी । क्या काम की वह उन्नति ! हिटलर, सिकंदर की उन्नति क्या काम की ? उनको ही ले डूबी । राजा जनक, राजा अश्वपति, राजा रामजी की उन्नति वास्तविक उन्नति है । रामजी के राज्याभिषेक की तैयारियाँ हो रही थीं तो वे हर्ष में फूले नहीं और एकाएक कैकेयी के कलह से वनवास का माहौल बना तो दुःखी, शोकातुर नहीं हुए । घोड़े हुंकार रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, युद्ध के मैदान में एक-दूसरे के रक्त के प्यासे राग-द्वेष में छटपटा रहे हैं... उस माहौल में अंतरात्मरस में तृप्त बंसीधर की बंसी बज रही है... श्रीकृष्ण की गीता के ज्ञान से अर्जुन का ‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा’ हो गया । वास्तविक उन्नतिदाता के, गीता के आत्मज्ञान के प्रसाद से, बंसीधर की अनुभव-पोथी ‘गीता’ से अर्जुन तो शोक, मोह से तर गया और वह गीता-ज्ञान आज भी असंख्य लोगों की वास्तविक उन्नति का पथ-प्रदर्शन कर रहा है । हे मानव ! ऐसे तेरे महान आत्मवैभव को पा ले, पहचान ले !

‘अपने बल से मैं यह कर लूँगा, वह कर लूँगा...’ अगर अपने बल से कुछ करने में सफल हो गये तो अहंकार पछाड़ देगा और नहीं कर पाये तो विषाद दबा देगा लेकिन ‘देवो भूत्वा देवं यजेत् ।’ भगवान के होकर भगवान से मिल के आप आगे बढ़िये, बड़े सुरक्षित, उन्नत हो जाओगे । बड़ा आनंदित, आह्लादित जीवन बिताकर जीवनदाता को भी पा लोगे । चिन्मय सुख प्रकट होगा । संसारी सुख शक्ति का ह्रास करता है । विकारी सुख पहले प्रेम जैसा लगता है, बाद में खिन्नता, बीमारी और बुढ़ापा ले आता है लेकिन भगवत्सुख वास्तव में भगवन्मय दृष्टि देता है, भगवद्ज्ञान, भगवत्शांति, भगवत्सामर्थ्य से आपको सम्पन्न कर देता है ।

निसर्ग से दूर न होओ और अंतरात्मा की यात्रा करो

सूर्य को अर्घ्य देने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं । सूर्य की कोमल धूप में सूर्यस्नान करना और नाभि में सूर्य का ध्यान करना, इससे मंदाग्नि दूर होती है, स्वास्थ्य-लाभ मिलता है । सूर्यनमस्कार करने से बल और ओज-तेज की वृद्धि होती है । कहाँ तुमसे सूर्य दूर है, कहाँ परे है, कहाँ पराया है ! कपड़ों-पर-कपड़े पहनकर निसर्ग से दूर होना कुदरत के साथ द्रोह करना है । ऐसा करनेवाला मानव तुच्छ, पेटपालू प्राणी की नाईं भटकता रहता है, थक जाता है । थोड़ा अंतरंग साधन करो, थोड़ी अंतरात्मा की ओर यात्रा करो । चिन्मय सुख में आ जाओ, चिन्मय शांति में आ जाओ ।

वेद कहता है :

मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् । (यजुर्वेद : 36.18)

मेरा सब भूत-प्राणियों के साथ मित्रभाव है । मैं सबको प्यार करता हूँ, सब मुझे प्यार से देखते हैं । मैं सबका हित चाहता हूँ, मैं सबका मित्र हूँ ।

इसलिए उत्तरायण के पर्व पर गुड़ और तिल - तिल की स्निग्धता व गुड़ की मधुरता का मिश्रण करके महाराष्ट्र में एक-दूसरे को लड्डू बाँटते हैं । ऐसे ही तुम भी आपस में स्निग्धता और मधुरता अपने आत्मा-परमात्मा के साथ बरसाते जाओ ।

हजारों जन्मों का कार्य एक जन्म में

यह उत्तरायण का पर्व है । दक्षिणायन छोड़कर सूर्यनारायण का रथ उत्तर की तरफ बढ़ता है । ऐसे ही हे साधक ! तू नीचे का केन्द्र छोड़कर अब उत्थान की तरफ चल । यह उत्तरायण, मकर संक्रांति पर्व प्रकृति में परिवर्तन लाता है । सर्दियों पर गर्मियों की, अंधकार पर प्रकाश की विजय होती है । आलस्य पर उत्साह की, निद्रा पर जागरण की विजय होती है । हे साधक ! तू भी मोहनिद्रा पर ज्ञान-जागृति करके आगे बढ़ने का संकल्प कर ।

उत्तरायण वह समय है, जिसकी प्रतीक्षा भीष्म पितामह ने की थी । उत्तरायण पर्व का दिन देवताओं का प्रभातकाल है । इस दिन देवता जागते हैं, सात्त्विकता फैलाते हैं । कु-मुहूर्त सु-मुहूर्त में, शुभ मुहूर्त में बदलते हैं । ऐसे ही हे मानव ! तेरे जीवन में कुचेष्टा सुचेष्टा में, कुज्ञान सुज्ञान में, कुसंग सुसंग में और कुमाँग सुमाँग में बदले तो तेरा जीवन धन्य हो जायेगा । सुमाँग... ‘मुझे आत्मज्ञान चाहिए’, सुमित्र... ‘मुझे सत्संगी चाहिए’, सुचेष्टा... ‘मुझे परहित का कर्म चाहिए’ - इस प्रकार का दृष्टिकोण तेरे जीवन में आये । तू जगत की भाषा समझ ले, तू प्रकृति की भाषा को जान ले । जो प्रकृति तलवार की धार पर काम कराये वह मक्खन-मिश्री खिलाकर भी करवा सकती है । तू प्रकृति को, परमात्मा को सहयोग दे, वे तुझे आगे बढ़ाना चाहते हैं ।

हजारों जन्मों का काम तू एक जन्म में पूरा कर ! इस दिन से तेरे जीवन का रथ उन्नति की तरफ चले । इस दिन दृढ़ निश्चय कर ले कि ‘अब मैं उन्नति की तरफ चलूँगा अर्थात् शुभ संकल्प करूँगा, सुसंग और सुज्ञान प्राप्त करूँगा ।’

उत्तरायण को बनाओ महापर्व !

उत्तरायण दान करने का दिन है । अपने दिल के गाँव में ही उत्तरायण के इस महापर्व के दिन तुम दान कर दो अपने अहं का, अपनी क्षुद्र इच्छा-वासनाओं का । दान कर दो उस दाता परमात्मा को प्रेम का, दान कर दो अपने-आपे का । इससे बड़ा दान और क्या कर सकते हो तुम ?

जैसे प्रकृति में परिवर्तन आता है तो उसका प्रभाव हमारे तन-मन पर पड़ता है, ऐसे ही देवता जागते हैं तो हमारे मन पर प्रभाव पड़ता है, उत्तरायण के दिन का भी हमारे तन-मन पर प्रभाव पड़ता है और उसमें फिर हरि-प्यार और हरि-कीर्तन मिला दो तो तुम्हारी बहुत शीघ्र उन्नति होती है ।

तुम पठित हो या अपठित, प्यार कर सकते हो; अतः तिल की स्निग्धता और गुड़ की मिठास को निमित्त बनाकर अपनी स्निग्धता बाँटो - यह उत्तरायण पर्व बताता है । तुम्हारे हृदय का स्नेह और प्रभु की प्रीति - इन दोनों को मिलाओ तो तुम्हारा उत्तरायण महापर्व हो जायेगा बाबा !


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A Festival to make good resolves, be in holy company

and gain pious Knowledge: Uttarayana      

– Pujya Bapuji

Move ahead with the feeling of belonging to God!

Uttarayana etymologically implies the day on which the sun begins to move northwards. Likewise, O man! You begin to move towards progress and bring about right revolution. Obtaining the golden city of Lanka, attaining big external posts, getting engrossed in building one house after another, having one company after another- all are but demoniac progress. If physical progress is not counterbalanced by the spiritual progress, it is a demoniac progress. Ravana possessed the golden city of Lanka, but did not have inner peace and happiness. Then of what use is such progress? Of what use was the progress attained by the likes of Hitler and Alexander? It only led to them to utter ruin. The progress made by King Janaka, King Ashwapati and King Ramaji was true progress. Ramaji was not elated when preparations for his coronation were being made; and he did not grieve when all of a sudden he was exiled to forest due to Kaikeyi’s mischief. In the battlefield, horses were neighing and elephants were trumpeting around; blood thirsty warriors impelled by attachment and aversion were attacking one another; Lord Krishna, contented with the bliss of inner self, was as delighted as if He was playing on His flute. Arjuna’s delusion was destroyed and he regained the memory (Knowledge) through Krishna’s instructions in the form of the Gita. The gift of Self-knowledge given by the Giver of true progress through the Gita, the book of flute player’s realizations, helped Arjuna pass beyond sorrow and delusion; and that knowledge of Gita is guiding innumerable people treading the path of true progress even today. O man! You attain such a great majesty of Atman through its realization!

One may think, ‘I shall do this and that with my own power…’. However, should one succeed in achieving some goal on one’s own strength, he will be knocked down by the resultant egotism; and
if on the other hand he fails to do it, he will be depressed. Hence
‘देवो भूत्वा देवं यजेत् ।’ i.e. ‘One should become divine in order to worship God.’ Move ahead after meeting God, considering yourself of God and you will be well protected and elevated. You will not only lead a supremely joyous and blissful life but also attain the Giver of life (God). The bliss of consciousness will manifest in your life. Worldly enjoyments only deplete your energy. Carnal pleasure appears as love in the beginning, but brings dejection, disease and senility in the end; whereas, divine joy blesses you with divine vision and equips you with divine Knowledge, divine Peace and divine Power.

Do not go against Nature

And undertake a journey to the inner self

Offering oblation to the sun fulfils our wishes. Taking a sunbath in soft sunrays, visualizing the sun at your navel (center) cures indigestion and gives health-benefits. Doing Surya Namaskara (sun salutation) increases your strength, vigour, and brilliance. Is the sun far away from you? Is the sun beyond your reach? Is the sun others’? Covering the body with many layers of clothes is to go against Nature. The man who does this wanders like a petty selfish animal, living from hand to mouth, and gets exhausted in the end. Do some inward Sadhana, and undertake a journey to the inner self. The Vedas say:

मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् ।

 (The Yajurveda: 36.18)

i.e. “I am friendly with all beings. I love all, and they look at me affectionately. I wish everyone’s good, I am a friend of all.”

This is why the people in Maharashtra prepare Laddoos on the Uttarayana festival by mixing sesame seeds (unctuousness) and jaggery (sweetness), and give them to one another. Likewise, you continue to shower affection and sweetness on all around you along with the joy of your Atman, the Supreme Self.

Accomplish the task of thousands of births in one life

This is the festival of Uttarayana. On this day the Sun god embarks on a northerly journey leaving the southerly one. Similarly, O Sadhaka, you march to higher chakras from the lower ones. This Uttarayana or Makara Sankranti brings about the change of season. It marks the victory of the summer over the winter; and of light over the darkness; of zeal over lethargy and awakening over sleep. O Sadhaka! You too make a resolve to move ahead to become victorious over the slumber of delusion with the awakening of knowledge.

Uttarayana is that period for which Grandsire Bhishma waited to give up his body. The day of the Uttarayana festival is the dawn for the devas (gods). They wake up on this day and spread pious vibes all around. They turn bad muhurta into good muhurta. Likewise, O Man! Your life will be blessed if you turn your bad actions, knowledge, company and demand into good ones. Good demand… ‘I aspire for Self-Knowledge’; good friend… ‘I want satsangi friends’, Good actions… ‘I want to do benevolent acts’. May you develop such perspective in your life. Learn the language of the world; learn the language of nature. The nature that makes people act at gunpoint, can also motivate you do the same act affectionately. Co-operate with Nature and the Lord; they only wish your progress.

Accomplish the task that may take thousands of births, in a single life! Let the chariot of your life move northwards. Make a strong resolve on this day, ‘Now, I will move northwards, i.e. make auspicious resolves, keep good company and attain good knowledge.’

Let this Uttarayana become Grand Uttarayana!

Uttarayana is the day for doing charity. Donate your ego and petty desires in the village of your own heart on this great festival of Uttarayana. Donate love and even your individual self to that Giver, Lord! What bigger charity can you ever do?

The change in the season also affects our body and mind; similarly, the awakening of the gods and even the day of Uttarayana affects our body and mind. If you only add the love for Lord Hari along with collective chanting of His Name Divine thereto, it will ensure your quick progress.

Irrespective of whether you are a learned person or illiterate, you surely have the ability to love; so just bring the unctuousness of sesame seeds and sweetness of jaggery to your behaviour and dole out your affection to all –this is the message of the Uttarayana Festival. Just combine the affection in your heart with the benign love of the Lord, and then this Uttarayana will become the grand Uttarayana for you.

 


[Rishi Prasad-Issue-312-December-2018]


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