कैसे बनें विद्यार्थी मेधावी व महान ?
Ashram India

कैसे बनें विद्यार्थी मेधावी व महान ?

बच्चों में ज्ञानशक्ति की वृद्धि नहीं होगी तो खड़े-खड़े पानी पियेंगे, खड़े-खड़े खाना खायेंगे । इससे और अधिक बुद्धिनाश होता है । जो लड़कियाँ लड़कों से और लड़के लड़कियों से दोस्ती करते हैं, उनकी बुद्धिशक्ति, प्राणशक्ति दब्बू बन जाती है तथा स्वास्थ्य व बुद्धि की हानि होती है ।

ज्ञानशक्ति विकसित करनी हो तो बुद्धि में दुराग्रह छोड़ो । बुद्धि में समत्व हो, शास्त्रसंबंधी विवेक हो और दुराग्रह न हो, भगवान के प्रति प्रीति का आग्रह हो । रात को सोते समय बुद्धि बुद्धिदाता में विश्रांति पाये, ‘मैं परमात्मा में आराम कर रहा हूँ, ॐॐ प्रभुजी ॐ...’ सचेतन मन, अचेतन मन दोनों में यह ॐकार का सुमिरन करते-करते सो जाओगे तो बुद्धिशक्ति तो बढ़ेगी, बढ़ेगी... अनुमान शक्ति, क्षमाशक्ति भी बढ़ेगी ।

ज्ञान की वृद्धि में सहायक आठ बातें

विद्या-अध्ययन के समय आठ बातें ज्ञान की वृद्धि में सहायक हैं । पहली बात है, शांत रहना । इसके लिए ओऽऽ...म्ऽऽ... का 10-15 मिनट प्लुत गुंजन करने का अभ्यास करो । शांत रहने से तुम्हारे में मननशक्ति, चिंतनशक्ति विकसित होगी ।

दूसरी बात है, इन्द्रियों का संयम । जो देखा, बस लपक पड़े, जो आया खा लिया, खड़े-खड़े खा लिया - पानी पी लिया, खड़े-खड़े पेशाब कर लिया... यह जरा-जरा-सी गलती पशुत्व, आसुरीपना ले आती है । इससे मति-गति तामसी हो जाती है ।

तीसरी बात है, बच्चे दुःखदायी दोषों से बचे रहें । दुःखदायी दोष हैं - गंदी फिल्म देखना, गंदी सोहबत (संग) में आना, गंदे कर्म करना ।

चौथी बात है, सदाचरण करे ।

पाँचवीं बात, ब्रह्मचर्य का पालन करे । (आश्रम की दिव्य प्रेरणा प्रकाश पुस्तक पढ़ने से सफल होंगे ।)

छठी बात, आसक्ति न रखे ।

सातवीं बात, सत्य बोले ।

आठवीं बात है, सहनशक्ति बढ़ावे । माँ ने कुछ कह दिया तो कोई बात नहीं, माँ है न ! पिता ने या शिक्षक ने कुछ कह दिया तो रूठना नहीं चाहिए, मुँह सुजाना नहीं चाहिए ।

बाल्यकाल में किससे सावधान रहना चाहिए ?

दुष्टों के संग से, स्वार्थियों की अक्ल और होशियारी से, मूर्खों से । अदूरदर्शन, थोड़ी-सी चोरी, थोड़ा-सा आलस्य, थोड़ा-सा ऐसा-वैसा स्वभाव, थोड़ा-सा यह चलेगा, जरा यह चलेगा, चल जायेगा-चल जायेगा - ऐसा करते-करते अपने सद्गुण छोड़ते जाते हैं और ‘दुर्गुण चल जायेगा’ - ऐसा सोचते हैं तो इससे वह महादुर्गुणी हो जाता है ।

पाँच सावधानियाँ हैं :

(1) अभिमान न करे । पढ़ाई में, कबड्डी में, खेल में जीत गये तो अभिमान न आये ।

(2) किसी पर क्रोध न करे ।

(3) ‘पाठ बाद में याद कर लेंगे’ - इस प्रकार का प्रमाद न करे । इससे भी बच्चों का विकास होगा ।

(4) संयम रखे । बुरी नजर से लड़की लड़के को देखे, लड़का लड़की को देखे... इससे जीवनीशक्ति नाश होती है ।

(5) आलस्य न करे ।   

यह भी विद्यार्थी-जीवन में बहुत नुकसान करता है । जिस समय जो काम करना है, तत्परता से करो । लापरवाही से काम को बिगाड़ें नहीं तो अच्छे विद्यार्थी बनेंगे ।

बुद्धि के कितने नाम होते हैं ?

मनीषा, धिषणा, धीः, प्रज्ञा, शेमुषी, मति - ये सारे नाम बुद्धि के हैं । इनका अलग-अलग प्रभाव होता है । उचित-अनुचित का निर्णय करना यह मति का काम है । धृति और बुद्धि दोनों इकट्ठी हो तो उसे बोलते हैं ‘मेधा’ ।

मेधावी का क्या अर्थ है ?

जिसमें अनुचित को छोड़ने का सामर्थ्य और उचित में डटे रहने का सामर्थ्य होता है, उसको ‘मेधावी’ बोलते हैं । अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप का दर्शन करते हैं लेकिन उनका दुःख, भय नहीं गया लेकिन जब अर्जुन को सत्संग में रुचि हुई, तब उनकी बुद्धि मेधावी बनी ।

मेधावी छिन्नसंशयः ।

संशय का छेदन कर दिया । अर्जुन मेधावी बन गये, तब बोलते हैं :

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ।।

विद्यार्थी-जीवन में और व्यावहारिक जीवन में अपनी बुद्धि ठीक होनी चाहिए, मेधावी बनना चाहिए ।                                               

Previous Article ज्ञान की होली खेल के जन्म-मरण से छूट जाओ
Print
554 Rate this article:
4.0
Please login or register to post comments.

E-Subscription of Rishi Prasad