भगवद्‌भक्तों, संतों के जीवन-प्रसंगों का प्रभाव
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भगवद्‌भक्तों, संतों के जीवन-प्रसंगों का प्रभाव

(गुरु तेग बहादुरजी शहीदी दिवस: 24 नवम्बर)

सन् 1621 में अमृतसर में एक बालक का जन्म हुआ, नाम रखा गया त्यागमल । बालक जब 4 वर्ष का हुआ तब उसके बड़े भाई के विवाह का अवसर आया । बारात जा रही थी, बालक की दृष्टि एक लड़के पर पड़ी, जिसके तन पर कपड़े नहीं थे और वह दूर से बारात को बहुत ही गौर से देख रहा था । उसी समय बालक ने महसूस किया कि ‘इस लड़के के पास एक लँगोट तक नहीं और मैं शाही पोशाक में !’ बालक का हृदय दया से भर गया और उसने तुरंत अपनी पोशाक उतारकर उस लड़के को पहना दी । बालक की माँ का ध्यान जब अपने बेटे पर गया तो वे आश्चर्य में पड़ गयीं कि ‘अभी-अभी तो मैंने अपने लाड़ले को पोशाक पहनायी थी, वह कहाँ गयी ?’

बालक से पूछे जाने पर उसने सारी बात बता दी ।

बेटे की परदुःखकातरता देखकर माँ को लव-कुश, धु्रव, प्रह्लाद, बाबा फरीद जैसे भगवद्भक्तों व संतों के प्रेरणाप्रद प्रसंग, कथाएँ सुनाना सार्थक लगा । माँ ने उसे गले से लगा लिया और आशीष की वर्षा की ।

जानते हैं वे माँ कौन थीं और वह बालक कौन थे ? वे माँ थीं नानकी देवी और वह बालक थे ‘गुरु तेग बहादुरजी’ जिन्होंने सिखों की गुरु-परम्परा में 9वें गुरु के रूप में गुरुगादी सँभाली और धर्मांतरण के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए नारा दिया था :

गुरु तेग बहादुर बोलिया, सुनो सिखो बड़भागियाँ ।

धड़ दीजिये धर्म न छोड़िये ।।

 

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Influence of real-life stories of Saints and Devotees of God

(Guru Tegh Bahadur martyrdom Day: 24th November)

In 1621 a child was born in Amritsar. He was named Tyagmal. When he was 4 years old, the wedding of his elder brother took place. The procession of the groom was on the way and the little boy noticed a boy who had no clothes on and was watching the procession attentively from a distance. At that very moment, the little boy perceived; ‘The poor boy does not even have a loincloth and I am wearing a royal dress!’ The boy’s heart was overwhelmed with pity and he immediately gave his clothes to the poor boy. When his mother noticed him without clothes, she was amazed: ‘I have only just dressed my darling son, where is the clothing?’

Upon asking, the boy explained everything.

Realising the sensitivity of her son to the plight of others, the mother felt that her telling the inspiring stories of Saints like Baba Farid and devotees of God like Dhruva, Prahlada, and Lava Kusha to him had been fruitful. The mother hugged Him and showered blessings upon him.

Do you know who was the mother and who was that boy? The mother was Nanaki Devi and the boy was ‘Guru Tegh Bahadurji’, who ascended the Gurugaddi as the 9th Guru in the succession of Sikh Gurus. He had raised the slogan of protest against forced religious conversion:

गुरु तेग बहादुर बोलिया, सुनो सिखो बड़भागियाँ ।

धड़ दीजिये धर्म न छोड़िये ।।

Guru Tegh Bahadur said, “Hear, O fortunate Sikhs, sacrifice your life, but relinquish not your faith.”         

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