इन्द्रियों से भी ब्रह्मरस पिला दें ऐसे माधुर्य-अवतार
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/ Categories: RishiPrasad, Year-2019, Sep-2019

इन्द्रियों से भी ब्रह्मरस पिला दें ऐसे माधुर्य-अवतार

(शरद पूर्णिमा: 13 अक्टूबर)

शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है । माना जाता है कि इस रात्रि को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है । इससे चित्त को शांति मिलती है और पित्त का प्रकोप भी शांत होता है । मनुष्य को चाहिए कि वह इस महत्त्वपूर्ण रात्रि की चाँदनी का सेवन करे । महर्षि वेदव्यासजी ने ‘श्रीमद्भागवत’ के दसवें स्कंध में शरद पूर्णिमा की रात्रि को अपनी पूर्ण कलाओं के साथ धरती पर अवतरित परब्रह्म श्रीकृष्ण के महारासोत्सव की रात्रि कहा है । शरद पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमा की शीतलतारूपी अमृतवर्षा की तरह भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपनी रासलीला में धरती पर भक्तिरस छलकाया था । इस रासलीला में हजारों धनभागी गोपियों ने योगेश्वर श्रीकृष्ण के सान्निध्य में भक्तिरस की प्यालियाँ पीकर अपने जीवन को धन्य किया था ।

हम लोग जो चित्रों आदि में श्रीकृष्ण के इर्द-गिर्द गोपियों को देखते हैं, नृत्य देखते हैं, वह तो श्रीकृष्ण की महिमा का बिल्कुल बाह्य रूप है । वास्तव में तत्त्वरूप से तो श्रीकृष्ण परात्पर ब्रह्म हैं, सच्चिदानंद ब्रह्म हैं । विकारी मनुष्य को श्रीकृष्ण की रासलीला विकाररूप दिखे तो यह उसकी दुर्मति है । बोलते हैं, ‘चीर-हरण लीला में भगवान ने गोपियों के कपड़े हर लिये... ।’ इसका अर्थ भी शास्त्रों में आता है कि जब गुरु की कृपा होती है तब हृदय का आवरण भंग होता है, पर्दा हटता है और तब जीवात्मा-परमात्मा की मुलाकात होती है । श्रीकृष्ण ने चीर-हरण लीला की अर्थात् गोपियों के हृदय का आवरण भंग किया । अपना सच्चिदानंद स्वभाव तो अंतरात्मा होकर बैठा था और जीव बेचारा उसे इधर-उधर ढूँढ़ रहा था । वह अज्ञान का आवरण हटा, इसका नाम है चीर-हरण ।

‘गो’ माना इन्द्रियाँ । इन्द्रियों के द्वारा जो भगवद्-रस पी ले वह ‘गोपी’ । जो आँखों से भी भगवान के प्रेमरस को पीते हैं, बंसी से भी उनके प्रेमरस का पान करते हैं, भगवान को छूकर जो हवा आती है, भगवान को छू के जो भगवद्-तत्त्व को स्पर्श की हुई आह्लादिनी, मधुमय सुगंध आती है, उसका भी जो रसपान करते हैं - ऐेसे इन्द्रियों के द्वारा भगवान के आनंद-रस को पीने की क्षमतावाले जीव हैं ‘गोपी’ ।

गोपियों के बीच में कृष्ण रास करते, सबकी तरफ तिरछी नजर से देखते । सौ-सौ गोपियों का एक-एक घेरा और उसमें श्रीकृष्ण । प्रत्येक को लगे कि ‘मेरी ओर देख रहे हैं ।’ फिर श्रीकृष्ण ने संकल्प किया और रास का दूसरा रूप हुआ तो दो गोपियों के बीच एक कृष्ण थे । फिर रासलीला में यह एहसास हुआ कि एक-एक गोपी के साथ एक-एक कृष्ण हैं ।

जैसे नरकासुर के वध के बाद सोलह हजार कन्याओं के साथ विवाह के लिए श्रीकृष्ण सोलह हजार बन गये थे और सोलह हजार गर्गाचार्य बना दिये थे, ऐसा ही शरद पूनम की रात को हुआ । स्थूल दृष्टि से देखा जाय तो श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियाँ थीं उतने रूप धारण कर लिये थे । जैसे आप एक व्यक्ति होते हुए भी स्वप्न में अनेक व्यक्तियों का रूप धारण कर लेते हैं । आज का कलियुग का आदमी स्वप्न में एक में से अनेक बनता है कि नहीं ? बनता है । ऐसे ही जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के मूल हैं, वे सच्चिदानंद परमात्मा अंतःकरण में एक में से अनेक बनाकर दिखाते हैं । बाहर की सृष्टि में भी यह लीला माधुर्य-अवतार का प्रसाद है ! विषय-विकारों और इन्द्रियों के सुखों में जो लोग फँस रहे हैं उनको भी ब्रह्मसुख की झलकें मिलें इसलिए यह अवतार की लीला थी ।    

 

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The Madhurya Avatara who gives the bliss of Brahman to be enjoyed even through senses   – Pujya Bapuji

 (Sharad Purnima: 13th October) 

The night of Sharad Purnima holds special significance. It is believed that on this night, the fully illuminated moon showers the nectar in the form of coolness, nourishment and peace on earth. This not only brings peace to the mind, but also pacifies aggravated Pitta. People should stay in the moonlight on this momentous night. Maharshi Veda Vyasaji in the tenth canto of ‘Shrimad Bhagavata’ enunciated the Sharad Purnima night as the night of Maha Rasotsava (Great festival of Rasa Dance) of the Supreme Brahman personified Lord Krishna Who had incarnated on earth with His all marks of greatness. Just like the moon showers the nectar of coolness on Sharad Purnima night, Lord Krishna too flooded the earth with the joy of devotion through His Rasa Dance. In this Rasa Dance, thousands of fortunate Gopis attained supreme blessedness by relishing the joy of devotion in the proximity of Yogeshwara (the Lord of Yoga) Krishna.

The dancing Gopis that we see surrounding Lord Krishna in pictures is a mere external depiction of the Lord’s divine glory. In reality, Lord Krishna is essentially Sachchidananda, the Truth, Consciousness and Bliss absolute, Supreme Brahman. If a passionate person sees passion in the Rasa Dance of Lord Krishna, it is due to his carnal thoughts. Some people say, ‘In the Lila of stealing clothes of Gopis, the Lord stole the clothes of the bathing Gopis.’ This too has a deeper meaning enunciated in the scriptures that when Guru’s grace descends on the disciple the covering (cloth) of ignorance is removed from his heart, the veil is removed and then the individual soul meets the Supreme Self. In the lila of stealing clothes, Lord Krishna removed the veil of ignorance covering the heart of the gopis. Though their true nature of Sachchidananda was already present within as the inner Self, the poor individual soul had been searching for the same all around. The removal of the veil of ignorance itself is depicted as stealing of clothes.

Go’ means the senses, and ‘Pi’ means to drink; so, one who is able to drink the divine joy through the senses is a Gopi. Those individual souls who can enjoy the joy of divine love through their eyes by seeing the Lord, through their ears by hearing the music played by Him on a flute, by touching the pious air that comes from over the body of the Lord, smelling the sweet delighting fragrance of the breeze that has touched the Lord (the divine tattva) –thus the jivas able to relish the divine joy of God through their senses are called Gopis.

Lord Krishna was playing Rasa Dance amongst the Gopis while casting playful glances on them. He is surrounded by 100 Gopis in each circle; and each of the Gopis felt that the Lord was looking at her. Next, Lord Krishna changed the sequence of Rasa through His resolve and He stationed himself between every two Gopis. Then every Gopi felt that Lord Krishna stood by her side.

Like Lord Krishna assumed the guise of 16,000 men after killing Narakasura, and enabled the priest Gargacharya also assume 16,000 forms in order to marry as many maidens released from the captivity of Narakasura; the same Lila was repeated on the night of Sharad Purnima. If we look from a gross physical viewpoint it appears that Lord Krishna assumed as many forms as were the Gopis. Like you, despite being a single person, assume numerous forms in a dream. Doesn’t a man even of this Kaliyuga assume many forms from one in the dream-world? He does! Likewise, the Supreme Self from whom is born this mysterious universe, by whom alone it is upheld, and in whom alone it is dissolved; who is Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute, Sachchidananda personified Lord Supreme, assumes many forms out of One in the Mind. This is the prasada of Lila-Madhurya Avatar even in the external universe. The Lila of this incarnation of the Lord was meant to enable even the people addicted to carnal pleasures and sense pleasures to have glimpses of the bliss of Brahman.      

[RP-ISSUE297-September-2017]

 

 

 

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