पतले-से धागे से श्रद्धा-संकल्प का पवित्र बंधन
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पतले-से धागे से श्रद्धा-संकल्प का पवित्र बंधन

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

(रक्षाबंधन : 15 अगस्त)

राखी का धागा तो पतला है लेकिन इसमें छुपा भाव, श्रद्धा और संकल्प बहुत बड़ा काम करता है । भाई-बहन का यह पवित्र बंधन युवक-युवतियों को पतन की खाई में गिरने से बचाने में सक्षम है ।

भाई-बहन के निर्मल प्रेम के आगे काम ठंडा हो जाता है, क्रोध शांत हो जाता है, सहायता, करुणा और सङ्गच्छध्वं सं वदध्वं... कदम-से-कदम मिलाकर चलने की शक्ति आ जाती है । समता से युक्त विचार उदय होने लगते हैं । 

रक्षासूत्र का बहुआयामी महत्त्व 

रक्षाबंधन के कई पहलू हैं । स्वास्थ्य-लाभ, विकारों से रक्षा, संकल्प की दृढ़ता, फिसलाहट से रक्षा, युद्ध में रक्षा, साधन-भजन की रक्षा... जिस भी संकल्प या शुभ भाव से और हो सके तो वैदिक मंत्र संयुक्त, यह छोटा-सा धागा बाँध दिया जाय तो बड़ा काम करता है । है तो नन्हा-सा धागा परंतु आरोग्य में, संकल्प-सिद्धि में और सुरक्षित होने में भी यह मदद करता है ।

भविष्य पुराण में लिखा है :

सर्वरोगोपशमनं सर्वाशुभविनाशनम्

सकृत्कृतेनाब्दमेकं येन रक्षा कृता भवेत् ।। 

‘इस पर्व पर धारण किया हुआ रक्षासूत्र सम्पूर्ण रोगों तथा अशुभ कार्यों का विनाशक है । इसे वर्ष में एक बार धारण करने से वर्षभर मनुष्य रक्षित हो जाता है ।’

  यक्ष, गंधर्व, किन्नर तथा पिशाच आदि जो सूक्ष्म जगत की तुच्छ आत्माएँ हैं वे इस पर्व पर रक्षासूत्र धारण करनेवाले को विक्षेप नहीं करती हैं और हीन संकल्प, विरोधियों के संकल्प आदि उस पर ज्यादा असर नहीं कर सकेंगे तथा नीच वातावरण का प्रभाव उसके चित्त पर नहीं पड़ेगा वर्षभर सुरक्षित करने का संकल्प करके, वैदिक मंत्र सहित शुभकामना श्रद्धा से इस दिन रक्षासूत्र पहनें-पहनायें तो लाभ होता ही है वैदिक मंत्र है : 

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः

तेन त्वां अभिबध्नामि* रक्षे मा चल मा चल ।। 

ऐसा करें संकल्प 

‘मैं फलाना हूँ... फलानी हूँ ।’ इसमें ‘हूँ’ आत्मसत्ता के शाश्वत अस्तित्व या  अमिट विद्यमानता का परिचायक है । रक्षाबंधन का धागा तो सूत का है लेकिन उसमें संकल्प ‘हूँ’ की सत्ता से है । मैं बहन ‘हूँ’ अथवा मैं अमुक ‘हूँ’ और मेरा भाई ऐसा... फलाना मेरा ऐसा... उसका मंगल हो ।

शुभ संकल्प स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं, कार्य में सफलता देते हैं शांत होकर जब आप संकल्प करते हैं तो हूँमें से उठा हुआ स्फुरणा अकाट्य हो जाता है महापुरुषों की दृष्टि और आशीर्वाद या शांतमना बुजुर्गों के आशीर्वाद फलते हैं  

‘लक्ष्मीजी ने भगवान को अपने पास लाने के जिस  महान प्रयोजन से उक्त रक्षासूत्र दानवों के सम्राट बलि को बाँधा था, उसी प्रयोजन से मैं (बहन) भाई को रक्षासूत्र बाँधती हूँ । हे रक्षासूत्र ! तू मेरे भाई की रक्षा करना ।’ ऐसा संकल्प करके बहन भाई को रक्षासूत्र बाँधे और अपने-अपने हितैषी को तदनुरूप संकल्प करके बाँधें । अर्थात् अनित्य शरीर, अनित्य संसार को जाननेवाले अपने नित्य नारायणस्वरूप ‘मैं’ को, जो नर-नारी का अयन है उस आत्मा को जानने-पाने का प्रयोजन होना चाहिए । 

साधक है तो संकल्प करे कि ‘हे गुरुदेव ! असाधन से मेरी रक्षा कीजिये ।’ भक्त है तो ‘भक्ति के मार्ग से न गिर जाऊँ, मेरी रक्षा कीजिये !’ सत्संगी है तो ‘कहीं कुसंग के आँधी-तूफान में धकेला न जाऊँ, मेरी रक्षा कीजिये ।...’ इस प्रकार रक्षासूत्र में अपना-अपना संकल्प एक-दूसरे को देकर मनुष्य-मनुष्य का पोषक हो जाता है । 

गुरुपूनम के बाद यह नारियली पूनम आती है । ‘गुरुपूनम को जो नियम-व्रत मिला उसमें लड़खड़ाते एक महीने का तो नियम पूरा किया लेकिन अब हमारे जीवन में भगवद्भक्ति, साधन, ज्ञान का प्रकाश रहे और हम कहीं फिसलें नहीं, गुरुदेव ! हमारी रक्षा करें ।’ - इस भाव से साधक मन-ही-मन गुरु को राखी बाँध देते हैं और गुरुजी हिम्मत दे के व उपासना की नयी रीतें बताकर उनको सुरक्षित करने का वातावरण बना देते हैं । 

* शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय अभिबध्नामिके स्थान पर रक्षबध्नामिकहे


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A sacred bond of faith and resolve with a slender thread


(Raksha Bandhan: 15th August)


Though the thread of the Rakhi is slender, the feeling, faith and resolve residing in it work wonders. The sacred bond of love between brothers and sisters is capable of protecting young boys and girls from immoral lapses.


The pure love between brothers and sisters calms passion and anger. They get power to help each other out of compassion, and go together harmoniously. Thoughts of equanimity start arising in their mind.


Multiple benefits of the Rakhi


There are many benefits of Raksha Bandhan. Health benefits, protection from passion, strengthening of resolve, protection from lapses, protection from the enemy during war, protection of spiritual practices; whatever be the resolve or good feeling with which this small thread is tied, while reciting a Vedic mantra if possible, it works wonders. Though it is a small thread it helps in health, fulfillment of resolve and securing protection.


It is mentioned in the Bhavishya Purana:


सर्वरोगोपशमनं सर्वाशुभविनाशनम् ।

सकृत्कृतेनाब्दमेकं येन रक्षा कृता भवेत् ।। 


“The protective thread worn on this festival destroys all disease and inauspicious deeds. The man is protected throughout the year by wearing it once a year.”


The Gandharvas, Yakshas, Kinnaras (various demigods), and ghoulish spirits of the subtle world like Pishachas, etc. do not disturb the person who wears a rakhi on his wrist on this festival. He will not be influenced much by the lowly resolves of his opponents and negative vibes will not affect his mind. If the protective thread is tied to the wrist of a person with a wish to give yearlong protection, while chanting the following Vedic mantra with faith and good wishes, it definitely helps that person.


येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।

तेन त्वां अभिबध्नामि* रक्षे मा चल मा चल ।। 


Yena baddho balee raajaa daanavendro mahaabalah| Tena twaam abhibadhnaami* rakshe maa chala maa chala||


“I am tying this Raksha on your hand, with which the most powerful and generous King Bali himself was bound; O Raksha, don’t go away; don’t go away.”


Make the following resolve:


When a man says, “I am Mr. So and So” or a woman says, “I am Ms.So and So”, the “am” stands for the eternal existence of Self. The protective thread is made of cotton but the resolve is made by the eternal existence - “am”. ‘I am his sister or I am so and so. I wish good of my brother or so and so.’ Auspicious resolves protect health and give success to the person wearing the thread. When you make a resolve after becoming calm, it arises from “am” (eternal existence) and hence it never fails. The gracious glance or blessings of great men, and the blessings of venerable persons fructify.


‘Lakshmi tied a protective thread on the hand of Bali, the King of Danavas to bring Lord Vishnu back to her in the Vishnu Loka (because Vishnu was serving Bali as a guard in the Patala Loka). I am tying on my brother’s hand this protective thread with the same goal. O protective thread, protect my brother.’ Sisters should make such a resolution and tie a protective thread on their brother’s hand. And tie the protective thread to your well-wisher’s hand with a similar resolve. The objective should be the attainment or realization of our real ‘I’ the eternal Self, Narayanasvarupa, who knows the non-eternal body and world.


If you are a sadhaka, make a resolution, “O Gurudev, protect me from acts which destroy sadhana.” If you are a devotee, make a resolution, “O God, protect me so that I may not deviate from the path of Bhakti.” If you are a satsang lover, “Protect me. May I not be swept up in the whirlwind of bad company….” Thus by making a good resolve for one another, men become supporters of each other.


Guru Punam is followed by this Nariyali Punam. “The vows we took on Guru Punam have been observed unsteadily for one month. But now Gurudev protect us. Now illuminate our lives with the light of devotion to God, sadhana and knowledge. Save us from lapses.” Sadhakas tie the protective thread mentally on Gurudev’s hand with such feelings and Gurudev creates a protective environment by encouraging them and teaching new techniques of worship to them.



[Rishi Prasad - August 2019 - Issue-319]

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