सर्वोपरि ज्ञान, सुख व पुण्य देनेवाला महापर्व - गुरुपूर्णिमा
Ashram India

सर्वोपरि ज्ञान, सुख व पुण्य देनेवाला महापर्व - गुरुपूर्णिमा

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

गुरुपूर्णिमा महापर्व : 16 जुलाई

गुरुपूनम का इतिहास बड़ा उज्ज्वल इतिहास है । गुरुपूनम का ज्ञान सर्वोपरि ज्ञान है । गुरुपूनम का लाभ सर्वोपरि लाभ है । गुरुपूनम का सुख सर्वोपरि सुख है और गुरुपूनम का पुण्य सर्वोपरि पुण्य है । यह पर्व इतना व्यापक और महान है कि इसकी बराबरी कोई पर्व नहीं कर सकता है । गुरुपूर्णिमा उन महापुरुष महर्षि वेदव्यासजी की याद में मनाते हैं जिन्होंने होश सँभालते ही लोगों का मंगल सोचा ।

जहाँ इन्द्र भी बबलू हो जाते हैं

गुरु शब्द की बड़ी भारी महिमा है । ‘गु’ माने अंधकार, ‘रु’ माने प्रकाश । इसी शब्द की दूसरी व्याख्या भी है - जो अंधकार, नासमझी को मिटानेवाला आत्मज्ञान का प्रकाश दे दें वे गुरु हैं । श्रीविष्णुसहस्रनाम में भगवान के हजार नामों में एक नाम ‘गुरु’ भी है ।

‘ग’ माने पुण्यराशि को प्रकट करनेवाला, ‘र’ माने पापराशि को नष्ट करनेवाला, ‘उ’ माने अव्यक्त आत्मा को व्यक्त करने की सत्ता - ये जिसमें हैं वह ‘गुरु’ शब्द है । एक गुरु शब्द में पापनाशिनी, पुण्य-उभारिनी और अव्यक्त ब्रह्म-परमात्मा को व्यक्त करने की शक्ति है । जैसे बीज में वृक्ष छुपा है ऐसे ही सबमें जो परमात्म-चेतन छुपा है उसको प्रकट करनेवाला मंत्र, शब्द है ‘गुरु’ ।

और जो भगवान का रस व ज्ञान दे दें, भगवान से प्रीति करा दें ऐसे संतों को भी गुरु कहते हैं । वे संत कैसे होते हैं ? भगवान शिवजी ने कहा है :

जलानां सागरो राजा यथा भवति पार्वति

गुरुणां तत्र सर्वेषां राजायं परमो गुरुः ।।

जैसे समुद्र सब जलाशयों का राजा है, ऐसे ही जो भगवान का ज्ञान, प्रीति दे दें, भगवान का नाम दे दें और भगवान से हमारे दिल को लगा देने की शक्ति, कृपा, उपदेश दे दें, वे अनुभवी ब्रह्मवेत्ता सब गुरुओं में राजा हैं, परम गुरु हैं ।

जगत में एक से बढ़कर एक श्रेष्ठ लोग होते हैं लेकिन आत्मज्ञानी गुरु सभी श्रेष्ठ लोगों में पराकाष्ठा हैं । जैसे हाथी सब जीव-जंतुओं से बड़ा है लेकिन हिमालय के आगे हाथी भी बबलू है, ऐसे ही सभी मान करने योग्य लोगों में इन्द्र हाथी के समान बड़े हैं लेकिन आत्मा-परमात्मा का ज्ञान देनेवाले आत्मसाक्षात्कारी गुरु के आगे इन्द्र भी बबलू हो जाते हैं ।

गुरुपूनम सभी जाति-वर्ग के लोग मनाते हैं । मनुष्य तो ठीक, देवता और दैत्य भी मनाते हैं । इतना ही नहीं, भगवान श्रीकृष्ण गुरु सांदीपनि के चरणों में जाते और भगवान श्रीराम श्री वसिष्ठजी के चरणों में जाते । यह गुरुपूनम का पर्व इतना महत्त्वपूर्ण है !

ब्रह्मज्ञानियों के आदर का दिवस

गुरुपूनम सचमुच में लघु को गुरु बनानेवाली है, मरणधर्मा शरीर को साधन बनाकर अमर ईश्वर से मिलानेवाली है । आखिर तो बुढ़ापा मौत की तरफ ले जायेगा । वह मौत की तरफ ले जाय उसके पहले आत्मा-परमात्मा से मिलाने की व्यवस्था गुरुपूनम की है, गुरुकृपा की है । लाचार-मोहताज जीव को स्वतंत्र, श्रेष्ठ, ब्रह्मज्ञानी बनाने की व्यवस्था गुरुपूनम में है । गुरु का ज्ञान मुफ्त में हजम नहीं होता, कुछ-न-कुछ करना चाहिए, तो भले थोड़ा करते हैं लेकिन इस गुरुपूनम का हम क्या बदला चुका सकते हैं ?

ब्रह्मज्ञानियों ने समाज को क्या-क्या दिया है ! इतने लाखों-करोड़ों लोग देश-परदेश में हमारा सत्संग सुनते हैं, इसमें भी ब्रह्मज्ञानी मेरे गुरुदेव लीलाशाहजी का ही तो प्रसाद है ।

ब्रहमगिआनी की मिति1

कउनु बखानै

ब्रहमगिआनी की गति ब्रहमगिआनी जानै

ब्रहमगिआनी मुकति2 जुगति3

         जीअ4 का दाता

ब्रहमगिआनी पूरन पुरखु5 बिधाता

ब्रहमगिआनी का कथिआ जाइ अधाख्यरु 6

ब्रहमगिआनी सरब7 का ठाकुरु8

ऐसे ब्रह्मज्ञानियों के आदर का दिवस हर रोज है लेकिन व्यासपूर्णिमा विशेष है । ऐसे ब्रह्मस्वरूप व्यासजी के आदर में व्यासपूर्णिमा मनाते हैं । जो ब्रह्मज्ञानियों का आदर करता है वह आदरणीय हो जाता है । मैं थोड़े ही बोलता हूँ कि आप मेरा आदर करो लेकिन मैंने अपने गुरु का आदर किया तो आप मेरा आदर करते हैं । जो ब्रह्मज्ञानियों का दर्शन करता है उसको करोड़ों तीर्थ-स्नान करने का फल मिलता है । जो गुरु की विद्या को पचाता है वह सर्वोपरि विद्या का धनी हो जाता है । गुरु की विद्या ‘आत्मज्ञान’ होती है । जो ब्रह्मज्ञानी के दैवी कार्य की सेवा करता है उसका निष्काम कर्मयोग फलित होने लगता है, भक्तियोग भरपूर होने लगता है, ज्ञानयोग चमकने लगता है ।

तीनों प्रकार से विकास

गुरु के सिद्धांत को लोगों तक पहुँचाना, दूसरों के काम आना - यह समाज की सेवा है । गुरु के ज्ञान में अपने को डुबाना, एकांत में अपने-आपमें आना - यह अपनी सेवा है । प्रभु को अपना मानकर उनकी स्मृति और प्रेम जगाना - यह प्रभु की सेवा है । तीनों प्रकार से विकास-ही-विकास है ।

गुरुपूनम का संदेश

गुरुपूनम आपको यह संदेशा देती है कि ‘आप लघु होकर भले आये हैं लेकिन लघु हो के संसार से विदा न होना । लघु चीजों में प्रीति करके, लघु आकर्षणों में भटक के नीच योनियों में नहीं जाना बल्कि गुरु-तत्त्व में प्रीति करके परमात्म-तत्त्व को जान लेना । इसीके लिए तुम्हारा जन्म हुआ है ।’

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1. परिमाण, माप, उनकी स्थिति का अनुमान 2. मुक्ति 3. युक्ति 4. जीवन 5. पूर्ण पुरुष 6. ब्रह्मज्ञानी की महिमा का आधा अक्षर भी वर्णन नहीं किया जा सकता 7. सर्व 8. भगवान/पूज्य


 

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The great festival giving supreme knowledge, happiness and merit     

 

– Pujya Sant Shri AsharamJi Bapu

(Guru-Purnima: 16th July)


The history of Guru Punam is extremely glorious. The knowledge of Guru Punam is supreme knowledge. The gain of Guru Punam is the highest gain. The happiness of Guru Punam is paramount happiness and the merit of Guru Punam is paramount merit. This festival is so universal and great that no other festival can equal it. Guru Punam is celebrated in the memory of the Great Sage Veda Vyasaji who started thinking about people’s welfare from his childhood.

Where Indra also becomes a pygmy

The word ‘Guru’ holds great significance. In the word ‘Guru’, the syllable ‘Gu’ means darkness and the syllable ‘Ru’ means the remover of darkness, light. There is also another interpretation of the same word. The one, who gives the light of Self-knowledge which dispels the darkness of ignorance, is Guru. ‘Guru’ is also one of the thousand names of Lord Vishnu described in Shri Vishnu Sahasranaama.

In the word ‘Guru’, ‘G’ means the producer of the mass of religious merits and  ‘R’ means the destroyer of the mass of sins, and ‘U’ means the power to manifest the Unmanifest Atman – all these are contained in the word ‘Guru’. The word ‘Guru’ has the power to destroy sin, increase merit and manifest the Unmanifest Brahman, Supreme Self. As the tree is hidden in the seed, in the same way the word ‘Guru’ is the Mantra for revealing God immanent in every creature.


And those saints who give divine joy and knowledge, who kindle love for God are also called Guru. How are those Saints? Lord Shiva says:


जलानां सागरो राजा यथा भवति पार्वति ।

गुरुणां तत्र सर्वेषां राजायं परमो गुरुः ।।


“Just as the sea is the king of all waters, the ‘Param’ Guru is the king among Gurus.”


Just as the sea is the king of all Water bodies, so also, one who gives the knowledge of God, love for God, and the name of God for chanting, and enables us to attach our heart to God with power, grace, and instructions, is the King among all Gurus, the supreme Guru.

There are various levels of great persons in the world, but the Self-realized Guru is the highest among all the great persons. As the elephant is bigger than all creatures, but the elephant is also a pygmy in comparison with the Himalayas, likewise amongst all respectable people, Indra is great like the elephant among animals, but in comparison with the Self-realized Guru who imparts the knowledge of Atman and Paramatma, Indra also looks like a pygmy.


Guru Punam is celebrated by people of all castes and classes. As well as humans, this festival is also celebrated by gods and demons. Not only this, Lord Shri Krishna would go to the feet of Guru Sandipani and Lord Rama would go to the feet of Guru Vasishtha. Such is the importance of the Guru Punam Festival!


The Day of respecting the Self-realized Saints


Guru Punam is a festival which actually makes the small (individual soul) big (Supreme Self). It makes one meet the immortal Lord using the mortal body as an instrument. Old age will finally lead one to death. Guru Punam is an arrangement for meeting God with Guru’s grace before death. Guru Punam has the arrangement for making the helpless jiva a liberated, excellent Knower of Brahman (Brahmajnani). One cannot digest Guru’s Knowledge free of cost, one must do something. We do something but can we repay the debt we owe to this Guru Punam?


Brahmajnanis have given so many things to society. Millions of people from India and abroad listen to me, this is also the Grace of my Brahmajnani Gurudev Lilashahji.


ब्रहमगिआनी की मिति1

कउनु बखानै ।

ब्रहमगिआनी की गति ब्रहमगिआनी जानै ।

ब्रहमगिआनी मुकति2 जुगति3

         जीअ4 का दाता ।

ब्रहमगिआनी पूरन पुरखु5 बिधाता ।

ब्रहमगिआनी का कथिआ न जाइ अधाख्यरु ।6

ब्रहमगिआनी सरब7 का ठाकुरु8 ।


“Who can describe the limits of the Brahmajnani? Only the Brahmajnani can know the state of the Brahmajnani. The Brahmajnani is the Giver of the way of liberation of the soul. The Brahmajnani is the Perfect Supreme Being, who orchestrates all. The Brahmajnani cannot be described in words. The Brahmajnani is the Lord and Master of all.”


Such Self-realized Saints should be honoured everyday but Vyasa Purnima is a special day for it. Vyasa Purnima is celebrated in honour of Vyasaji, the embodiment of Brahman. One who honours Brahmajnanis becomes honourable. I have never asked you to honour me, but you honour me because I have honoured my Guru. One who gets the Darshan of Brahmajnanis gets the fruit of taking a holy bath in crores of pilgrimages. The one who assimilates knowledge imparted by the Guru becomes the master of the Supreme Knowledge. Guru’s Knowledge is ‘Self-Knowledge’. The one, who assists through his service in the divine work of a Brahmajnani, gets the fruit of Selfless Karma Yoga, advances rapidly on the path of Bhakti Yoga and glows with the splendour of Jnana Yoga.


Development by three ways


To promulgate the principles of Guru amongst the people, to help others – is service to society. To immerse oneself in the Knowledge of the Guru, to come to one’s own self in seclusion – is service to oneself. To awaken the love and remembrance of God, considering God one’s own, is service to God. By all three ways one gets nothing but development.

 


The message of Guru Punam


Guru Punam gives you the message that you might have come to this world as a small being but you do not depart from the world (die) being small. Do not go to lower forms of life (after death) by loving and hankering after small things, but realise the Truth of the Supreme Self, by loving the Guru Tattva. You have taken birth for this purpose.

 

 

[Rishi Prasad Edition June 2019 ]

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