आत्मजागृति व कल्याणस्वरूप आत्मा में आत्मविश्रांति पाने का पर्व
Ashram India

आत्मजागृति व कल्याणस्वरूप आत्मा में आत्मविश्रांति पाने का पर्व

- पूज्य बापूजी

(महाशिवरात्रि: 4 मार्च)

महाशिवरात्रि धार्मिक दृष्टि से देखा जाय तो पुण्य अर्जित करने का दिन है लेकिन भौगोलिक दृष्टि से भी देखा जाय तो इस दिन आकाशमंडल से कुछ ऐसी किरणें आती हैं, जो व्यक्ति के तन-मन को प्रभावित करती हैं । इस दिन व्यक्ति जितना अधिक जप, ध्यान व मौन परायण रहेगा, उतना उसको अधिक लाभ होता है ।

महाशिवरात्रि भाँग पीने का दिन नहीं है । शिवजी को व्यसन है भुवन भंग करने का अर्थात् भुवनों की सत्यता को भंग करने का लेकिन भँगेड़ियों ने ‘भुवनभंग’ को ‘भाँग’ बनाकर घोटनी से घोंट-घोंट के भाँग पीना चालू कर दिया । शिवजी यह भाँग नहीं पीते हैं जो ज्ञानतंतुओं को मूर्च्छित कर दे । शिवजी तो ब्रह्मज्ञान की भाँग पीते हैं, ध्यान की भाँग पीते हैं । शिवजी पार्वतीजी को लेकर कभी-कभी अगस्त्य ऋषि के आश्रम में जाते हैं और ब्रह्मविद्या की भाँग पीते हैं ।

आप कौन-सी भाँग पियोगे ?

तो आप भी महाशिवरात्रि को सुबह भाँग पीना । लेकिन कौन-सी भाँग पियोगे ? ब्रह्मविद्या, ब्रह्मज्ञान की भाँग । सुबह उठकर बिस्तर पर ही बैठ के थोड़ी देर ‘हे प्रभु ! आहा... मेरे को बस, रामरस मीठा लगे, प्रभुरस मीठा लगे... शिव शिव... चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।’ ऐसा भाव करके ब्रह्मविद्या की भाँग पीना और संकल्प करना कि ‘आज के दिन मैं खुश रहूँगा ।’ और ‘ॐ नमः शिवाय ।... नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ।’ बोल के भगवान शिव की आराधना करते-करते शिवजी को प्यार करना, पार्वती माँ को भी प्रणाम करना । फिर मन-ही-मन तुम गंगा-किनारे नहाकर आ जाना । इस प्रकार की मानसिक पूजा से बड़ी उन्नति, शुद्धि होती है । यह बड़ी महत्त्वपूर्ण पूजा होती है और आसान भी है, सब लोग कर सकते हैं ।

गंगा-किनारा नहीं देखा हो तो मन-ही-मन ‘गंगे मात की जय !’ कह के गंगाजी में नहा लिया । फिर एक लोटा पानी का भरकर धीरे-धीरे शिवजी को चढ़ाया, ऐसा नहीं कि उँडेल दिया । और ‘नमः शिवाय च मयस्कराय च...’ बोलना नहीं आये तो ‘जय भोलानाथ ! मेरे शिवजी ! नमः शिवाय, नमः शिवाय...’ मन में ऐसा बोलते-बोलते पानी का लोटा चढ़ा दिया, मन-ही-मन हार, बिल्वपत्र चढ़ा दिये । फिर पार्वतीजी को तिलक कर दिया और प्रार्थना की : ‘आज की महाशिवरात्रि मुझे आत्मशिव से मिला दे ।’ यह प्रारम्भिक भक्ति का तरीका अपना सकते हैं ।

व्रत की 3 महत्त्वपूर्ण बातें

महाशिवरात्रि वस्त्र-अलंकार से इस देह को सजाने का, मेवा-मिठाई खाकर जीभ को मजा दिलाने का पर्व नहीं है । यह देह से परे देहातीत आत्मा में आत्मविश्रांति पाने का पर्व है, संयम और तप बढ़ाने का पर्व है । महाशिवरात्रि का व्रत ठीक से किया जाय तो अश्वमेध यज्ञ का फल होता है । इस व्रत में 3 बातें होती हैं :

(1) उपवास : ‘उप’ माने समीप । आप शिव के समीप, कल्याणस्वरूप अंतर्यामी परमात्मा के समीप आने की कोशिश कीजिये, ध्यान कीजिये । महाशिवरात्रि के दिन अन्न-जल या अन्न नहीं लेते हैं । इससे अन्न पचाने में जो जीवनशक्ति खर्च होती है वह बच जाती है । उसको ध्यान में लगा दें । इससे शरीर भी तंदुरुस्त रहेगा ।

(2) पूजन : आपका जो व्यवहार है वह भगवान के लिए करिये, अपने अहं या विकार को पोसने के लिए नहीं । शरीर को तंदुरुस्त रखने हेतु खाइये और उसकी करने की शक्ति का सदुपयोग करने के लिए व्यवहार कीजिये, भोग भोगने के लिए नहीं । योगेश्वर से मिलने के लिए आप व्यवहार करेंगे तो आपका व्यवहार पूजन हो जायेगा ।

पूजन क्या है ? जो भगवान के हेतु कार्य किया जाता है वह पूजा है । जैसे - बाजार में जो महिला झाड़ू लगा रही है, वह रुपयों के लिए लगा रही है । वह नौकरी कर रही है, नौकरानी है । और घर में जो झाड़ू लगा रही है माँ, वह नौकरानी नहीं है, वह सेवा कर रही है । लेकिन हम भगवान के द्वार पर झाड़ू लगा रहे हैं तो वह पूजा हो गयी, भगवान के लिए लगा रहे हैं । महाशिवरात्रि हमें सावधान करती है कि आप जो भी कार्य करें वह भगवत् हेतु करेंगे तो भगवान की पूजा हो जायेगी ।

(3) जागरण : आप जागते रहें । जब ‘मैं’ और ‘मेरे’ का भाव आये तो सोच लेना कि ‘यह मन का खेल है ।’ मन के विचारों को देखना । क्रोध आये तो जागना कि ‘क्रोध आया है ।’ तो क्रोध आपका खून या खाना खराब नहीं करेगा । काम आया और जग गये कि ‘यह कामविकार आया है ।’ तुरंत आपने हाथ-पैर धो लिये, रामजी का चिंतन किया, कभी नाभि तक पानी में बैठ गये तो कामविकार में इतना सत्यानाश नहीं होगा । आप प्रेमी हैं, भक्त हैं और कोई आपकी श्रद्धा का दुरुपयोग करता है तो आप सावधान हो के सोचना कि ‘यह मेरे को उल्लू तो नहीं बना रहा है ?’

आप जगेंगे तो उसका भी भला होगा, आपका भी भला होगा । तो जीवन में जागृति की जरूरत है । जो काम करते हैं उसे उत्साह, ध्यान व प्रेम से करिये, बुद्धू, मूर्ख, बेवकूफ होकर मत करिये ।

‘जागरण’ माने जो भी कुछ जीवन में आप लेते-देते, खाते-पीते या अपने को मानते हैं, जरा जगकर देखिये कि क्या आप सचमुच में वह हैं ? नहीं, आप तो आत्मा हैं, परब्रह्म के अभिन्न अंग हैं । आप जरा अपने जीवन में जाग के तो देखिये !


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Festival for awakening and repose in the Self


(Maha Shivaratri: 4th March)


Maha Shivratri, from a religious viewpoint, is a day to earn religious merit. If seen from a geographic viewpoint, cosmic rays come to the earth on this day from space that affect the human mind and body. On this day the more one will do japa and meditation while observing mauna (silence), the more will he benefit.

 

Maha Shivaratri is not a day to drink bhang (a drink prepared from hemp). Lord Shiva has a habit of destroying the worlds, which means destroying the sense of reality of the worlds, but Bhang addicts misinterpreted it and started to drink Bhang (on this day). Lord Shiva doesn’t drink Bhang which makes the neurons unconscious. Lord Shiva drinks the Bhang of Brahma Jnana and meditation. Lord Shiva, along with His consort Parvati, goes to the hermitage of sage Agastya to drink the Bhang of Brahma Vidya.


Which Bhang will you drink?


So you should also drink Bhang in the morning of Maha-Shivaratri. But which Bhang will you drink? Drink the Bhang of Brahma Vidya (the science of Brahman, absolute reality), Brahma Jnana (knowledge of Brahman). Wake up in the morning and pray to God while sitting in bed, ‘Ah! O God! May I like the joy of God, divine joy only... Shiva Shiva… I am Knowledge Absolute, Bliss Absolute… I am He, I am He. (Shivoham, Shivoham).’ Drink the Bhang of Brahma Vidya with such mental attitude. And resolve that ‘today, I will remain happy.’ Love Lord Shiva while worshipping Him and salute mother Parvati while chanting Om Namah Shivaay… Namah Shambhavaaya Cha Mayobhavaaya Cha Namah Shankaraaya Cha Mayaskaraaya Cha Namah Shivaaya Cha Shivataraaya Cha….’ Then mentally go to the bank of the River Ganges, have a holy dip and come back. This type of mental worship uplifts and purifies one greatly. It is very important worship and very easy, anyone can do it.

 

If one hasn’t seen the banks of the River Ganges, chantGanga Mata Ki Jai and mentally take a holy dip. Then fill a jug with water and slowly pour on a Shivalingam, don’t sprinkle the water hurriedly. If you do not know how to chant Namah Shivaaya Cha Mayaskaraaya Cha…’ then pour water on the Shivalingam while mentally chanting Jai Bholaa naath… Namah Shivaaya Namah Shivaaya…’, mentally offer a flower garland and Bael leaves. Then apply a tilak with the Kumkum to goddess Parvati and pray: ‘Please let me meet the Atma Shiva, Shiva as Atman.’ You can worship by this type of devotional practice for beginners.

 

Three important points of Maha Shivaratri Vrata


Maha Shivaratri is not an occasion to decorate the body with new clothes, nor for relishing sweets with your tongue. It is an occasion to repose in the Atman, transcending the body. It is an occasion to increase continence and penance. If observed properly, the vrata of Maha Shivaratri gives religious merits of performing an Ashwamedha Yajna. This vrata has 3 important things: 1. Upavaas (fast) 2. Poojan (worship) and 3. Jagaran (vigil).


(1) Upavaas: Upa means near to. Try to get close to Shiva, Kalyana Swaroopa, antaryamin (inner ruler) Supreme Self through meditation. People do not take food or even water on Maha Shivaratri. It saves the Life Energy that is used in digestion. Use that energy in meditation. It will keep the body healthy.


(2) Poojan: Do your actions for God; not for satisfaction of your ego or lust. Eat to keep the body healthy and do work to make good use of your power of doing, not for enjoyment of pleasures. If you perform action to meet God, your action will become Poojan (worship).

What is worship? Any action done for God is worship. The woman sweeping at the market place is doing it for money. She is doing her job. She is a maid servant, but a mother sweeping in her own home is doing service. She is not a (paid) servant. If we sweep at the door of God, we are worshiping, because we are doing it for God. Maha Shivaratri alerts us that whatever actions we do, if we do it for God, it will become Pooja (worship).


(3) Jaagaran (vigil): Be vigilant. When a thought of ‘I’ and ‘mine’ arises, think that it is a play of the mind. Watch the thoughts of your mind. If you get angry, be alert: ‘Anger has come.’ That anger will neither poison your blood nor cause you to weep. If you feel lusty, be alert: “lust has come.” Wash your hands and feet immediately. Think about Lord Rama. Sit in a bath tub or a river submerging your body up to the navel. Then lust will not ruin you much. If you are a devotee and if someone is misusing your devotion, then be alert and think: ‘isn’t he cheating me?’ if you are alert, it will do good to you as well as to him. So awakening is required in life. Whatever action you do, do it with enthusiasm, attention and devotion, don’t do it foolishly.

 

Jaagaran means, keep awake to see whether you are actually what you believe yourself to be? Whatever you eat, drink, give or take, is it reality? No, you are Atman, you are an inseparable part of Supreme Brahman. Just wake up and see.

 

[Rishi Prasad Issue-214-January-2019]

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