नयी चेतना, उत्साह व स्फूर्ति के संचार का प्रेरक पर्व मकर संक्रांति
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नयी चेतना, उत्साह व स्फूर्ति के संचार का प्रेरक पर्व मकर संक्रांति

मकर संक्रांति पर्व पुण्यकाल : 15 जनवरी (सूर्योदय से सूर्यास्त तक)

मकर संक्रांति का पर्व हमारे जीवन में आध्यात्मिकता को सुदृढ़ करता है तथा राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द को बढ़ाता है । सूर्य की गति से संबंधित होने से यह पर्व जीवन में नयी चेतना, उत्साह व स्फूर्ति के संचार का प्रेरक है । हमारे ऋषि-मुनियों और शास्त्रों ने इस अवसर को अत्यंत शुभ और पुण्यप्रद बताया है । इस दिन जप, तप, दान, प्रातः पुण्यस्नान, अनुष्ठान आदि का विशेष महत्त्व है ।

सूर्य के उत्तरायण होने पर दिन बड़े होने लगते हैं । इससे मनुष्य की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है और वह प्रगति की ओर अग्रसर होता है । तत्त्वदर्शी महर्षियों ने पर्व व व्रत-विज्ञान की विशेष महिमा बतायी है । उनके अनुसार व्रतों के प्रभाव से प्राणी का अंतःकरण शुद्ध होता है, संकल्पशक्तिबढ़ती है तथा ज्ञानतंतु विकसित होते हैं । मकर संक्रांति के दिन क्रोध करने व वृक्षों को काटने से विशेषरूप से बचें ।

विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति तथा स्व-स्वास्थ्यवर्धन एवं सर्वकल्याण के लिए मकर संक्रांति के दिन तिल का 6 प्रकार से प्रयोग करना चाहिए - तिल-जल से स्नान, तिल-दान, तिल-मिश्रित भोजन करना, तिल-जल अर्पण (पितरों हेतु), तिल से हवन और तिल का उबटन लगाना ।

मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी स्वर्ग से उतरकर भगीरथ के पीछे-पीछे चल के कपिल मुनि के आश्रम से होती हुईं सागर में जाकर मिली थीं । महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इसलिए मकर संक्रांति पर गंगासागर (प. बंगाल) में मेला लगता है ।

सूर्य की 7वीं किरण भारतवर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देनेवाली है । इसका प्रभाव भारतवर्ष में गंगा-यमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है । इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला (जो मकर संक्रांति के दिन से प्रारम्भ होकर एक माह तक चलता है) व कुम्भ जैसे विशेष पर्व आयोजित होते हैं ।

क्यों है यह पतंग महोत्सव ?

यह पर्व ‘पतंग महोत्सव’ के नाम से भी जाना जाता है । पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य उद्देश्य है कि कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना । इस मौसम में सुबह का सूर्य-प्रकाश स्वास्थ्यवर्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है ।

इस पर्व पर भिन्न-भिन्न रंग की पतंगें गगनगामी होती हैं । चाहे छोटी पतंग हो, चाहे बड़ी, चाहे किसी भी रंग की हो; तब तक उसमें उड़ान और नाच-कूद होती है, जब तक धागा सूत्रधार के हाथ में होता है । ऐसे ही समाज के छोटे या बड़े पद पर जो कोई व्यक्ति है उसका होना तब तक है, जब तक सूत्रधार के साथ प्राणरूपी डोर लगी है; वहाँ से प्राणरूपी डोर का संबंध हटते ही वह मुर्दा हो जाता है ।

इस सच्चाई को जानकर राग-द्वेष भूलें, जो हमारी शक्तियों का ह्रास करता है । बीते हुए के शोक, मोह, फरियाद से उपराम होकर नित्य सत्-चित्-आनंदस्वरूप परमेश्वर में हम प्रतिष्ठित हों ।

पूज्य बापूजी का संदेश

‘‘इस दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से 10 हजार गोदान करने का फल होता है । उत्तरायण पर्व के दिन जो भी सत्कर्म करते हैं वह अक्षय पुण्यदायी होता है । तिल और गुड़ के व्यंजन, चावल व चने की दाल की खिचड़ी आदि ऋतु-अनुरूप पोषण और ऋतु-परिवर्तनजन्य रोगों से रक्षा प्रदान करते हैं । ऋतु-परिवर्तन के प्रभाव से व्यक्ति को जो भी रोग-शोक से भिड़ना होता है, उसमें वह तिल-मिश्रित जल से स्नान आदि से भी सफल होता है । देवताओं का ब्राह्ममुहूर्त और लौकिक-आध्यात्मिक विद्याओं की सिद्धि का काल है उत्तरायण पर्व का दिन । तो इस पर्व के एक दिन पहले रात को सोते समय चिंतन करें कि पंचभौतिक शरीर पंचभूतों में, मन, बुद्धि, अहंकार प्रकृति में और मैं परमात्मा में शांत हो रहा हूँ । कल प्रभात को भगवान सूर्य दक्षिण से मुख मोड़कर उत्तर की तरफ चलेंगे, ऐसे ही मैं नीचे के केन्द्रों से मुख मोड़कर ध्यान-भजन और समता के सूर्य की तरफ, ऊपर के केन्द्रों की तरफ बढ़ूँगा ।’’

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