ऐसी सूझबूझ का फायदा लेकर वे सेवा, सत्कर्म में लगे रहते हैं
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ऐसी सूझबूझ का फायदा लेकर वे सेवा, सत्कर्म में लगे रहते हैं

"कबिरा निंदक ना मिलो पापी मिलो हजार ।

एक निंदक के माथे पर लाख पापिन को भार ।।"

जो निर्दोषों पर झूठे आरोप लगाते हैं, अनर्गल आलाप करते हैं, फैलाते हैं उनको पता ही नहीं कि वे अपना भविष्य कितना अंधकारमय कर रहे हैं ! भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र बाबू के विषय में कुछ निंदकों ने अपनी दुष्ट मानसिकता से आरोप लगाये । उनकी घिनौनी मानसिकता पर अंकुश लगाने के लिए सज्जन लोगों ने राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू को कहा : आप उनके विषय में प्रतिक्रिया दें या चुप करा दें ।

बुद्धिमान राजेन्द्र बाबू ने यह बात सुनी-अनसुनी कर दी । ऐसा 2-3 बार होने पर सज्जन मानसिकतावालों ने राजेन्द्र बाबू को कहा: आप इनको सबक सिखाने में समर्थ हैं फिर भी इतनी उदासीनता क्यों बरतते हैं? हमें समझ में नहीं आता, कृपया समझाइये ।

प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू ने कहा : हलकी मानसिकतावालों का स्वभाव है अनर्गल बकवास । कुत्ते अकारण ही भौंकते रहते हैं और हाथी उनको चुप कराने जाय तो अनर्गल बकने, भौंकने वालों का महत्त्व बढ़ जाता है । हाथी अपनी चाल से चलता जाय ।

अनर्गल आरोप लगानेवाले अपनी दुष्ट मानसिकता बढ़ा के अपना भविष्य अंधकारमय कर रहे हैं । वे न शास्त्र की बात मानते हैं न संतों की वाणी मानते हैं लेकिन कर्म का सिद्धांत अकाट्य है । उनको पता ही नहीं कि भ्रामक प्रचार करके वे समाज का और अपना कितना अहित कर रहे हैं !

कई बुद्धिमान साधक, संयमी-सदाचारी बहू-बेटियाँ, समर्पित सेवाभावी साधक, संचालक राजेन्द्र बाबू की सूझबूझ का फायदा लेकर अपने सेवाकार्य, सत्कर्म में लगे रहते हैं ।

'हाथी चलत है अपनी चाल में ।

कुत्ता भौंके वा को भौंकन दे ।।"

संत मीराबाई को विक्रम राणा ने कहा : 'भाभीजी ! तुम्हारी बहुत बदनामी हो रही है ।"

तो मीराबाई ने कहा :

"राणाजी! म्हांने या बदनामी लागे मीठी ।

कोई निंदो कोई बिंदो, मैं चलूँगी चाल अनूठी ।

"मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, दुर्जन जलो जा अँगीठी ।

राणाजी ! म्हांने या बदनामी लागे मीठी ।"

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