गुरुप्रसाद की है अद्भुत महिमा !
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गुरुप्रसाद की है अद्भुत महिमा !

आंध्र प्रदेश के मंत्रालयम गाँव में एक प्रसिद्ध संत हो गये राघवेन्द्र स्वामी । उनका एक शिष्य था वेंकण्णा । वह मंदबुद्धि और जिद्दी था पर गुरुजी के प्रति निष्ठावान, श्रद्धालु और अहोभाव से पूर्ण था । वह अपने गुरुदेव को साक्षात् ईश्वर तुल्य मानता था ।

जब उसकी शिक्षा पूरी हो गयी और वह अपने घर जाने लगा तब आज्ञा लेने गुरुदेव के पास गया । उस समय गुरुजी स्नान कर रहे थे । उन्होंने वेंकण्णा को आशीर्वाद दिया और प्रसादरूप में वही मिट्टी दे दी जिससे वे स्नान कर रहे थे । वेंकण्णा के लिए वह मिट्टी नहीं, महाप्रसाद था । उसने उसे एक कपड़े में बाँधा और वहाँ से चल पड़ा ।

रास्ते में रात हुई तो उसने एक गाँव में किसी ब्राह्मण के घर के बाहर बरामदे में विश्राम किया । उस ब्राह्मण की पत्नी को रात्रि में प्रसूति की पीड़ा हो रही थी । अजनबी जगह होने से वेंकण्णा को नींद नहीं आ रही थी, तभी उसे एक ब्रह्मराक्षसी दिखाई दी । वह घर के अंदर जाना चाह रही थी पर दरवाजे के पास गुरुजी की दी हुई मिट्टी की पोटली रखी होने से वह अंदर नहीं जा पा रही थी । उसने वेंकण्णा से कहा कि ‘‘इस कपड़े को यहाँ से हटा दो ।’’

वेंकण्णा ने गाँठ खोलकर थोड़ी-सी मिट्टी घर की चौखट पर बिखेर दी ।

ब्रह्मराक्षसी बोली : ‘‘तुमको जो चाहिए वह दूँगी लेकिन इसको हटा दो ।’’

वेंकण्णा ने उसकी परीक्षार्थ कहा : ‘‘सोना लाकर दो ।’’ उसने क्षणभर में सोना ला दिया ।

ब्रह्मराक्षसी : ‘‘अब तो मुझे जाने दो, मैं अंदर जाकर जन्म लेनेवाले बच्चे को खाऊँगी ।’’

वेंकण्णा ने चुटकीभर मिट्टी ब्रह्मराक्षसी पर फेंक दी, जिससे उसकी राक्षसी देह नष्ट हो गयी और उसकी सद्गति हो गयी ।

वेंकण्णा वहीं सो गया ।

सुबह गृहस्वामी ने उससे परिचय पूछा तो वेंकण्णा ने अपने और रात की घटना के बारे में सब बताया ।

ब्राह्मण ने कृतज्ञतापूर्वक कहा : ‘‘आज तक मेरे घर जो भी बच्चे जन्मे उनमें से एक भी नहीं बचा । आज आपके कारण हम इस पीड़ा से बच गये ।’’

वेंकण्णा : ‘‘यह तो मेरे गुरुदेव के प्रसाद का प्रताप है !’’

जब सद्गुरु द्वारा स्पर्शित मिट्टीरूपी प्रसाद से मासूम बालक को जीवनदान मिल सकता है, ब्रह्मराक्षसी की सद्गति हो सकती है तो सद्गुरु के आत्मानुभव को स्पर्श कर उनके श्रीमुख से निःसृत अमृतवचनरूपी महाप्रसाद पचानेवाले, गुरुदेव के बताये मार्ग पर दृढ़ता से चलनेवाले शिष्य की चौरासी के चक्कर से मुक्ति हो जाय इसमें क्या आश्चर्य है !

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