सफल जीवन जीने की कुंजी
Ashram India
/ Categories: Year-2018, Dec-2018

सफल जीवन जीने की कुंजी

- पूज्य बापूजी

जिससे दिखता है उसमें आस्था होनी चाहिए और जो दिखता है उसमें विवेक होना चाहिए । जगत की जितनी भी चीजें दिखती हैं वे सब पहले नहीं थीं, बाद में भी नहीं रहेंगी और अभी भी ‘नहीं’ की ओर ही जा रही हैं । ...तो जो चीजें ‘नहीं’ की ओर जा रही हैं उनमें आस्था करने की कोई जरूरत नहीं है । उनका उपयोग भले कर लो, उपयोग करने की मना नहीं है लेकिन जो उनमें आस्था करता है वह ठीक से उनका उपयोग नहीं कर सकता । इसके विपरीत, जो आस्था के बिना उनका उपयोग कर लेता है वह उनमें बँधता नहीं है ।

करोड़ीमल सेठ ने सोने की 37 ईंटें इकट्ठी कर लीं । वह रोज उन्हें तिजोरी में से निकाल के अगरबत्ती करता एवं सोचता कि ‘अब 38 ईंटें करनी हैं... ।’ उसकी आस्था थी कि ‘पैसे बढ़ें’ उधर परिवार भले भूखा मरे ।

उसका बड़ा लड़का था थोड़ा चतुर । वह नकली चाबी ले आया । धंधे-रोजगार आदि में जरूरत पड़ने पर वह एक ईंट निकालता व उसकी जगह ठीक वैसी-की-वैसी सोने की पॉलिश करवायी हुई पीतल की ईंट रख देता । सेठ को लगता कि सोने की 37 ईंटें ही हैं । इस प्रकार बड़े लड़के को जब-जब पैसे की जरूरत पड़ती, तब-तब एक-एक ईंट हटाकर पॉलिश की हुई ईंट रखता जाता और उन पैसों से अपना धंधा-रोजगार बढ़ाता जाता । इस प्रकार ईंटों का उपयोग होने लगा ।

ऐसा करते-करते करोड़ीमल सेठ मरने को पड़ा । लड़के को हुआ कि ‘मरते वक्त अगर पिताजी की आस्था उन ईंटों में ही रह गयी तो पता नहीं उनकी क्या गति हो !’ अतः वह बोला : ‘‘पिताजी ! बड़ों के आगे झूठ बोलना ठीक नहीं होता । लेकिन मैं उस समय सच बोलता तो आप ज्यादा जी नहीं पाते क्योंकि आप सोने की ईंटों में आस्था का सुख ले रहे थे । आप मुझे कहते थे कि ‘‘तिजोरी का खयाल रखना, ईंटें बढ़ाते रहना ।’’ लेकिन जो आपको 37 ईंटें दिखती थीं वे भी मैंने हटा दी हैं, अब बढ़ाना क्या है ।’’

पिताजी : ‘‘कैसे ?’’

‘‘हर 4-6 महीने में पैसे की जरूरत पड़ती थी अपने धंधे-रोजगार के लिए, भाइयों को पढ़ाने-लिखाने के लिए, घर-खर्च चलाने के लिए... किंतु आपको दुःख न हो इस तरह से मैंने सोने की सब ईंटें बदल दी हैं । ये सब ईंटें पीतल की हैं ।’’

‘‘पीतल की हैं !’’ यह कहकर सेठ मर गया । पीतल की ईंटों को सोने की मानकर जो सुख उसको मिल रहा था वह विवेक का सुख नहीं वरन् आस्था का सुख था । जगत में की हुई आस्था का सुख ज्यादा टिकता नहीं है और परमात्मा में की हुई आस्था का सुख कभी खूटता नहीं है । अतः आस्था करो तो परमात्मा में करो और जगत की चीजों का विवेक से उपयोग करके अपना काम बना लो - यही सफल जीवन जीने की कुंजी है ।

Previous Article नयी चेतना, उत्साह व स्फूर्ति के संचार का प्रेरक पर्व मकर संक्रांति
Print
737 Rate this article:
5.0
Please login or register to post comments.

LKS recent Articles

E-Subscription of Lok Kalyan Setu