जैसे वह न रहा वैसे यह भी न रहेगा !
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जैसे वह न रहा वैसे यह भी न रहेगा !

एक समय एक राजा विचरता हुआ अपने आत्मस्वरूप में जगे किन्हीं संत की कुटिया पर पहुँचा । उन्हें दंडवत् प्रणाम करके निवेदन किया : ‘‘भगवन् ! मुझे कोई ऐसी बात बताइये जिससे संसार मुझे डोलायमान न कर सके ।’’

संत ने कागज पर कुछ लिखा और उसे ताबीज में बंद करके राजा को देते हुए कहा : ‘‘इसे बाँह में बाँध लो । जब तुम्हारे सामने असहनीय कष्ट आये तब इसे खोलकर बार-बार पढ़ना ।’’

राजा बड़ा श्रद्धावान था । उसने संत की आज्ञा को शिरोधार्य किया । कुछ समय बीतने पर किसी बलवान राजा ने उसके राज्य पर कब्जा कर लिया । राजा फटे-पुराने वस्त्रों में अकेला वन में विचरने लगा ।

एक दिन वह नदी-किनारे बैठकर चुल्लू भर-भर के पानी पी रहा था तब उसकी नजर बाँह में बँधे हुए ताबीज पर गयी । ताबीज खोला तो उसमें लिखा था कि ‘जैसे वह न रहा वैसे यह भी न रहेगा ।’

राजा उसे बार-बार पढ़कर चिंतन-मनन करने लगा । महात्मा के सत्संकल्प का फल यह हुआ कि राजा का विवेक जगा । वह प्रसन्न रहने लगा । वह मन-ही-मन गुनगुनाता : ‘जैसे वह राजाई न रही वैसे भिखारीपना भी न रहेगा । जैसे रात न रही वैसे दिन भी न रहेगा । जैसे कल न रहा वैसे आज भी न रहेगा ।’

इस प्रकार वन में विचरते-विचरते राजा एक ब्रह्मवेत्ता संत के पास पहुँचा और अहोभाव से भरकर उनके चरणों में पड़ गया । उसने संत को सब बात बताकर कहा : ‘‘महाराज ! जैसे वह न रहा वैसे यह भी न रहेगा । यह मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ पर उसको जाननेवाला तीसरा मैं कौन हूँ ?’’

संत ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा : ‘‘वह कभी न बदलनेवाला कूटस्थ आत्मा तू है । तेरी जानकारी में अनेक सुख-दुःख आये और गये पर तू ज्यों-का-त्यों अचल-अडोल रहा है । अब उसे अपना वास्तविक स्वरूप जानकर अजर-अमर हो जा ।’’

संत के कृपा-प्रसाद से राजा ने अपने वास्तविक ‘मैं’ - आत्मस्वरूप को जान लिया ।

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