चल पड़ो, देर न करो,  अन्यथा पछताओगे !
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चल पड़ो, देर न करो, अन्यथा पछताओगे !

पूज्य बापूजी के जोधपुर से आये संदेश व पूर्व के सत्संग से संकलित

कलकत्ता (वर्तमान के कोलकाता) में लालाबाबू हो गये । लालाबाबू वर्धमान कलेक्ट—ी में ईमानदार सेरेस्तादार थे और ओड़िशा के सर्वोच्च दीवान पद पर भी रहे थे । उनके पास पैतृक सम्पत्ति भी खूब थी, जिसके वे एकमात्र उत्तराधिकारी थे । वे गंगा-किनारे रोज बैठते थे । प्रजा के प्रति दुःखकातरता की पुण्याई से एक बार शाम को ऐसी घटना घटी कि पास के मकान से आवाज आयी, भाभी अपने देवर को बुला रही है : ‘‘ऐ लाला ! ओ मेरे लालाबाबू ! उठो, शाम हो रही है, सूरज ढल रहा है । देर करोगे तो पछताओगे ।’’

तो इन लालाबाबू - सेरेस्तादार साहब का ध्यान गया... विवेक जगा और घर आये । सारी व्यवस्था जमा के तुरंत वृंदावन निकल गये । वृंदा माने भगवान की प्रिया तुलसी । तुलसी का वन था इसीलिए ‘वृंदावन’ नाम पड़ा ।

वृंदावन में लक्ष्मीचंद सेठ ने रंगजी का मंदिर बनवाया था, जो अब भी उनकी यशस्विता, कीर्ति की खबर दे रहा है । लालाबाबू ने देखा और सोचा कि ‘मैं इनसे भी बड़ा मंदिर बनवाऊँ ।’ मुकदमेबाजी करके लालाबाबू ने उनको नीचा दिखाया, मंदिर भी बनवा दिया लेकिन पुण्यकर्म इतना था कि विवेक हुआ कि ‘अभी तो मंदिर में भगवान की मूर्ति का दर्शन हो रहा है, भगवान के तत्त्व का तो अनुभव नहीं हुआ ।’ भगवान के तत्त्व के अनुभव के लिए सद्गुरु के पास गये ।

उस समय के गुरु कृष्णदासजी महाराज आत्मवेत्ता थे, उच्च पद, उच्च आध्यात्मिकता के धनी थे । उन्होंने बोला : ‘‘अभी समय नहीं हुआ है । जाओ ! समय होगा तो मैं खुद आ जाऊँगा दीक्षा देने ।’’

आये एकांत में । सोचा, ‘समय नहीं हुआ मतलब मेरी योग्यता नहीं है ।’ अयोग्यता क्या है, ढूँढ़ निकाली उस बहादुर सेरेस्तादार ने । ‘मैंने दूसरे को नीचा दिखाने के लिए मंदिर बनवाया और मुकदमेबाजी की । यही मेरी कमी है ।’ बुद्धिमान सेरेस्तादार लालाबाबू बड़े यशस्वी आत्मा थे । पहुँच गये... गरीबों को जो मिलता था न - अन्न, वस्त्र आदि... उन गरीबों की पंक्ति में बैठ गये ।

लक्ष्मीचंद को पता चला तो वे थाली में 100 स्वर्ण मोहरें ले आये, और भी सामान ले आये । बोले : ‘‘लालाबाबू ! यह क्या कर रहे हो !’’

लालाबाबू : ‘‘नहीं, मैंने अपने अहंकार को पोसा है, अब मैं इन्हींकी पंक्ति में आता हूँ ।’’

लक्ष्मीचंद का हृदय पसीजा, वे लालाबाबू के पैरों में गिर गये । लालाबाबू लक्ष्मीचंद के पैरों में गिर गये । दोनों पवित्र आत्माओं की आँखों से नीर की धाराएँ बहीं... दोनों गले लगे और लोग देखते ही रह गये कि की हुई भक्ति और सेवा-साधना देर-सवेर गलती को निकाल के फेंक देती है । और ईश्वर से मिलानेवाले महापुरुष कृष्णदासजी दौड़ते आ गये ।

बोले : ‘‘लालाबाबू ! चलो, चलो, दीक्षा का समय हो गया है । हाड़-मांस के शरीर को ‘मैं’ मत मानो । जगत को सत्य मत मानो ।...’’ सत्यस्वरूप कृष्ण-तत्त्व का उपदेश और दीक्षा देकर सद्गुरु ने लालाबाबू को जीवन्मुक्त बना दिया ।

*Ref: LKS272

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