सब दुःखों से छूटना हो तो...
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सब दुःखों से छूटना हो तो...

निष्काम कर्म करने से, साधन-भजन, त्याग-तपस्या, जप-व्रत आदि करने से अंतःकरण में ऐसे सात्त्विक विचार उठते हैं कि ‘यह सब व्यवहार आदि करके भी आखिर क्या होगा ? आखिर हम कौन हैं और किसलिए यह सब हम कर रहे हैं ?’ यानी आगे चलकर संसार का मिथ्यापन समझ में आता है और परमात्मा की, सत्यता की ओर हमारी वृत्ति मुड़ती है । फिर हम शास्त्र, संत व साधन का सहारा लेकर साध्यस्वरूप अपने आत्मा-परमात्मा को पा लेते हैं ।


लकड़ी का गट्ठर एक कंधे पर उठाकर लकड़हारा चल रहा है । जब कंधा थक जाता है, तब वह दूसरे कंधे पर उस गट्ठर को रख लेता है और कहता है : ‘अहा ! कुछ शांति, आराम मिला ।’ लेकिन थोड़ी दूर तक जाने पर दूसरा कंधा भी उस गट्ठर के भार से दुखने लगता है । फिर वह पहलेवाले कंधे पर गट्ठर लेकर कहता है : ‘अहा ! कुछ शांति, आराम मिला ।’ ऐसे ही संसार में हमारा दुःख परिवर्तित होता है तो हम सोचते हैं, ‘शांति मिली ।’ वस्तुतः वह शांति है ही नहीं । यही सारे सांसारिक सुखों की प्रकृति है । परम सुख मिलता नहीं । परम सुख तो उस अपने आत्मस्वरूप में ही है । उस स्वरूप की तरफ बढ़ने के लिए ही वेदांत का सहारा लिया जाता है । ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः । उस आत्मदेव को जानने से मनुष्य सब बंधनों से छूट जाता है ।


ब्रह्मविद्या ही एकमात्र सहारा है


जिनको समदर्शन होता है, इस जगत के दिखनेवाले अनेकत्व में छिपे हुए अपने ही चेतन आत्मस्वरूपरूपी एकत्व का दर्शन होता है, उन्हें भय-शोक आदि संताप नहीं होते । हम तो कुछ उपाधियाँ लेकर नाम, जाति, पद आदि के मद में चूर हो के इस शरीर को ही ‘मैं’ मान के चलते हैं । इसलिए जरा-सी भी अपने इस माने हुए अहंकार को चोट लगती है तो हम फुफकार उठते हैं, दुःखी हो जाते हैं । इस शरीर के अपमान को अपना अपमान मानकर अशांत हो उठते हैं और व्यर्थ में दुःखी होते हैं । हम कहते तो हैं : ‘मेरा पैर, मेरा हाथ, मेरा सिर... मेरे माथे में दर्द हो रहा है या मेरे पैर में चोट लगी है...’, मगर व्यवहार ‘मेरे’ को ‘मैं’ मानकर करते हैं और अपने असली स्वरूप ‘मैं’ (आत्मा) को भूल जाते हैं ।
अज्ञानजन्य अपने इस देहभाव, जीवभाव के कारण ही हम दुःखी होते हैं । यही देहभाव हमारे दुःख का मूल कारण है । जो विद्या इस भाव से ऊपर उठा के हमको अपने आत्मभाव की ओर ले जाय, जो इस जीवभावरूपी दुःख के बंधन से मुक्ति की ओर ले जाय, वही विद्या वास्तविक विद्या है ।


सा विद्या या विमुक्तये ।


वही विद्या ब्रह्मविद्या है । सब दुःखों से छूटने का यह ब्रह्मविद्या ही एकमात्र सहारा है । संत इसी विद्या को पढ़ाते हैं । बड़े-बड़े राजा सम्पूर्ण लौकिक सुखों का त्याग करके अरण्य में वास करनेवाले इस ब्रह्मविद्या के अनुभवनिष्ठ ज्ञाता ऋषि-महर्षियों के चरणों में जा बैठते थे । इसीसे कहा गया है कि सब दुःखों से छूटना हो तो ब्रह्मवेत्ता संत के सत्संग-सान्निध्य का सेवन करें और अपने आत्मदेव को जानें ।     

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