आत्मनिरीक्षण का जादुई प्रभाव
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आत्मनिरीक्षण का जादुई प्रभाव

एक बार एक स्कूल के विद्यार्थी गणित की परीक्षा देने बैठे थे । प्रश्नपत्र बहुत कठिन था, लड़कों को उसके उत्तर नहीं आ रहे थे । किसी लड़के ने प्रश्नपत्र परीक्षा-भवन से किसी प्रकार बाहर भेज दिया और उसके मित्र ने सब प्रश्नों के उत्तर उसके पास भेज दिये । बहुत सारे लड़कों ने उसीसे अपनी उत्तर-पुस्तिका में उत्तर उतार लिये । वहाँ एक ऐसा भी लड़का था जिसे नकल करने में संकोच हुआ किंतु परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उसने भी दूसरों की देखादेखी नकल कर ली ।


उस लड़के का नियम था कि वह नित्य रात में सोते समय अपनी आध्यात्मिक दैनंदिनी में लिखे हुए सद्गुणों को पढ़ता और यह निरीक्षण करता कि ‘कहीं आज दिनभर में मुझसे कोई सद्गुणों के विपरीत आचरण तो नहीं हुआ !’ उस दिन रात्रि को उसने अपनी दैनंदिनी खोली और पहला ही नियम पढ़कर व्याकुल हो गया । नियम के अनुसार उसे सदा सत्य का पालन करना था पर उस दिन ठीक उसके विपरीत कर्म हुआ ।


अपने कर्म पर उसे बहुत पश्चात्ताप हुआ । वह उसी समय उठा और प्रधानाचार्य के घर गया और उनसे सब बातें सच-सच बताकर बोला : ‘‘मुझसे बहुत बड़ा अपराध हुआ है । आप मुझे जो दंड उचित समझें, दें और इसका प्रायश्चित बतायें ।’’


प्रधानाचार्य : ‘‘तुमसे गलती हुई है पर तुम्हें शाबाशी है कि तुमने उसका स्वीकार किया ! आगे ऐसा दुबारा मत करना । की हुई गलती दुबारा न दोहराना उसका उत्तम प्रायश्चित है । अब चिंता मत करो, तुम्हारी गणित में फिर से परीक्षा लेंगे ।’’


उस बालक की गणित की पुनः परीक्षा हुई और वह अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुआ । नित्य स्वाध्याय व आत्मनिरीक्षण के अभ्यास ने उसको पतनोन्मुख होने से बचा लिया ।
विद्यार्थियों को प्रतिदिन रात्रि को सोने से पहले आत्मनिरीक्षण अवश्य करना चाहिए कि ‘आज दिनभर में अशुभ चिंतन, गलत कार्य कितने कम हुए और अच्छा चिंतन, उत्तम कार्य कितने बढ़े ?’ इससे सन्मार्ग पर चलने व कुमार्ग से बचने में बहुत सहायता मिलेगी ।   

[ JULY-2018-LKS-261]

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