विधाता ने क्या स्थिर बनाया है ?
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विधाता ने क्या स्थिर बनाया है ?

आधिव्याधिशतैर्जनस्य विविधैरारोग्यमुन्मूल्यते
लक्ष्मीर्यत्र पतन्ति तत्र विवृतद्वारा इव व्यापदः ।

जातं जातमवश्यमाशु विवशं मृत्युः करोत्यात्मसा-त्तत्किं तेन निरंकुशेन विधिना यन्निर्मितं सुस्थिरम् ।।


‘अनेक प्रकार की मानसिक और शारीरिक आधि-व्याधियों से आरोग्य का नाश हो जाता है, जहाँ लक्ष्मी का आगमन होता है वहाँ विपत्ति का द्वार भी खुल ही जाता है और जन्म लेनेमात्र से पदार्थों को मृत्यु भी वशीभूत कर लेती है । इसलिए हम निःशंक होकर कह सकते हैं कि निरंकुश (अप्रतिबद्ध) विधाता ने ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं बनाया जिसकी दशा का परिवर्तन कदापि न होता हो ।’      (वैराग्य शतक : 33)


जीवन अस्थिर है । शरीर और मन के ऊपर भिन्न-भिन्न प्रकार के अगणित बीमारियों-रोगों का आक्रमण होता रहता है । इसका कुछ ठिकाना नहीं और फिर भी लोग इस नश्वर जीवन से लिपटे रहते हैं । सत्य से वे दूर जा पड़ते हैं और फिर इधर-उधर भटक के अपना सर्वनाश कर लेते हैं ।


‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ में भगवान श्रीरामजी अपने सद्गुरु श्री वसिष्ठजी से कहते हैं : ‘‘भगवन् ! सम्पत्ति की वृद्धि से दुःख ही होता है, सुख नहीं होता अर्थात् जैसे विष-लता केवल मृत्यु की ही कारण होती है, वैसे ही अधिक श्री (सम्पत्ति) भी सुख का कारण न होकर दुःख का ही कारण होती है । जैसे झंझावात और तरंगों से युक्त नदी के झोंकों से दीपक बुझ जाता है, वैसे ही अधिक श्री की प्राप्ति होने पर दयादृष्टि या परमार्थदृष्टि बंद हो जाती है । इस विस्तृत संसार से कभी सुख नहीं मिल सकता । इसमें जो जीव उत्पन्न होते हैं वे मरने के लिए ही उत्पन्न होते हैं और जो मरते हैं वे जन्म के लिए ही मरते हैं, उनको कुछ भी सुख नहीं मिलता ।’’


पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है : ‘‘कितने ही भोग भोग लें, कितना ही धन, गहने इकट्ठे कर लें लेकिन जब तक परमात्मशांति का सुख नहीं मिलता, तब तक यह जीव अनाथ की नाईं भटकता रहता है । जब तक अपने नाथ आत्मा-परमात्मा में विश्रांति नहीं पाता, तब तक न जाने कितने-कितने गर्भों में कितने-कितने पिताओं के शरीरों से पसार होता रहता है, माताओं के शरीरों में गर्भाग्नि में पकाया जाता है ।’’    

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