देशी गाय की ही इतनी महिमा क्यों ?
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देशी गाय की ही इतनी महिमा क्यों ?

सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग भारतीय देशी गाय अनादि काल से मानव को स्वस्थ, बुद्धिमान, बलवान व ओजस्वी-तेजस्वी बनाती रही है । देशी गायों में ककुद से लेकर रीढ के समानांतर ‘सूर्यकेतु नाडी रहती है, जिसमें सूर्य की ‘गौ नामक किरण प्रविष्ट होती है । जैसे मनुष्य में सुषुम्ना नाडी होती है, वैसे ही गाय में सूर्यकेतु नाडी होती है ।

देशी गाय के दूध, दही, मक्खन, घी, गोमूत्र एवं गोबर में भी स्वर्णांश पाया जाता है । स्वर्ण सर्वरोगहर, आरोग्य एवं दीर्घायु प्रदायक होता है । हमारे वेदों में भी गायों की महिमा आती है ।

अथर्ववेद (कांड १, सूक्त २२, मंत्र १) में भगवान ब्रह्माजी कहते हैं :

गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परि दध्मसि ।।

रोहित यानी लाल वर्ण की गाय (गीर गाय) मनुष्य के हृदयरोग एवं पांडुरोग (anaemia) का निवारण करती है । हृदयरोग के उपचार के लिए जितना लाभ सूर्य-सेवन (सूर्य-स्नान आदि) से होता है उतना ही लाभ लाल रंग की गाय के गो-रस (गाय का दूध, छाछ आदि) के सेवन से होता है ।

वैदिक काल में युद्ध के समय सेना के साथ लाल रंग की गायें रखी जाती थीं, जिनका दूध पीकर योद्धाओं की शौर्यशक्ति संवर्धित होती थी । इससे युद्ध में लडते समय वे सैनिक थकते नहीं थे ।

श्वेत (सफेद) वर्ण की गाय को ‘धवला कहते हैं । बुद्धिसंवर्धन हेतु श्वेत गाय का गो-रस सर्वश्रेष्ठ माना गया है । आदि गौ सुरभि श्वेत वर्ण की है । कामधेनु भी श्वेत वर्ण की है । समुद्र-मंथन से निकलनेवाली पाँचों-की-पाँच गायें श्वेत वर्ण की हैं ।

गो-रसपान के लिए वेद भगवान हमें आज्ञा देते हैं :

वर्चो गोषु प्रविष्टम् । (अथर्ववेद : कांड १४, सूक्त २, मंत्र ५३-५५, ५८)

‘वर्च कहते हैं प्रताप को । प्रताप गौ में प्रविष्ट होता रहता है । गाय से संयुक्त होकर, उसके गो-रस का सेवन करके हम प्रतापवान बनें ।

तेजो गोषु प्रविष्टम् ।

‘तेज गाय में प्रविष्ट हुआ है । गाय से संयुक्त हो के हम तेजस्वी बनें ।

भगो गोषु प्रविष्टो ।

‘भग कहते हैं ऐश्वर्य को । ऐश्वर्य गौ में प्रविष्ट होकर रहता है । गौ से संयुक्त हो के, उसके गो-रस का सेवन करके हम ऐश्वर्यवान बनें । गोदान से भी हम ऐश्वर्यसिद्धि को प्राप्त करें ।

रसो गोषु प्रविष्टो ।

‘रस कहते हैं वीर्य को । वीर्य गाय में प्रतिष्ठित होकर रहता है । गाय से संयुक्त होकर हम वीर्यवान बनें ।

आज वैज्ञानिक भी गाय के दूध, दही आदि गो-रस की महिमा गाते हैं । उनका कहना है कि गो-रस में गामा-ग्लोब्युलीन की उपस्थिति होती है जो आरोग्य-आयुष्यप्रद एवं रोगप्रतिकारक शक्तिवर्धक है ।

गाय जिस घर में जाती है उसका कल्याण करती है । गाय का प्रेमपूर्वक रँभाना कल्याणकारी है । प्रातःकाल एवं यात्राकाल में, यहाँ तक कि स्वप्न में भी यदि गौ-दर्शन हो जाय तो वह शुभ व कल्याणकारी माना जाता है । गाय के प्रत्येक पदार्थ कल्याणकारी एवं मंगलमय हैं । मनुष्य की आजीविका, आरोग्य एवं उसके सब प्रकार से कल्याण के लिए परमात्मा ने गाय का सृजन किया है । गाय केवल मनुष्य का ही नहीं, सम्पूर्ण जीव-जगत का कल्याण करती है । वह अपने गोबर, गोमूत्र से भूमि की जीवनीशक्ति बढाकर उसका भी कल्याण करती है ।

इस तरह गाय में असंख्य दिव्य गुण विद्यमान हैं । पुराणों के अनुसार गाय में ३३ कोटि देवताओं का वास होता है । कोटि का अर्थ प्रकार भी होता है । अर्थात् गाय में ३३ प्रकार के दिव्य गुणों अथवा शक्तियों का वास होता है । गाय के सेवा-सान्निध्य से ये गुण अपने में भी आने लगते हैं ।

 

 

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