गाय की सेवा स्वयं की सेवा है
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गाय की सेवा स्वयं की सेवा है

मानव और गाय का ऐसा संबंध है जैसे शरीर और प्राणों का । यह एक आत्मीय संबंध है । विश्व में गाय है तो सात्त्विक प्राण, सात्त्विक मति और दीर्घ आयु भी सुलभ है । गाय मानवीय प्रकृति से जितनी मिलजुल जाती है, उतना और कोई पशु नहीं मिल पाता । गाय जितनी प्रसन्न होती है, उतनी ही अधिक मात्रा में उसके दूध में विटामिन उत्पन्न होते हैं और वह जितनी दुःखी होती है, उतना ही उसका दूध कम गुणोंवाला होता है ।

गाय ने मानव-बुद्धि की रक्षा की है । आज भ्रष्टाचार, बेईमानी बढती जा रही है । इसका कारण है समाज में बुद्धि की सात्त्विकता का अभाव । और बुद्धि सात्त्विक क्यों नहीं है ? क्योंकि तन-मन सात्त्विक नहीं हैं । और तन-मन की सात्त्विकता के अभाव का बडा कारण है तुलसी, गंगाजल, सात्त्विक आहार-विहार व गौ के सात्त्विक दूध का अभाव । आहार में सात्त्विकता का अभाव गो-रस का त्याग करने से हुआ है । गाय का दूध, घी, मक्खन, छाछ आदि विशेष सात्त्विक आहार हैं ।

गौरक्षा के लिए समाज व राज्य क्या करता है, लोग मदद करते हैं कि नहीं... ये गौण बातें हैं । मुख्य बात यह है कि ‘गाय की दयनीय अवस्था देखकर अपने दिल में पीडा होती है कि नहीं ?

स्वामी शरणानंदजी कहते हैं : ‘‘गाय की रक्षा होती है तभी प्रकृति भी अनुकूल होती है, भूमि भी अनुकूल होती है ।

जैसे-जैसे आप गौ-सेवा करते जायेंगे, वैसे-वैसे आपको यह अनुभव होता जायेगा कि आप गाय की सेवा नहीं बल्कि गाय आपकी सेवा कर रही है - स्वास्थ्य की दृष्टि से, बौद्धिक दृष्टि से... हर एक दृष्टि से । गायें हमारी कितने-कितने प्रकार से सेवा कर सकती हैं, इसका प्रमाण है यह सत्य घटना :  सन् १९४४ में राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के मझेवला गाँव में गुमानसिंह नाम का एक युवक गायें चराता था ।

एक दिन वह पहाडी पर बैठा हुआ शिखर की तरफ पीठ करके गायों को चरा रहा था । अचानक एक नरभक्षी लकडबग्घे ने शिखर से छलाँग लगा के गुमानसिंह पर आक्रमण कर दिया । गुमानसिंह उसे देखकर भयभीत हो गया । तभी घास चर रही गायों में से लगभग १०-१५ गायों ने अपने रखवाले गुमानसिंह के चारों ओर घेरा बना के उसको बीच में कर लिया । वे पूँछ ऊपर कर हुंकार भरने लगीं, अपने पैने सींगों से लकडबग्घे को मारने दौडने लगीं । इससे वह डरकर भाग गया ।

जब ग्वाला गायों को गाँव ले के चलने लगा तो उस दिन वह गायों का रखवाला नहीं था बल्कि गायें ही उसके रक्षक के रूप में साथ में चल रही थीं । गुमानसिंह ने जब इस घटना की जानकारी गाँववालों को दी तो वे सुनकर दंग रह गये । गायों के प्रति उनका प्रेम उमड पडा । ‘कैसी समझदारी है और कैसा अपनापन है ! - यह सोचकर उनका दिल भर आया ।

पं. मदनमोहन मालवीयजी कहते हैं : ‘‘यदि हम गौओं की रक्षा करेंगे तो गौएँ हमारी रक्षा करेंगी ।

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू कहते हैं : ‘‘आप गाय की सेवा करते हैं तो सचमुच आप बडे पुण्यात्मा हैं । गौ-सेवा से आपके घर में जो सात्त्विकता होगी, जो खुशी होगी वह करोडपतियों के घर में भी दुर्लभ होती है । गाय की सेवा तो पुण्यात्मा बनाती है, अकाल मृत्यु टालती है ।

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