अद्भुत है हमारा मंत्र-विज्ञान !
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अद्भुत है हमारा मंत्र-विज्ञान !

श्री हनुमानप्रसाद पोद्दारजी अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते हैं कि ‘‘श्री योगानंद सरस्वती का मेरे साथ निकट का संबंध था । एक समय की बात है, मुझे धन की बहुत आवश्यकता थी । उन्होंने मुझे भगवान शंकर का एक मंत्रानुष्ठान बताया और कहा : ‘‘इस अनुष्ठान से शंकरजी के दर्शन होंगे तथा तुम्हारे अभाव पूर्ण हो जायेंगे ।

मैंने कहा : ‘‘इन अनुष्ठानों पर मेरा पूरा विश्वास है पर मैं अपने लिए सकाम अनुष्ठान नहीं करता ।

वे खूब समझाते रहे पर मैं उनकी बात स्वीकार नहीं कर सका ।

कुछ समय बाद मेरे एक मित्र की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गयी । उनके प्रति मेरे मन में बडा प्रेम था । वे अपनी परेशानियाँ मुझे बताते रहते थे । मेरे मन में आया कि योगानंदजी का बताया हुआ अनुष्ठान अपने लिए तो नहीं करना है पर मित्र के लिए कर दिया जाय । मैंने अपने कमरे में ही अनुष्ठान आरम्भ किया । बडी विधि एवं श्रद्धा के साथ २१ दिनों तक अनुष्ठान चला । २१वें दिन बडे भयानक रूप में भगवान शंकर का प्राकट्य हुआ । उनका वह भयानक रूप देखकर मैं काँपने लगा । उन्होंने कहा : ‘‘तुम्हारा अनुष्ठान सफल हो गया परंतु तुमने उसका प्रयोग कर बहुत अनुचित किया । भविष्य में इस मंत्र का अनुष्ठान करोगे तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायेगा । फिर कभी इसका अनुष्ठान नहीं करना और सम्भव है तुम इस मंत्र को भूल जाओगे । जिसके लिए यह अनुष्ठान किया है उससे कह देना कि फिर किसी बहुत बडे व्यापार को न करे, परिणाम अच्छा नहीं होगा । इतना आदेश देकर भगवान शंकर अंतर्धान हो गये ।

उस समय मेरे वे मित्र सट्टा खेला करते थे । वे जो लिखना चाहते थे वह न लिखकर गलती से उससे उलटा लिख गया अर्थात् लेने की जगह बेचना और बेचने की जगह लेना लिखा गया और उसीके अनुसार सौदा हो गया । सौदा होने के पश्चात् जब वहाँ से तार आया तब उनके मन में बडी घबराहट हुई । अतएव उन्होंने जैसा सौदा हुआ था उससे उलटा सौदा करने के लिए तार दिया । पर भगवान की माया बडी विचित्र है, वह तार भी उलटे सौदे का लिखा गया और वह भी जितना वे सौदा करना चाहते थे उससे दूना हो गया । भगवान को रुपये देने थे, अतः उलटा काम होने पर भी उस काम में उन्हें ३० लाख रुपये एक महीने में मिले ।

अनुष्ठान की विधि तो मुझे स्मरण रही पर मंत्र सर्वथा भूल गया । इस मंत्रानुष्ठान के प्रयोग से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इस युग में भी देवता सिद्ध होते हैं, उनके दर्शन होते हैं तथा उनकी आराधना से नवीन प्रारब्ध का निर्माण होकर कार्य सिद्ध हो जाता है ।

इससे यह भी पता चलता है कि दैवी शक्तियाँ उनके द्वारा दी गयी सहायता का किसी निषिद्ध कार्य में दुरुपयोग होने की सम्भावना हो तो प्रसन्नता नहीं दर्शाती हैं एवं कभी लौकिक सहायता दे भी दें तो भी उनके प्रकोप की भी सम्भावना होती है ।      

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