गुरुकृपा पाने व अपनी श्रद्धा को उभारने का अवसरः गुरु पूर्णिमा
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गुरुकृपा पाने व अपनी श्रद्धा को उभारने का अवसरः गुरु पूर्णिमा

(गुरुपूर्णिमा महापर्व : 16 जुलाई)

- पूज्य बापूजी

वास्तविक जीवन क्या है यह जानना चाहिए । जो रोज-रोज मर रहा है यह वास्तविक जीवन नहीं है । वास्तविक जीवन है अमर आत्मा, सदा एकरस रहनेवाला । जो अपने को सहज वास्तविक जीवन में विश्रांति दिलाता है उसकी शारीरिक थकान, भावनात्मक तनाव नहीं टिक सकते हैं ।

जो मर जाता है और जो सब छोड़ के चला जाता है वह वास्तविक जीवन नहीं है । मौत जिसे कभी मार नहीं सकती वह आत्मा-परमात्मा का सुख वास्तविक जीवन है ।

जब तक वास्तविक जीवन की शांति नहीं मिलती तब तक मनुष्य मनुष्यता का फायदा उठाने में सक्षम नहीं है, वह द्विपाद (दो पैरवाला) पशु जैसा है । मरनेवाले शरीर को वास्तविक जीवन मानना बड़ी भूल है ।

...तो मोक्ष का पता नहीं चलेगा

गुरु को मनुष्यबुद्धि से नहीं देखना चाहिए । गुरु का शरीर दिखता है हमारे जैसा - दो हाथ-पैरवाला लेकिन गुरु का आत्मा परमात्मा के साथ एकाकार होता है । जब तक गुरु को सर्वेश्वर परमेश्वर से व्याप्त नहीं जानेंगे तब तक चित्त की शुद्धि नहीं होगी, वास्तविक जीवन का संगीत नहीं छिड़ेगा । गुरु को सर्वव्यापक मानने से ही सत्शिष्य के चित्त की शुद्धि होती है और वास्तविक शांति, शक्ति, सामर्थ्य एवं विश्रांति मिलती है । संत तुलसीदासजी ने कहा है :

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई । 

जौं बिरंचि संकर सम होई ।।

 (श्री रामचरित. उ.कां. : 92.3)

ब्रह्माजी जैसा सृष्टि करने और शंकरजी जैसा संहार करने का सामर्थ्य हो फिर भी अगर सद्गुरु की शरण नहीं है तो वास्तविक जीवन और मोक्ष का पता नहीं चलेगा । ऐसे सद्गुरुओं को पहचानने, उनके ज्ञान-आनंद का लाभ लेने तथा जीते-जी उनसे फायदा उठाने का संकेत जो पर्व देता है उसे बोलते हैं गुरुपूनम, व्यासपूर्णिमा, आषाढ़ी पूर्णिमा !

सद्गुरु-पूजन क्यों ?

जब तक मनुष्य को सच्चे सुख की भूख है तब तक वास्तविक सद्गुरुओं का पूजन होता रहेगा । जब तक मनुष्य को सच्ची शांति और वास्तविक जीवन की माँग है तब तक समाज में ऐसे सत्पुरुषों की माँग बनी रहेगी । जैसे पिता का धन पुत्र को मिलता है, शिक्षक का ज्ञान विद्यार्थी को मिलता है ऐसे ही सद्गुरु का सत्स्वरूप-रस सत्शिष्य के हृदय में उँडेला जाता है ।

संत कबीरजी कहते हैं :

सद्गुरु मेरा सूरमा करे शब्द की चोट ।

मारे गोला प्रेम का हरे भरम की कोट ।।

हमें वास्तविक जीवन का आनंद, माधुर्य प्राप्त कराने के लिए जो हमारी वृत्तियों को सुव्यवस्थित करने में सक्षम हैं ऐसे सिद्धपुरुष वेदव्यासजी जैसे ब्रह्मज्ञान के दाता सद्गुरुओं के पूजन का दिन है गुरुपूनम ।

शिक्षकों, प्रोफेसरों या गाना-बजाना अथवा दंगल सिखानेवाले गुरुओं से सद्गुरु विलक्षण होते हैं । इस आषाढ़ी पूनम को गुरु का पूजन मतलब जो मन-इन्द्रियों के आकर्षणों से हमको बचाकर भगवद्रस की तरफ ले जाने में सक्षम हों, श्रोत्रिय हों अर्थात् शास्त्रों के ज्ञाता हों और परमात्मरस अनुभव कर रहे हों और दूसरों को उसका अनुभव कराने की रीत जानते हों एवं जिनकी सत्स्वरूप परमात्मा में स्थिति हो ऐसे सद्गुरुओं की पूजा है । इस दिन सद्गुरु की पूजा से वर्षभर की पूर्णिमाओं के व्रत-उपवास का पुण्य होता है । तो सद्गुरु की पूजा कैसे करें ? कि साधक पूनम के दिन व्रत रखें, सद्गुरु का मानसिक अर्घ्य-पाद्य आदि से पूजन करें, फिर मन से ही तिलक करें, पुष्पों की माला पहनायें और उनकी तरफ एकटक देखें । देखते-देखते उनके ज्ञान की स्मृति करें ।

अरे, पानी का प्याला कोई पिलाता है तो धन्यवाद देना पड़ता है, नहीं तो गुणचोर (कृतघ्न) होने का दोष लगता है । किसीने रोटी खिला दी अथवा हमें 4 पैसे की मदद कर दी तब भी कृतघ्न नहीं होना चाहिए । कृतघ्न व्यक्ति बड़ा पापी माना जाता है । जब संसारी बात में कृतघ्न व्यक्ति दोषी हो जाता है तो सद्गुरु ने तो इतना सारा ज्ञान, भक्ति, करुणा-कृपा का खजाना दिया, इतना पुण्य और सुखद जीवन जीने की कला दी तो ऐसे सद्गुरुओं के ऋण से शिष्य, भक्त उऋण न होकर कृतघ्नता के दोष से दब जायें एवं जन्में-मरें ऐसा न हो और शिष्यों का ज्ञान कहीं नष्ट न हो जाय, उनकी भक्ति और साधना बिखर न जाय इसलिए शिष्य सद्गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं ।

गुरुपूर्णिमा के दिन तो विशेषरूप से सद्गुरु का मानसिक पूजन करें, सुमिरन करें और गुरुदेव ने जो बताया उसको अपने जीवन में उतारने का संकल्प करें ।

आप भी हिसाब-किताब कर लो

जैसे दीपावली के दिनों में व्यापारी लोग अपने व्यापार में क्या कमाई हुई या क्या घाटा हुआ - वर्षभर का हिसाब-किताब करते हैं, ऐसे ही व्यासपूर्णिमा एक प्रकार का आध्यात्मिक हिसाब-किताब करने और उत्साह भरने का अवसर, कृतज्ञता व्यक्त करने, सद्गुरु की कृपा पाने और अपनी श्रद्धा को उभारने का अवसर है ।

सुख-दुःख के थपेड़ों से बचते हुए जीवनयात्रा आगे बढ़ाने की सुंदर व्यवस्था जिन महापुरुष ने की, जो अभी यह व्यवस्था कर रहे हैं, उनके ऋण से कुछ उऋण होने, उनकी कृपा विशेषरूप से झेलने और अपने हृदय को भगवत्सुख से भरने के लिए यह गुरुपूर्णिमा पर्व मनाया जाता है ।

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