मनुष्य-जीवन है अनमोल, इसे व्यर्थ न गँवायें
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/ Categories: LokKalyanSetu, May-2019

मनुष्य-जीवन है अनमोल, इसे व्यर्थ न गँवायें

एक व्यक्ति को धन इकट्ठा करके रखने की बड़ी वासना थी । एक दिन उसके घर एक अलमस्त साधु भिक्षा के लिए आये । उन्होंने बड़े-बड़े संदूकों में धन एकत्र देखा तो इतना धन रखने का कारण पूछा । धनिक बोला : ‘‘महाराज ! आपको अपने शरीर की रत्तीभर भी चिंता नहीं है परंतु हमें धन बचाकर रखना बहुत जरूरी है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर काम आये ।’’

यह सुनकर साधु वहाँ से चुपचाप चल दिये और उन्होंने धनिक को सीख देने हेतु छोटा-सा अभिनय किया । अपनी कुटिया के पास बड़ा-सा गड्ढा खोदा । दूसरे दिन जब वह धनिक साधु की कुटिया के पास पहुँचा तो वह देखता है कि एक बड़े गड्ढे में साधु महाराज सुंदर गोल चिकने पत्थर डाल रहे हैं ।

धनिक ने कारण पूछा तो साधु ने कहा : ‘‘कदाचित् किसी समय मुझे इनकी आवश्यकता पड़े और उस समय शायद ये सब पत्थर वर्षा से बह जायें तो ! इसलिए मैं अभी से इनको एकत्र करके सुरक्षित कर रहा हूँ ।’’

धनिक : ‘‘यह कैसे सम्भव हो सकता है ? पत्थरों को वर्षा कैसे बहा ले जायेगी ? पत्थर सँभाल के क्या मिलेगा ?’’

तब साधु ने कहा : ‘‘अरे मूर्ख ! तू मुझे सीख देता है, पहले अपनी बुद्धि को तो सीख दे ! जब तू बच्चा था तब जितना निश्चिंत था, अब उतना निश्चिंत है क्या ? धन सँभाल-सँभाल के मरे जा रहे हो, दो रोटी तो खानी हैं । तूने मान रखा है कि ‘इससे सुख मिलेगा ।’ जिसने हमको पैदा किया वह तो खाने-पीने के लिए दे ही रहा है । जिसने मनुष्य-शरीर दिया उसका ज्ञान नहीं है । ऐसा समय कभी न होगा जब परमात्मा आपको भोजन न देगा । धन-दौलत मरने के बाद साथ नहीं जाते । इसलिए धन-दौलत, सोने और चाँदी को एकत्र करने में अपना अमूल्य समय क्यों नष्ट करते हो ? जीवन इस प्रकार की क्षुद्र और तुच्छ चीजों की चिंता में व्यर्थ गँवाने के लिए नहीं है । जीवन तो जीवनदाता परमात्मा से अपने एकत्व का ज्ञान पाकर जन्म-मृत्यु के कुचक्र से मुक्त होने के लिए मिला है ।’’

अपने आत्मपद में जागकर सार्वभौम स्वराज्य को पाये हुए उन वास्तविक महाराज के अमृतवचनों ने उस धनिक का वास्तविक विवेक जगा दिया । वास्तविक विवेक अर्थात् शाश्वत व नश्वर को अलग-अलग करके शाश्वत का स्वीकार करना, आत्मा और अनात्मा का ज्ञान पाकर आत्मा में दृढ़ प्रीति एवं निष्ठा जगाना, सच्चे सुख और भ्रमवाले सुख का विभाजन करके सच्चे सुख को पाने का उद्देश्य बनाना । इस परम हितकारी मित्र - विवेक के जीवन में प्रवेश करने से वह श्रीमान शाश्वत धन - आत्मधन पाने की राह पर चल पड़ा । धन्य है उसका विवेक और पुण्य !

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