हलकी मान्यताओं के दहन व मंगल भावों के विकास का पर्व
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हलकी मान्यताओं के दहन व मंगल भावों के विकास का पर्व

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी

(होलिका दहन : 20 मार्च, धुलेंडी : 21 मार्च)

भारतीय मनीषियों की गहरी समझ

वास्तव में होली का उत्सव बहुत प्राचीन है । कब से शुरू हुआ इसका पक्का प्रमाण इतिहासवेत्ताओं को आज तक नहीं मिल पाया । लेकिन सबने स्वीकार किया है कि इस उत्सव के पीछे भारतीय मनीषियों की बहुत गहरी समझ छुपी है ।

होली से जुड़ी बड़ी मधुर-मधुर कथाएँ हैं । कइयों का मानना है कि पूतना को जलाया गया तब से होली जलायी जाती है । कइयों का ऐसा मानना है कि होलिका जली और प्रह्लाद बच गये तब से होली जलायी जाती है । कइयों का और ढंग का मानना है परंतु हमारी हिन्दू संस्कृति के ये जो भी त्यौहार हैं, इनसे हमारी सुषुप्त शक्तियाँ, सुषुप्त उत्साह जागृत होता है और विकृत मानस संस्कृत होने लगता है ।

ये उत्सव तुच्छ वैर-जहर को, बीती हुई बातों को भुलाकर वर्तमान में आनंदित हो के परस्पर परमात्म-प्रेम से जीवनयापन करते हुए अपने जीवन को जीवनदाता की ओर मोड़ने के लिए हमें प्रेरित करते हैं... एक त्यौहार जाता है तो कुछ ही दिनों के बाद दूसरा त्यौहार आ जाता है ।

होली पलाश के रंग से क्यों ?

पलाश के फूल इन्हीं दिनों में खिलते हैं । होली पर इन फूलों से रंग तैयार करके एक-दूसरे को लगाया जाता था । इनमें ऐसे लाभकारी रासायनिक तत्त्व हैं, ऐसी कुदरती देन है कि इनका रंग हमारी त्वचा को लगे तो हमारे त्वचा आदि के सुषुप्त, भावी रोग गायब हो जायें । किंतु आधुनिकता के, सुधार के नाम पर विकृति होती गयी । कुछ जहरी पदार्थों एवं हानिकारक रसायनों (केमिकलों) से बने हुए ऐसे रंग जो कपड़े को, चमड़े को रँगने के काम आते हैं, प्रायः वे ही रंग एक-दूसरे को लगाने के लिए प्रयुक्त किये जाने लगे । किसीको वह रंग लगाना समझो भविष्य में उसके लिए बीमारी को आमंत्रण देना है । अतः होली रासायनिक रंगों से नहीं बल्कि पलाश के फूलों के रंग व अन्य प्राकृतिक रंगों से खेलें ।

संत-सम्मत होली खेलें

संत भोले बाबा कहते हैं :

होली अगर हो खेलनी, तो संत सम्मत खेलिये ।

भोले बाबा की यह जो दृष्टि है वह लौकिक व धार्मिक दृष्टि की सुरक्षा करते हुए आध्यात्मिक दृष्टि की तरफ हमें संकेत करती है ।

संतान शुभ ऋषि मुनिन की, मत संत आज्ञा पेलिये ।।

संतों की आज्ञा यह है कि मनुष्य-जन्म मिला है तो उसका सदुपयोग करके अपने आत्मा को जान लो ।

होली तो हम खेलें, हमारा जीवन सरल, सहज, नैसर्गिक, स्वाभाविक हो इसके लिए बाह्य उपकरणों, बाह्य साधनों की उपयोगिता है और हम उपयोग करें किंतु वे साधन ऐसे न हों कि हमारा मित्र, जिसके साथ हम होली खेलते हैं, उसके जीवन में कहीं हानि कर दें ! रंग तो खो जायेगा लेकिन ‘मित्र का जीवन परमात्मा के रंग से रँगे...’ इस भावना से यदि सात्त्विक, पवित्र रंग फेंकते हैं अथवा कोई रंग या वस्तु देते-लेते हैं तो शुभ भाव करनेवाले का भी मंगल होता है और सामनेवाले का भी मंगल होता है ।

हम मंगल भावों को विकसित करें और मंगल-में-मंगल भाव यह है कि अपने को ही हम पूछें कि ‘क्या मैं संसार में दोष देखने के लिए पैदा हुआ हूँ ?’ संसार में दोष देखना पाप है, गुण देखना पुण्य है लेकिन संसार में छुपे हुए संसार को चलानेवाले सत्यस्वरूप परमात्मा को देखना - यह हुई संत-सम्मत होली । तो हम किसीके दोष देखने के लिए जन्मे नहीं, गुण देखने के लिए भी जन्मे नहीं अपितु सबमें छुपे हुए जो परमात्मा हैं उनको जानकर चौरासी के चक्कर से मुक्त होने के लिए हमारा जन्म हुआ है ।

भ्रांति की होली जलाओ

मन-ही-मन लकड़े ले आओ, भभुक... भभुक.... अग्नि प्रकट करो । आज तक की अपनी मान्यताओं को होली में डालो । ‘मैं फलाना हूँ... फलाना मेरा नाम है, फलानी मेरी जात है...’ होली में डालो - स्वाहा... ! भावना करो कि ‘बंधु और मित्र सब शरीर के संबंध हैं; जन्म और मृत्यु शरीर का है, मेरा नहीं । न लोभ, न मोह, न मद और न ही मात्सर्य के भाव मेरे हैं । मैं तो चिदानंद हूँ, चैतन्य आत्मा हूँ । वाह ! वाह !! आज तो भ्रांति की होली जल गयी ।’ अब होलिका देवी की प्रदक्षिणा करो । ‘होली नहीं जली तब मैं था, होली जली तब भी मैं था, मेरे शरीर ने प्रदक्षिणा की तब भी मैं था उसको देखनेवाला और होली अब बुझ रही है तब भी मैं हूँ । होली प्रकट होनेवाली और जानेवाली है लेकिन उसको प्राकट्य-सामर्थ्य देनेवाला मैं आत्मा हूँ । वाह ! वाह !!

चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।

चिदानन्दरूपः... ‘चित्’ माने चैतन्य, शिवोऽहम् माने कल्याणकारी आत्मस्वरूप मैं हूँ । दृढ़ भाव करो, ‘मैं आत्मा हूँ, चैतन्यस्वरूप हूँ, चिदानंदरूप हूँ । वाह ! वाह !! आज मेरी हलकी मान्यताएँ स्वाहा हो गयीं ।’

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