ऐसी है तुलसी सेवा-पूजन की महिमा !
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ऐसी है तुलसी सेवा-पूजन की महिमा !

(तुलसी पूजन दिवस : 25 दिसम्बर)

श्री गर्ग संहिता में देवर्षि नारदजी राजा बहुलाश्व को तुलसी की महिमा बताते हुए कहते हैं : एक बार श्री राधाजी ने धर्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ अपनी सखी चन्द्रानना से पूछा : ‘‘हे सखी ! तुमने महर्षि गर्गाचार्यजी के मुख से शास्त्र-चर्चा सुनी है, इसलिए तुम श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए ऐसी पूजा बताओ या कोई व्रत बताओ जो परम सौभाग्यवर्धक, महान पुण्यजनक तथा मनोवांछित वस्तु देनेवाला हो ।’’

चन्द्रानना बोलीं : ‘‘राधे ! परम सौभाग्यदायक, महान पुण्यजनक तथा श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए वरदायक व्रत है - तुलसी की सेवा । तुलसी का स्पर्श, स्तवन, रोपण, सिंचन और तुलसीदल से ही नित्य पूजन किया जाय तो वह महान पुण्यप्रद होता है ।

शुभे ! मनुष्यों की लगायी हुई तुलसी जब तक शाखा, प्रशाखा, बीज, पुष्प और दलों के साथ पृथ्वी पर बढ़ती रहती है, तब तक उनके वंश में जो-जो जन्म लेते हैं, वे सब उन रोपण करनेवाले मनुष्यों के साथ दो हजार कल्पों1 तक श्रीहरि के धाम में निवास करते हैं ।

राधिके ! सम्पूर्ण पत्रों और पुष्पों को भगवान के चरणों में चढ़ाने से जो फल मिलता है, वह सदा एकमात्र तुलसीदल के अर्पण से प्राप्त हो जाता है । जो मनुष्य तुलसीदलों से श्रीहरि की पूजा करता है, वह जल में पद्मपत्र की भाँति पाप से कभी लिप्त नहीं होता । सौ भार2 सुवर्ण तथा चार सौ भार रजत के दान का जो फल है, वही तुलसी-वन के पालन से मनुष्य को प्राप्त हो जाता है ।

राधे ! जिसके घर में तुलसी का वन या बगीचा होता है, उसका वह घर तीर्थरूप है । वहाँ यमराज के दूत कभी नहीं जाते । जो श्रेष्ठ मानव सर्वपापहारी, पुण्यजनक तथा मनोवांछित वस्तु देनेवाले तुलसी-वन का रोपण करते हैं, वे कभी सूर्यपुत्र यम को नहीं देखते । रोपण, सिंचन, दर्शन और स्पर्श करने से तुलसी मनुष्यों के मन, वाणी और शरीर द्वारा संचित समस्त पापों को दग्ध कर देती है । पुष्कर आदि तीर्थ, गंगा आदि नदियाँ तथा वासुदेव आदि देवता तुलसीदल में सदा निवास करते हैं । जो तुलसी की मंजरी सिर पर रखकर प्राण-त्याग करता है, वह सैकड़ों पापों से युक्त क्यों न हो, यमराज उसकी ओर देख भी नहीं सकते । जो मनुष्य तुलसी-काष्ठ का घिसा हुआ चंदन लगाता है, उसके शरीर को यहाँ क्रियमाण पाप भी नहीं छूता । जहाँ-जहाँ तुलसी-वन की छाया हो, वहाँ-वहाँ  पितरों  का  श्राद्ध करना चाहिए । वहाँ  दिया हुआ श्राद्ध-संबंधी दान अक्षय होता है ।’’

तुलसी की ऐसी महिमा सुनकर श्री राधाजी ने विधिपूर्वक तुलसी सेवन (सेवा-पूजा) व्रत का अनुष्ठान किया, जिससे प्रसन्न होकर हरिप्रिया तुलसी देवी प्रकट हुईं और वरदान देते हुए कहा : ‘‘तुमने जो-जो मनोरथ किया है, वह सब तुम्हारे सम्मुख सफल हो ।’’

राधाजी ने कहा : ‘‘देवी ! गोविंद के युगल चरणारविंदों में मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे । (भगवान के चरणारविंद अर्थात् भगवान का परम तात्त्विक स्वरूप)’’

तुलसी देवी ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्धान हो गयीं ।

जहाँ एक तरफ तुलसी की महिमा से हमारे धर्मशास्त्र भरे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ इसके औषधीय गुणों का बखान करते हुए आयुर्वेद शास्त्र व आधुनिक विज्ञान थकते नहीं हैं ।

जैसे भगवान श्रीहरि को तुलसी परम प्रिय है वैसे ही पूज्य बापूजी को भी यह परम प्रिय है । भगवान ने तुलसी की महिमा का वर्णन किया और पूज्य बापूजी ने इसकी महिमा बताने के साथ-साथ ‘तुलसी पूजन दिवस’ मनाने की परम्परा शुरू कर इसका घर-घर में पूजन करवाया । आज यह पर्व देश-विदेशों में व्यापक स्तर पर मनाया जाने लगा है तथा आनेवाले समय में हर घर में, पूरे विश्व में मनाया जायेगा । अतः दुःखहर्ता, सर्वकर्ता सच्चिदानंद श्रीहरि की और भारत व विश्व में सुख, शांति, आनंद, माधुर्य, प्रेम, सुसेवा की गंगा बहानेवाले ब्रह्मवेत्ता संत पूज्य बापूजी की प्रसन्नता के लिए आप भी 25 दिसम्बर को ‘तुलसी पूजन दिवस’ मनायें तथा अपने मित्रों, रिश्तेदारों को यह पर्व मनाने हेतु प्रेरित करें ।

(तुलसी की महिमा, पूजन-विधि व तुलसी पूजन दिवसकी अधिक जानकारी हेतु पढ़ें आश्रम व समिति के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध पुस्तक तुलसी रहस्य’)

1. एक कल्प = ब्रह्माजी का एक दिन = 4 अरब 32 करोड़ मानवीय वर्ष

2. एक भार = लगभग 93.5 कि.ग्रा.

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