ईश्वर कहाँ है ?
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ईश्वर कहाँ है ?

एक नास्तिक व्यक्ति था । उसने अपने घर की दीवारों पर सब जगह लिख रखा था : ॠेव ळी पेुहशीश.’ (ईश्वर कहीं नहीं है) । वह व्यक्ति वकील था । एक दिन उसके पास एक मुवक्किल आया और अपने मुकदमे के लिए 500 रुपये फीस में देने की तैयारी दर्शायी । वकील ने 1000 रुपये माँगे । मुवक्किल 1000 रुपये देने के लिए इस शर्त पर तैयार हो गया कि मुकदमे में जीत मिलने पर ही रुपये दिये जायेंगे । यदि मुकदमा हार गये तो वह कुछ भी फीस नहीं देगा ।

वकील को अपने जीत जाने का पूरा विश्वास था । उसने वह मुकदमा ले लिया और उससे जुड़े सभी तथ्यों का अच्छी तरह अध्ययन किया । इसके बाद वह बड़े आत्मविश्वास के साथ न्यायालय गया ।

दूसरे पक्ष के वकील ने एक इतना अच्छा तर्क उपस्थित किया जिसका उत्तर इस तरफ के वकील के पास नहीं था । अतः यह वकील मुकदमा हार गया । इस प्रकार वह 1000 रुपयों से हाथ धो बैठा । वह बहुत दुःखी और हतप्रभ होकर घर गया । जब वह उदास होकर अपनी मेज के सामने बैठा था तो उसका प्यारा बच्चा वहाँ आया, जो अभी अंग्रेजी के शब्दों के हिज्जे (स्पेलिंग, वर्णविन्यास) सीख रहा था । वह दीवार पर लिखे शब्दों के हिज्जे करने लगा । ’ॠेव’ और ’ळी’ के हिज्जे तो उसने कर लिये पर ’पेुहशीश’ बड़ा शब्द होने के कारण वह इसके हिज्जे करने में अटक गया । तब उसने इसके दो भाग ’पेु’ और ’हशीश’ करके हिज्जे कर लिये और बहुत प्रसन्न हुआ । इस प्रकार ‘ईश्वर कहीं नहीं है’ अपने-आप ‘ईश्वर यहीं है’ में बदल गया । नास्तिक पिता ने यह देखा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ । बच्चे के चेहरे की निर्दोष प्रसन्नता ने पिता के चेहरे पर भी मुस्कान ला दी ।

वेदांत के अनुसार हमें धर्म का सही अर्थ लगाना चाहिए न कि गलत । हमारी पाप की भावना में भी हमारा ‘ईश्वरत्व’ प्रकट हो जाता है (जैसा उपरोक्त उदाहरण में हुआ) । इसका प्रत्यक्षीकरण करते ही सारा संसार स्वर्ग में परिवर्तित हो जाता है । गलत अर्थ लगाने का कारण ही पाप की भावना या अपराध की सृष्टि होती है ।


[सितम्बर 2018]

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