सात्त्विक, बल-बुद्धिवर्धक गोघृत
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सात्त्विक, बल-बुद्धिवर्धक गोघृत

देशी गोदुग्ध से निकला घी ‘अमृत’ कहलाता है । स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी राजा पुरूरवा के पास गयी तो उसने अमृत की जगह गाय का घी पीना ही स्वीकार किया -

 ‘घृतं मे वीर भक्ष्यं स्यात् ।’  (श्रीमद्भागवत: 9.14.22)

गोघृत देवताओं का अन्न है तथा प्राणिमात्र का जीवन है । घी तमोगुण हरनेवाला व सात्त्विक होता है ।

आयुर्वेद शास्त्र भावप्रकाश निघंटु के अनुसार देशी गाय का शुद्ध घी आँखों के लिए विशेष लाभकारी, जठराग्नि तथा बल-वीर्य वर्धक, मधुर रसयुक्त, शीतल, त्रिदोषशामक, मेधाशक्तिवर्धक, लावण्य, कांति व ओज-तेज की अत्यंत वृद्धि करनेवाला तथा अलक्ष्मी (निर्धनता, दुर्भाग्य), पाप आदि को दूर करनेवाला, मंगलदायक, सुगंधयुक्त, रसायन, रोचक, दीर्घ जीवन-प्रदायक एवं समस्त घृतों में उत्तम तथा अधिक गुणकारी है ।

छोटे बच्चे को जातकर्म संस्कार के समय सोने की शलाका से मधु व गोघृत का विमिश्रण (दोनों की असमान मात्रा का मिश्रण) चटाया जाता है । इससे उसका स्वर मधुर व मेधा का विशेष विकास होता है । अन्न-दोष को दूर करने के लिए भोजन सामग्री में घी डालने का विधान है । घी से पका अन्न बासी होने पर भी पवित्र माना जाता है । घी विष का भी नाश करता है ।

मनु महाराज ने कहा है कि ‘‘शुद्ध भोजन (जो जूठा, अपवित्र न हो) में ही घी लेना चाहिए ।’’

गोघृत में एक अलौकिक शक्ति है । यह हृदय को हानि न पहुँचाकर विशेष शक्ति प्रदान करता है ।

गाय के घी का दीपक जलाने से वातावरण पवित्र, विशुद्ध व मंगलकारी होता है । इसके निकट बैठकर की गयी उपासना विशेष फलदायी होती है । मृतक के शरीर पर घी का लेप करने से शरीर से निकलनेवाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं ।

शुद्ध गोघृत से यज्ञ करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि इससे प्रोपिलीन ऑक्साइड गैस उत्पन्न होती है जो कृत्रिम वर्षा कराने के लिए भी प्रयोग की जाती है । इसी कारण भारतीयों में घर-घर में हवन की परम्परा रही है, जिससे अकाल या अनावृष्टि का संकट देश में न आये ।

गोघृत में मनुष्य-शरीर में पहुँचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता है । अग्नि में गोघृत की आहुति देने से उसका धूआँ जहाँ तक फैलता है, वहाँ तक का सारा वातावरण प्रदूषण एवं आणविक विकिरणों से मुक्त हो जाता है । सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि 10 ग्राम गोघृत की अंगारों पर या गौ-कंडों पर कुछ बूँदें डालते रहने से पवित्र, ऊर्जावान एक टन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती है जो अन्य किसी भी उपाय से सम्भव नहीं है ।

               - रूसी वैज्ञानिक शिरोविच

 

Ref: LKS - October 2019

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