Why should we do Shraddh | Do's & Dont's of Shraddh

Shraaddh

RSS
12
Imposition of a foreign medium is the greatest evil
Ashram India

Imposition of a foreign medium is the greatest evil

विदेशी भाषा का घातक बोझ सबसे बड़ा दोष है !

(राष्ट्रभाषा दिवस: 14 सितम्बर)

राष्ट्रभाषा हिन्दी ही क्यों ?

एक प्रांत का दूसरे प्रांत से संबंध जोड़ने के लिए एक सर्वसामान्य भाषा की आवश्यकता है । ऐसी भाषा तो हिन्दी-हिन्दुस्तानी ही हो सकती है ।

मराठी, बंगाली, सिंधी और गुजराती लोगों के लिए तो यह बड़ा आसान है, कुछ महीनों में वे हिन्दी पर अच्छा काबू करके राष्ट्रीय कामकाज उसमें चला सकते हैं । मुझे पक्का विश्वास है कि किसी दिन द्राविड़ भाई-बहन गम्भीर भाव से हिन्दी का अभ्यास करने लग जायेंगे । आज अंग्रेजी पर प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए वे जितनी मेहनत करते हैं, उसका 8वाँ हिस्सा भी हिन्दी सीखने में करें तो बाकी हिन्दुस्तान के जो दरवाजे आज उनके लिए बंद हैं वे खुल जायें और वे इस तरह हमारे साथ एक हो जायें जैसे पहले कभी न थे ।

हम किसी भी हालत में प्रांतीय भाषाओं को नुकसान पहुँचाना या मिटाना नहीं चाहते । हमारा मतलब तो सिर्फ यह है कि विभिन्न प्रांतों के पारस्परिक संबंध के लिए हम हिन्दी भाषा सीखें । ऐसा कहने से हिन्दी के प्रति हमारा कोई पक्षपात प्रकट नहीं होता । हिन्दी को हम राष्ट्रभाषा मानते हैं । वह राष्ट्रीय होने के लायक है । वही भाषा राष्ट्रीय बन सकती है जिसे अधिक संख्या में लोग जानते-बोलते हों और जो सीखने में सुगम हो । अंग्रेजी राष्ट्रभाषा कभी नहीं बन सकती ।

जितने साल हम अंग्रेजी सीखने में बरबाद करते हैं, उतने महीने भी अगर हम हिन्दुस्तानी सीखने की तकलीफ न उठायें तो सचमुच कहना होगा कि जनसाधारण के प्रति अपने प्रेम की जो डींगें हम हाँका करते हैं वे निरी डींगें ही हैं ।

देश के नौजवानों के साथ सबसे बड़ा अन्याय

हमें जो कुछ उच्च शिक्षा अथवा जो भी शिक्षा मिली है वह केवल अंग्रेजी के ही द्वारा न मिली होती तो ऐसी स्वयंसिद्ध बात को दलीलें देकर सिद्ध करने की कोई जरूरत न होती कि ‘किसी भी देश के बच्चों को अपनी राष्ट्रीयता टिकाये रखने के लिए नीची या ऊँची सारी शिक्षा उनकी मातृभाषा के जरिये ही मिलनी चाहिए ।’

यह स्वयंसिद्ध बात है कि जब तक किसी देश के नौजवान ऐसी भाषा में शिक्षा पाकर उसे पचा न लें जिसे प्रजा समझ सके, तब तक वे अपने देश की जनता के साथ न तो जीता-जागता संबंध पैदा कर सकते हैं और न उसे कायम रख सकते हैं । आज इस देश के हजारों नौजवान एक ऐसी विदेशी भाषा और उसके मुहावरों पर अधिकार पाने में कई साल नष्ट करने को मजबूर किये जाते हैं जो उनके दैनिक जीवन के लिए बिल्कुल बेकार है और जिसे सीखने में उन्हें अपनी मातृभाषा या उसके साहित्य की उपेक्षा करनी पड़ती है । इससे होनेवाली राष्ट्र की अपार हानि का अंदाजा कौन लगा सकता है ? इससे बढ़कर कोई वहम कभी था ही नहीं कि अमुक भाषा का विकास हो ही नहीं सकता या उसके द्वारा गूढ़ अथवा वैज्ञानिक विचार समझाये ही नहीं जा सकते । भाषा तो अपने बोलनेवालों के चरित्र और विकास का सच्चा प्रतिबिम्ब है ।

अंग्रेजी भाषा के दुष्परिणाम

विदेशी शासन के अनेक दोषों में देश के नौजवानों पर डाला गया विदेशी भाषा के माध्यम का घातक बोझ इतिहास में एक सबसे बड़ा दोष माना जायेगा । इस माध्यम ने राष्ट्र की शक्ति हर ली है, विद्यार्थियों की आयु घटा दी है, उन्हें आम जनता से दूर कर दिया है और शिक्षण को बिना कारण खर्चीला बना दिया है । अगर यह प्रक्रिया अब भी जारी रही तो वह राष्ट्र की आत्मा को नष्ट कर देगी । इसलिए शिक्षित भारतीय जितनी जल्दी विदेशी माध्यम के भयंकर वशीकरण से बाहर निकल जायें उतना ही उनका और जनता का लाभ होगा ।

इसे सहन नहीं किया जा सकता

अंग्रेजी के ज्ञान के बिना ही भारतीय मस्तिष्क का उच्च-से-उच्च विकास सम्भव होना चाहिए । हमारे लड़कों और लड़कियों को यह सोचने का प्रोत्साहन देना कि ‘अंग्रेजी जाने बिना उत्तम समाज में प्रवेश करना असम्भव है’ - यह भारत के पुरुष-समाज और खास तौर पर नारी-समाज के प्रति हिंसा करना है । यह विचार इतना अपमानजनक है कि इसे सहन नहीं किया जा सकता । इसलिए उचित और सम्भव तो यही है कि प्रत्येक प्रांत में उस प्रांत की भाषा का और सारे देश के पारस्परिक व्यवहार के लिए हिन्दी का उपयोग हो । हिन्दी बोलनेवालों की संख्या करोड़ों की रहेगी किंतु (ठीक ढंग से) अंग्रेजी बोलनेवालों की संख्या कुछ लाख से आगे कभी नहीं बढ़ सकेगी । इसका प्रयत्न भी करना जनता के साथ अन्याय करना होगा ।

पहली और बड़ी-से-बड़ी समाज-सेवा

अंग्रेजी के ज्ञान की आवश्यकता के विश्वास ने हमें गुलाम बना दिया है । उसने हमें सच्ची देशसेवा करने में असमर्थ बना दिया है । अगर आदत ने हमें अंधा न बना दिया होता तो हम यह देखे बिना न रहते कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण आम जनता से हमारा संबंध टूट गया है, राष्ट्र का उत्तम मानस उपयुक्त भाषा के अभाव में अप्रकाशित रह जाता है और आधुनिक शिक्षा से हमें जो नये-नये विचार प्राप्त हुए हैं उनका लाभ सामान्य लोगों को नहीं मिलता । पिछले 60 वर्षों से हमारी सारी शक्ति ज्ञानोपार्जन के बजाय अपरिचित शब्द और उनके उच्चारण सीखने में खर्च हो रही है । हमारी पहली और बड़ी-से-बड़ी समाजसेवा यह होगी कि हम अपनी प्रांतीय भाषाओं का उपयोग शुरू करें तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में उसका स्वाभाविक स्थान दें ।

-------------------------------

Imposition of a foreign medium is the greatest evil

(National Language Day: 14th September)

Why only Hindi should be our national language?

We need a universal language for easy interaction between people of one state with another across India. Hindi is indisputably the best language available to us for the purpose.

For the Maharashtrians, Gujaratis, Sindhis and Bengalis, it is very easy. In just a few months, they can learn enough Hindi to be able to use it for national purposes. I do believe that someday our Dravidian brethren will take up Hindi study seriously. If an eighth of the industry that they put into mastering English were to be devoted to learning Hindi, instead of the rest of India remaining a sealed book to them, they will be one with us as never before.

I have always held that in no case whatsoever do we want to injure, much less suppress or destroy the provincial languages. We want only that all should learn Hindi as a common medium for inter-provincial intercourse. This does not mean that we have any undue partiality for Hindi. We regard Hindi as our national language. It is fit to be adopted as such. That language alone can become our national language which the largest number of people already know and understand, and is easy to learn. English can never become our national language. Our love of the masses must be skin deep, if we don’t take the simple trouble to learn Hindi for as many months as we spend years learning English.

Greatest injustice to the youth of nation

Hadn’t we attained whatever higher education, or any education worth its name through the only medium of English, there should have been no need to prove such a self-evident proposition through arguments that ‘In order to keep the national identity and integrity intact the youth of a nation must receive all instructions including the highest, in their own respective vernaculars. It is an axiomatic truth that the youth of a nation cannot establish or maintain an active contact with the nation’s masses unless their knowledge is received and assimilated through a medium understood by the common people. Today, thousands of young men of this nation are being obliged to waste years in mastering a foreign language and its idioms, of which in their daily life they have the least use and in learning which they have to even neglect their own mother tongue and literature? There never was a greater superstition than that a particular language can be incapable of expansion of expressing abstruse and scientific ideas. A language is an exact reflection of the character and growth of its speakers.

Evil effects of the English Language

Among the many evils of foreign rule, this blighting imposition of a foreign medium upon the youth of the country will be counted by history as one of the greatest. It has sapped the energy of the nation. It has shortened the life of the students. It has estranged them from the masses. It has made education unnecessarily expensive. If this process is still persisted in, it is bound to rob the nation of its very soul. Therefore, the sooner the educated India shakes itself free from the hypnotic spell of the foreign medium, the better it would be for them and the people.

This is simply unbearable

The highest development of the Indian mind must be possible without the knowledge of English. It is doing violence to the manhood and specially the womanhood of India to encourage our boys and girls to think that an entry into the best society is impossible without the knowledge of English. It is too humiliating a thought to be bearable. Therefore, the most proper and under the circumstances the only possible measure would be to use the provincial language in the respective provinces and to use Hindi for the all-Indian purposes. While the Hindi speaking people must be in crores, the number of those who speak English perfectly enough can never be increased to more than just a few lakhs. Even the attempt to do so would be unjust to the people.

The first and greatest Social Service

This belief in the necessity of English training has enslaved us. It has rendered us incapable of doing true national service. Were it not for force of habit, we could not fail to see that by reason of English being the medium of instruction, our intellect has been segregated from the general masses. The most excellent ideas of the nation remain unpublished for want of an appropriate language; and the novel pieces of wisdom gained by us through the modern education fail to reach the common populace (because of the language gap). We have been engaged for the past sixty years in memorizing strange words and their pronunciation instead of assimilating worthwhile knowledge and wisdom. The first and greatest Social Service we can render is to revert to our vernaculars and restore Hindi to its natural place as the National Language.


 

Previous Article श्राद्ध-महिमा एवं पितरों को तृप्त व प्रसन्न करने के उपाय
Print
9706 Rate this article:
4.0
Please login or register to post comments.