• श्री योगवशिष्ठ महारामायण हमारे सभी आश्रमों का इष्ट ग्रंथ है- पूज्य बापूजी
  • श्री योगवशिष्ठ महारामायण पढे, और उसके अर्थ में शांत हो, तो साक्षात्कार अवश्य होगा - स्वामी रामतीर्थ
  • श्री योगवशिष्ठ महारामायण पढ़कर ही पूज्य बापूजी के मित्र संत घाटवाले बाबा को आत्मसाक्षात्कार हुआ | 

Pujya Bapuji on Yogvashishtha

आध्यात्मिकता का आखिरी सोपान है - श्री वसिष्ठ जी का उपदेश । यह एकदम ऊँचा  है, विहंग मार्ग है । यह अगर जम जाय न, तो सुनते-सुनते बात बन जाय और जिनको नहीं जमती वे बार-बार सुनें तो उन्हें बहुत फायदा होगा ।

 धनवान या निर्धन होना, विद्वान या अविद्वान होना, सुंदर या कुरूप होना - ये शाश्वत नहीं हैं | सुरूपता या कुरूपता  यह २५-५० साल के खिलवाड़ में दिखती है । शाश्वत तो आत्मा है आंर उस पर न कुरूपता का प्रभाव है न सुरूपता का, न विद्वत्ता का प्रभाव है न अविद्वत्ता का । तरंग  चाहे कितनी भी बडी हो लेकिन है तो अंत में सागर में ही लीन होनेवाली और चाहे कितनी  भी छोटी हो लेकिन  है तो पानी ही । ऐसे ही बाहर से आदमी चाहे कितना  भी बड़ा या छोटा दिखता हो किंतु उसका वास्तविक मूल तो चेतन परमात्मा ही है । उस चेतन परमात्मा के ज्ञान को प्रकट करने  का काम यह ग्रंथ करता है |

यह वह ग्रंथ है जिससे स्वामी रामतीर्थ को, घाटवाले बाबा को, मेरे गुरुजी ( स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज) को और दूसरे अच्छे-अच्छे उच्च कोटि के महापुरुषों को अपने आत्मा को मुलाकात हुई । इसे पढ़ने -सुनने एवं विचारने से श्रीरामजी का अनुभव, मेरे गुरुजी का अनुभव तुम्हारा अनुभव हो जाएगा  और ’सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म । ब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप और अनंत है तथा मेरा ही स्वरूप है'- ऐसा साक्षात्कार हो जायेगा |

स्वामी रामतीर्थ बोलते थे : "राम (स्वामी रामतीर्थ) क्रे विचार से अत्यंत आश्चर्यजनक और सर्वोपरि श्रेष्ठ  ग्रंथ, जो इस संसार में सूर्यं के तले कभी  लिखे गये, उनने से ' श्री योगवासिष्ठ' एक ऐसा ग्रंथ है जिसे पढ़कर कोई भी व्यक्ति इस मनुष्यलोक में आत्मज्ञान पाये बिना नहीं रह सकता |"

-परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

 

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कलियुग में हमारा कितना सौभाग्य !

कलियुग के बेचारे मानव में शारीरिक क्षमताएँ नहीं हैं, मानसिक सच्चाइयाँ नहीं हैं, बौद्धिक ऊँचाइयाँ नहीं हैं फिर भी 'योगवासिष्ठ महारामायण' जैसा ऊँचा ग्रंथ उसे पढ़ने-सुनने को मिल रहा है, यह उसका कितना सौभाग्य है। 

आज त्रेतायुग (जिस युग में वसिष्ठजी द्वारा भगवान श्रीरामजी को यह उपदेश दिया गया था) जैसा शरीर नहीं है, त्रेतायुग जैसी सामाजिक व्यवस्था नहीं है तथा वैसी मानसिक पवित्रता और सच्चाई भी नहीं है। लेकिन त्रेतायुग और सतयुग में सत्संग के विचार द्वारा श्रीरामजी जैसों को, श्रीरामजी के गुरुओं को, तत्कालीन लोगों को जो सत्यस्वरूप परमात्मा का ज्ञान, परमात्म-शान्ति और परमात्म-पद की प्राप्ति होती थी, वही परमात्म-ज्ञान, परमात्म-शांति और परमात्म-पद इस युग में भी हम पा सकते हैं। अपितु उन युगों की अपेक्षा इस युग में और सरलता से पा सकते हैं। 

कलियुग में मनुष्य शरीर से, मन से तथा बुद्धि से भी गरीब हो गया है। वह ज्यादा समय मन को एकाग्र और मौन नहीं रख सकता। परमात्मा ने कलियुग में ऐसी व्यवस्था की है कि मनुष्य थोड़ा सा साधन करे तो भी उसे बहुत सारी उपलब्धियों की प्राप्ति हो जाय। परमात्मा से मुलाकात करने हेतु मेरे गुरुदेव के गुरुदेव ने जितना परिश्रम किया, जितनी तपस्या की, उससे कम परिश्रम में मेरे गुरुदेव को परमात्मा की मुलाकात हुई। लेकिन मेरे गुरुदेव को जो तप-तितिक्षा सहनी पड़ी, उसका हजारवाँ हिस्सा भी मुझे गुरु-प्रसाद पाने हेतु सहन नहीं करना पड़ा। फिर भी मुझे जो सहन करना पड़ा, उतना मेरे साधकों को नहीं करना पड़ रहा है और सहज में ही उन्हें साधना का मार्ग मिल रहा है।

जो दुःखमय संसार की चोटों से बचकर परम सुख, परम शीतलता का अनुभव करना और अपना कर्त्तव्य निर्लेप भाव से निभाना चाहते है, उन सभी के लिए 'श्री योगवासिष्ठ महारामायण' बहुत अच्छा है।

स्वामी रामतीर्थ ने इसका बार-बार अध्ययन किया और वे इसके ज्ञान में, आत्मानुभव में इतने मस्त हुए कि अपने देश में तो आत्मशांति का प्रसाद बाँटा ही लेकिन अमेरिका भी गये और वहाँ के प्रेसीडेंट रुजवेल्ट ने उनसे बड़ी शांति पायी। यह सदग्रंथ पढ़कर मनन करने से व्यक्ति स्वयं ही शांति पाता है, परमात्मा में सराबोर हो जाता है तथा दूसरों को भी शांति देने की क्षमता उसमें आ जाती है। 

स्वामी रामतीर्थ बोलते थेः "राम (स्वामी रामतीर्थ) के विचार से अत्यंत आश्चर्यजनक और सर्वोपरि श्रेष्ठ ग्रंथ, जो इस संसार में सूर्य के तले कभी लिखे गये, उनमें से 'श्री योगवासिष्ठ' एक ऐसा ग्रंथ है जिसे पढ़कर कोई भी व्यक्ति इस मनुष्यलोक में आत्मज्ञान पाये बिना नहीं रह सकता।"

'श्री योगवासिष्ठ महारामायण' बार-बार विचारने योग्य है।

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