समय और साधन का सदुपयोग कैसे?
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समय और साधन का सदुपयोग कैसे?

परम सुहृद परमात्मा ने असीम करुणा करके हम लोगों को जो विवेक, बुद्धि और ज्ञान आदि दिये हैं, उनका उचित उपयोग करके हमें विचार करना चाहिए कि हमारा समय किस कार्य में बीत रहा है ।

परमात्मा ने हमको जो कुछ भी दिया है, क्या हम उन सबका सदुपयोग कर रहे हैं ? यदि नहीं, तो क्या हमें बाद में पछताना नहीं पड़ेगा ?  क्योंकि जो मनुष्य अपने समय को नष्ट कर देता है उसे सदा के लिए पश्चाताप करना ही पड़ता है । अतः किसी भी कार्य को करने से पहले हमें यह विचार करना चाहिए कि क्या हम ठीक कार्य कर रहे हैं ? यदि नहीं, तो हमें उस कार्य को नहीं करना चाहिए । इसी तरह कार्य करने से पहले उसके परिणाम का विचार भी अत्यन्त आवश्यक है । जो समय को अनुचित आहार-व्यवहार में नष्ट करता है वह स्वयं को ही नष्ट करता है । जो समय और वस्तुओं को अनुचित ढंग से बरबाद करता है वह स्वयं बरबाद हो जाता है । अतः हे पवित्र आत्मन् ! हिम्मतवान बनो । मार्ग के शत्रृओं की अपेक्षा भीतर के शत्रृओं को मार भगाओ । प्रतिदिन मन के दोषों को सामने लाकर चिंतन करो कि आज गलती नहीं करेंगे, आज अधिक आहार नहीं करेंगे । हर घंटे दोहराओ । ॐ.... ॐ... का गुंजन करो । परमात्मा आपके प्रेरक हैं, रक्षक हैं, पोषक हैं । शुभ संकल्प के पोषण के लिए बार-बार उनका स्मरण करो । ॐ.... ॐ.... अंतर्यामी ॐ... दीनदयाल ॐ... सदा दयालु ॐ... ॐ...

समय बड़ा अमूल्य है । एक क्षण का समय भी लाखों रुपये खर्च करने से या स्तुति-प्रार्थनापूर्वक रुदन करने से या अन्य किसी भी उपाय से मिलना सम्भव नहीं है । अतः जीवन का जो कुछ भी समय शेष है उसीमें अपना काम शीघ्र बना लेना है । समय और साधनों का सदुपयोग करके स्वयं को परमात्मा में स्थित किया जा सकता है ।

अतः मनुष्य को शीघ्रातिशीघ्र सावधान हो परमात्मा की प्राप्ति के लिए कटिबद्ध होकर प्रयत्न करना चाहिए । परमात्मा की प्राप्ति के लिए मन, बुद्धि, शरीर, इन्द्रियाँ आदि जिन चीजों की आवश्यकता है , वे सब ईश्वर की कृपा से हम सबको प्राप्त हैं । ईश्वर के दिये हुए इन पदार्थों का जो ठीक से सदुपयोग करता है, वह मानव-जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता है । परंतु जो उनका दुरुपयोग करता है, उसका पतन होने लगता है ।

मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ का संयम करके उनको संसार के विषय-भोगों से हटाकर परमात्मा में लगा देना उनका सदुपयोग करना है और इसके विरुद्ध निद्रा, आलस्य, प्रमाद, पाप, और विषय-भोगों में लगाना दुरुपयोग है । बुद्धि और विवेक के होते हुए भी यदि समय का उचित उपयोग न करें तो यह हम लोगों की महान मूर्खता है । मनुष्य को पद-पद पर, क्षण-क्षण में विवेकयुक्त बुद्धि से काम लेना चाहिए । जो अपने समय का उचित उपयोग करता है वही बुद्धिमान है और वही सफल होता है ।

यह मनुष्य-शरीर, उत्तम देश-काल, भगवत्प्राप्त महापुरुषों का संग ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त हुआ है । ऐसा अवसर बार-बार मिलना कठिन है । इसलिए शीघ्र ही सावधान होकर अपना कार्य सिद्ध कर लेना चाहिए । अपने समय का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोना चाहिए । 

  - पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

(ऋषि प्रसाद अंक - 115 - जुलाई - 2002)

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