साध्य को पाये बिना.....
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साध्य को पाये बिना.....

जो खिलाड़ी खेल को कठिन मानता है वह खिलाड़ी नहीं अनाड़ी है । जो कारीगर बोलता है कि यह काम कठिन है, वह कारीगर नहीं अनाड़ी है । जो कहता है कि आत्मज्ञान पाना कठिन है, आत्म-विश्रांति पाना कठिन है आत्मा में आराम पाना कठिन है, परमात्मा का ध्यान करना कठिन है, प्रभु का अमृत पीना कठिन है, वह प्रभु के मार्ग में अनाड़ी है । 

राजा खटवांग ने एक मुहूर्त में प्रभु का साक्षात्कार कर लिया। राजा जनक ने घोडे के पेंगड़े में पैर डालते प्रभु का अनुभव कर लिया । शुकदेवजी महाराज ने इक्कीस दिन में आत्म-साक्षात्कार कर लिया । राजा परीक्षित को कथा श्रवण करते करते पाँच दिन हुआ, शुकदेवजी की नूरानी निगाह पड़ी तो परीक्षित को तसल्ली मिल गयी । सातवें दिन पूर्णता प्राप्त हो गई । 

अधिकारी जीव को पाँच सात दस दिन में, महिने दो महिने में, साल दो साल में, दस साल में भी, अरे पचास साल तो क्या पचास जिन्दगियाँ दाव पर लगाने के बाद भी अनन्त ब्रहांड के नायक प्रभु का अनुभव होता है तो सौदा सस्ता है ।

तू लगा रह । थक मत । लगा रह... लगा रह....! मापतौल मत कर । पीछे कितना अन्तर काटकर आया इसकी चिन्ता मत कर। आगे कितना बाकी है यह देख ले । जितना चल लिया वह तेरा हो गया ।

वशिष्ठजी कहते हैं: "हे रामजी ! सन्ध्या का समय हुआ है ।"

सभा में सब परस्पर नमस्कार करके उठने लगते हैं तो रामजी बोलते हैः  "भगवन् ! तुम्हारे शब्द कानों के भूषण है । सुनते सुनते कान अघाते नहीं । हालांकि ये बातें मैं पहले सुन चुका हूँ लेकिन फिरसे आप बोलते हैं... बड़ी प्यारी लगती है ये बातें ।"

तुलसी दासजी कहते हैः

श्रवण जाँ के समुद्र समाना......

कान जिसके समुद्र हैं.... 

सब नदियाँ जाकर समुद्र में गिरती हैं लेकिन समुद्र इन्कार नहीं करता । ऐसे ही जो श्रोता हरिरस की चर्चा सुनते सुनते थकता नहीं, उबता नहीं तो समझ लो उसके कान नहीं हैं, समुद्र है । 

श्रवण जाँ के समुद्र समाना

हरिकथा सुनहिं नाना...

यदि सत्संग नहीं सुनेगा तो कुसंग सुनेगा । यदि सत्कृत्य नहीं करेगा तो कुकृत्य करेगा । बन्दगी में, तपस्या में समय नहीं जायेगा तो ऐसे ही हाहा... हूहू.. में समय जायेगा । सत्संग में पांच घण्टे बिताये तो ये पांच घण्टे तपस्या में गिने जायेंगे । ज्ञान मिला वह मुनाफे में, भक्ति मिली वह मुनाफे में । नहीं तो पांच घण्टे वैसे ही बीत जाते ।

कबीरा दर्शन संत के साहिब आवे याद ।

लेखे में वो ही घड़ी बाकी के दिन बाद ।।

जो घड़ियाँ हरिचर्चा में, हरिध्यान में बीती वे सार्थक हैं ।

कोई भी कार्य उत्साह से किया जाय तो समय शक्ति उसमें कम लगने पर भी वह कार्य बढ़िया सुन्दर बन जाता है । जो कार्य करने का है उसमें उत्साह नहीं है तो समय ज्यादा लगता है और इतना फलित भी नहीं होता है ।

बड़े में बड़ा कार्य है भगवत्प्राप्ति । जिसने भगवत्प्राप्ति नहीं की उसने व्यर्थ जीवन गंवा दिया । भगवत्प्राप्ति करने में उत्साह चाहिये । उत्साह आने पर साधन में नियमितता आने लगती है । साधन में नियमितता आने के कारण साधन में रस पैदा होता है । वह रस साध्य तक पहुँचा देता है ।

अगर साधन भजन में रस नहीं है, आहार व्यवहार में नियमितता नहीं है तो अच्छे से अच्छा साधक भी गिर जाता है ।

सद्गुरु का एक शिष्य उपदेश सुनकर एकान्त में गया । थोड़ा साधन भजन किया । उसकी धारणाशक्ति सिद्ध हो गई । एकाग्रता हुई । एकाग्रता के बल से आत्म-साक्षात्कार करना चाहिए वह तो किया नहीं । एकाग्रता से छोटा मोटा कुछ प्रभाव आया तो वह अपने को परमहंस मानने लग गया ।

ब्रह्मवेत्ता महापुरुष ने जब तक अनुभव नहीं करवाया तब तक अपने मन से ही प्रमाणपत्र लेकर बैठ जाना यह अपने आपको धोखा देना है । आखरी मुहर तो ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों की होती है ।

जब तक साक्षात्कार नहीं होता है तब तक उच्च कोटि के महात्मा नहीं कहेंगे कि तेरेको साक्षात्कार हो गया है । साक्षात्कार का मतलब है राग, द्वेष और अभिनिवेश निवृति हो जाय । पूरा संसार और मृत्यु का भय भी सत्य न दिखे । सारा संसार स्वप्न की नांई भासे । स्वप्न में सुख देखा हो या दुःख देखा हो, जाग्रत में उसका कोई मूल्य नहीं । स्वप्न में तुमने लाखों रूपयों का दान किया तो जाग्रत में उस दान का अहंकार नहीं होता । स्वप्न में तुम्हारी जेब कट गई या करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो गई तो आँख खुलने पर उसका शोक नहीं होता ।

ऐसे ही यह संसार स्वप्न है । बोध हो जाता है तो हर्ष-शोक के प्रसंग में सुख-दुःख भीतर से हिलायेंगे नहीं । जब तक ऐसा बोध हुआ नहीं, सौ प्रतिशत यात्रा हुई नहीं तब तक साधन में कोई शिथिलता कर दे या अपने को ज्ञानी मान ले यह बड़ी भूल है ।

कोई बोलता है, पृथ्वी बड़ी है, कोई बोलता है आकाश बड़ा है, कोई बोलता है स्त्री और पुरुष बड़े हैं लेकिन गोरखनाथ बोलते हैं कि भूल बड़ी है जो आदमी को चौरासी लाख योनियों में भटकाती है । अपने स्वरूप के बारे में जो भूल है वह बड़े में बड़ी है । वही सब भ्रम दिखाती है ।

साधना में थोड़ा अनुभव हो जाय उसीमें तुष्ट हो जाना यह भी भूल है । इस तुष्टि के कारण वह साधक बेचारा उलझ गया । उलझ गया तो वह अपने को सिद्ध मानने लग गया । थोड़ी सेवा आदि की थी, थोड़ा भजन बजन किया था । थोड़े पुण्य जमा हुए थे तो वह कपड़े लत्ते निकालकर परमहंस का वेश बनाकर बैठ गया । लोग बापजी बापजी करने लगे । लोग खिलावे तो खावे, नहीं तो पड़ा रहे । कीर्ति फैल गई ।

किसी राजने देखा कि ज्ञानी है, परमहंस है । बड़े आदर से महल में ले आये । सेवा की । पहले छोटी मोटी कौपीन पहनते थे फिर रेशमी चद्दरे पहनने लगे । कीर्ति में फँसे । राज्य का अन्न खाने लगे । राजा के वहाँ रहने लगे । राजसी अन्न... बकरे कटते हैं उसमें से टेक्स आता है, श्मशान का भी टेक्स आता है । सब राज्य का अन्न । बुद्धि रजोगुणी हो गई, साधना नष्ट हो गई ।

राजा को एक ही लड़की थी । और कोई संपत्ति नहीं थी । राजा ने सेवा पूजा की । राजा के कुछ पुण्य होंगे तो उसको बेटा हुआ । राजा इस साधक को भगवान मानने लगा । राजा के निवास में

रहते रहते बुद्धि एकदम नीच हो गई । राजा की रानी भी सेवा करे, राजा की बेटी भी सेवा करे । उस युवती को देखते देखते मन में बिकार पैदा हुआ । एक दिन राजा को बुलाया और कहाः

"देख, यह लड़का तो पैदा हुआ मेरी कृपा से, लेकिन उसके ग्रह ऐसे हैं कि तुम्हारी लड़की जीवित होगी तो यह लड़का मर जायेगा ।"

"बापजी, कोई उपाय बताओ।"

"उपाय यह है कि लड़की को सन्दूक में डालकर कृष्णार्पण कर दे तो लड़का जीयेगा, नहीं तो मर जायेगा ।"

राजा आ गया उसकी षड़यंत्र की बातों में, उसने लड़की को सन्दूक में डालने की बात बजीर को कही । बजीर कुछ सयाना था । सोचा कि राजमहल में रहते रहते साधक की साधना चट हो गई है । तत्त्वज्ञान में स्थिति नहीं । राजा उससे भरमा गया है ।

बजीर ने सन्दूक मंगाई । लड़की को जाकर ठीक जगह रख दी और जंगल से एक शेर पकड़वाकर सन्दूक में बन्द कर दिया । वाजते गाजते सन्दूक को बापजी के कहे अनुसार नहीं में प्रवाहित कर दी । साधक ने यह देखा । मनोमन कहाः अपना काम बन गया । जंगल जाने के बहाने वह भागा, सोलह सिंगार की हुई युवती को सन्दूक में सुलाया था वह लेने के लिये । दौड़ते दौड़ते दो मील का चक्कर काट कर आगे जाकर देखा तो सन्दूक आ रही है । अपना मनोरथ पुरा होगा । सन्दूक पकड़कर खोली तो निकला शेर । फिर क्या हुआ होगा यह कहने की आवश्यकता नहीं ।

निगुरे का हाल भी निगुरा होता है । मनमुख कहाँ धोखा खा लेता है उसको पता नहीं चलता ।

इस प्रकार की प्राचीन घटनाएँ हम लोगों को सावधान करती है कि जब तक पूरा तत्त्वज्ञान हजम नहीं हो जाता तब तक साधन में से रूचि न हटाई जाय । इतनी कृपा करे । साधन में रुची बनी रहेगी तो अपनी गलती समझ में भी आयेगी । साधन में रुची बनी रहेगी तो साधन में रस आयेगा । साधन का रस चालू रहेगा तो बाहर का रस आकर्षित नहीं करेगा । साधन का रस छोड़ दिया तो बाहर का रस फँसा देगा ।

इसलिए साधन में नियमितता । समझो कोई कारण वश नियमितता शायद न ला सकें तो भी साधन में प्रीति बनी रहनी चाहिए । साधन में प्रीति होगी तो साधन में रस आयेगा । साधन में रहस आयेगा तो साध्य तक पहुँचा देगा ।  

हम इतना मूल्य संसार को दे देते हैं इतना मूल्य अगर ईश्वर को दें तो सचमुच फिर देर नहीं  है, आप ईश्वर हैं ही । लेकिन जितना मूल्य ईश्वर को, परमात्मा को देना चाहिए उसका आधा मूल्य भी दे दें न ! तो भी दुःख, कलह, परेशानी, जन्म-मृत्यु दूर हो जाय । हम मुक्त हो जायें । लेकिन हम परमात्मा के मूल्य को जानते नहीं । जगत का मूल्य संसार का आकर्षण दिमाग में इतना भरा है कि दिन रात उसीको सुनते हैं, उसीको देखते हैं, उसीकी चर्चा करते हैं . हमारे हृदय में नाम रुप की सत्यता घुस गई है । नाम-रूप की सत्यता ने लोगों के दिल की इतनी खाना खराबी कर दी है कि दिल में दिलबर छुपा है वह दिखता नहीं और जो मिथ्या है, स्वप्न जैसा है, बदलनेवाला है, जिसमें कुछ सार नहीं फिर भी दिल दिमाग को घेर रखा है ।

आपने डिप्टी कलेक्टर की कथा सुनी, शंकराचार्यजी की कथा सुनी, कालचक्र की बात सुनी । इस प्रकार आपको भी कोई बात लग जाय तो तो गांठ बांध लो । क्योंकि जीवन बहुत मूल्यवान है । एक एक दिन आयुष्य का नष्ट हो रहा है । एक एक घण्टा आयुष्य कम हो रहा है । एक एक मिनिट आयुष्य क्षीण हो रहा है । फिर उसमें सुख देखा तो भी स्वप्न हो गया, दुःख देखा तो भी स्वप्न हो गया, दुश्मन देखे तो भी स्वप्न हो गया ।

ऐसे स्वप्न जैसे जीवन में लोग बेकार का तनाव खींचाव करके अपनी शक्ति बरबाद कर देते हैं । जब दुःख आ जाय तो याद रखो कि यह खबर देता है कि संसार का यही हाल है । जब सुख आ जाय तब समझना कि यह टिकनेवाला नहीं । यह पक्का समझ लिया तो सुख जाते समय दुःख नहीं देगा । सूरज रोज ढलता है यह पता है इसलिए शाम को सूर्य ढल जाता है तो दुःख नहीं होता । लेकिन घर में लाइट का फ्यूज उड़ जाता है तो हाय हाय ! आकाश में सब फ्यूज का नाम बाप ऐसा सूर्य डूब जाता है तो हाय हाय नहीं होता । कभी सूरज ढला तो दुःख होता है कि हाय हाय !  अन्धेरा हो गया ? नहीं, यह तो रोज होता है अन्धेरा । घर का छोटा-सा दिया बुझ जाता है तो दुःख होता है । क्योंकि यह मेरा दिया है । ममता है ।

कभी पति का दिया बुझ जायेगा कभी पत्नी का दिया बुझ जायेगा, कभी पुत्र का दिया बुझ जायेगा । दिये का तेल देखकर अन्दाज लगा सकते हैं  कि दिया कब तक जलता रहेगा लेकिन अपने जीवन रूपी दिये का कोई भरोसा नहीं । अतः अभी से सावधान !

काफिल क्यूं सोचत नहीं वृथा जीवन विलाय ।

तेल घटा बाती बुझी अन्त बहुत पछताय ।।

जैसे कोई खिलाड़ी समझता है कि खेल खेलना कठिन है वह खिलाड़ी नहीं, अनाड़ी है । ऐसे ही जो साधक समझता है कि आत्मज्ञान पाना कठिन है, मुक्त होना कठिन है वह साधक नहीं अनाड़ी है, उसमें सत्त्व-गुण नहीं आया, गुरु के ज्ञान में दृढ़ता नहीं आयी । परमात्मा में प्रीति नहीं हुई । तड़फ नहीं आयी छटपटाहट नहीं आयी । इसीलिए उसको कठिन लगता है ।

चातक मीन पतंग जब पिया बिन नहीं रह पाया ।

साध्य को पाये बिन साधक क्यों रह जाय ।।

मौत सिरपर खड़ी है और तू चद्दर ताने सोया है । कब तक वह सोने देगी ?  यह तो बहती सरिता है । जिसने पानी पी लिया सो पी लिया, नहा लिया सो नहा लिया । पानी हमारा इन्तजार थोड़े ही करेगा ? जितना पा लिया, जितना कर लिया, जितने संस्कार मजबूत हो गये परमात्म-भाव के उतनी ही तुम्हारी मूड़ी है । और कोई मूड़ी तुम्हारी नहीं है । ब्रह्मभाव के जो संस्कार हैं वे आपके हैं । आत्म-विश्रांति के संस्कार आपके हैं, और कुछ आपका नहीं है ।

जब भी मौका मिले, अकेले हो जाओ । शांत हो जाओ । मौन का मजा लो । सत्संग की बात सुनकर मौन हो जाओ । आपस में ये बातें एक दूसरे को कहो, संतों की प्रशंसा करो यह ठीक है लेकिन मौन होकर सत्संग के विचारों में डूबे रहना, आत्म-चिंतन में मस्त रहना अधिक अच्छा है । चित्त को शांत करते जाओ, आत्म-शान्ति में खोते जाओ । सोना नहीं है, शान्त होना है । जितना जितना शान्ति का रस बढ़ेगा, जितनी जितनी निर्विकारीता बढ़ेगी उतना उतना आप  महान होते जायेंगे । क्या पता, दुबारा ऐसा शरीर मिले न मिले, दुबारा ऐसी बुद्धि मिले न मिले, दुबारा ऐसा प्यार से उपर उठानेवाले संतों की मुलाकात हो न हो !

देनेवाला दामन खोलकर दे रहा है, तू अपना दामन क्यों सिकुड़ रहा है  ?  अपना दामन फैलाये जा... फैलाये जा.... लेता जा । इन्कार क्यों करता है ?

साधन में रूचि रहे ।

“रूचि नहीं रहती है तो क्या करें ?”

साधन में नियमितता ।

“नियमितता नहीं रख सकें तो क्या करें ?”

भोजन में नियमितता है ?

“नहीं ”

नींद करने में नियमितता है  ?

“बाबाजी, नहीं है ।”

अच्छा । भोजन करने में, नींद करने में नियमितता नहीं है फिर भी भोजन तो कर लेते हो । नींद भी कर लेते हो । ऐसे ही अपना साधन भजन भी कर लो ।

जो बहिर्मुख लोग हैं, जो रजो तमोगुण के संस्कार के ज्यादा हैं उन लोगों का अन्न अनिवार्यता हो तो ही खाओ, नहीं तो बचो ।

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ।

जीवन में ऐसी कोई घड़ियाँ आ जाय आपत्तियों को तो तुरन्त स्मृति आ जाय तो ज्ञान की । मानो एकाएक सामने मौत आ जाय तो भीतर से तुम्हारी बुनकार होनी चाहिए की मेरी कभी मौत होती नहीं ।

वास्तव में ऐसा तुम्हारा स्वभाव है । तुम वास्तव में ऐसे हो । तुम्हारी मौत कभी होती नहीं लेकिन गलती ने तुम्हें ऐसा पकड़ रखा है कि बस ...मर गये । पानी नहीं मिला तो मर गये, छाछ नहीं मिली तो मर गये । हजार हजार बार ‘मर गये...मर गये...’ कहते कहते भी जी रहे हो ना ? ऐसे ही ये हजार हजार शरीर मरे लेकिन तुम तो सब के जीवनदाता हो । तुमको यह पता नहीं । सूर्य में तुम्हारा प्रकाश है, तारों में तुम्हारी टिम-टिमाहट है, चाँद में तुम्हारी चमक है, योगियों के हृदय में तुम्हारी धड़कन है । लेकिन तुम्हें अपनी महिमा का पता नहीं ।

अपनी महिमा को जानो । अपनी महिमा को पाओ । वाड़ा, पंथ, संप्रदाय ठीक है, सब अपनी अपनी जगह पर है लेकिन आखिरी सत्य और सार तो यही है । जो ब्रह्मवेत्ता हों, ज्ञानवान हों, वेद वेदांत के तत्त्व-मत से वाकूफ हों और जिनको अपना आत्मा हस्तामलकवत् भासता हो, ऐसे महापुरुषों के अनुभव का वचन पकड़कर साधन में डट जाओ । फिर जब व्यवहार करो तब व्यवहार को देखो कि आखिर कब तक ?

बचपन खेल हो गया, जवानी खेल हो गई  । सब स्वप्न... । आखिर पति कब तक ?  पत्नी कब तक ?  रूपये कब तक ?  सत्ता कब तक ? फूलों की शय्या कब तक और पलंग का आराम कब तक ?

जिसमें पुरुषार्थ करना है वह ईश्वर-प्राप्ति की बात रख दी प्रारब्ध पर और जो प्रारब्ध के आधीन है उसमें पुरुषार्थ करने लग गये हैं । आँख की दवा पेट में और पेट की दवा आँख में ।

एक बीमार आदमी था । आँखों में कुछ जलन थी, वह वैदराज के पास गया । वैदराज ने आँखों के लिए लोशन आदि दिया और पेट के लिए कुछ पुड़िया दी । उस बीमार ने क्या किया कि आँख की दवा पी गया और पेट की दवा आँख में डाल दी । आँख हो गई टमाटर जैसी लाल और पेट फूलकर हो गया तरबूज ।

यह उस मरीज की कहानी नहीं है, हम लोगों की है । चारों तरफ देखो तो यह हाल है । आँख भी ठीक से काम नहीं देती है ज्ञान की, और जीवन के सुख-दुःख को पचाने की चठराग्नि भी नष्ट हो गई है । यह हम लोगों की तो घटना है ।

अब कृपानाथ ! कृपा करो अपने उपर । जो आँख में छांटने की दवा है उसे आँख में छांटो और जो खाने की दवा है उसको खाओ । जिस निगाह से संसार को देखना चाहिए, उस निगाह से संसार को देखो और जिस निगाह से, जिन भाव से प्रभु-प्राप्ति करनी है उस निगाह को प्रभु के तरफ लगाओ । बस, आपका बेड़ा पार हो जायेगा । आपका गुरुपूर्णिमा का पर्व पूर्ण रूपेण फल जायेगा ।

गुरुपूर्णिमा का उद्देश्य यह होता था कि सालभर में एक बार बिखरे हुए गुरुभाई एकत्र हों । कुछ नया मार्गदर्शन, कुछ नया उत्साह लेकर अपने लक्ष्य की ओर तीव्रता से गति करें । चातुर्मास का प्रारंभ करके आध्यात्मिक खजाना कमाने लगें । कुछ नियम, कुछ संकेत, गुरुओं की कुछ दुआ पायें और कुछ अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें । इसीलिए गुरुपूर्णिमा के पर्व का आयोजन किया गया है । कान में फूँक मारकर दक्षिणा ले लेने का यह पर्व नहीं है । लेकिन शोक, ताप, संताप से तप्त जीवों की तपन लेकर उनके हृदय में परमात्मा की पवित्र शीतलता भरकर जीव को जगाने का यह पर्व है ।

शिष्य़ सोचता है कि जिन ऋषियों, महापुरुषों के द्वारा ऐसा ऐसा मिलता है तो उनके लिये हम क्या करें ?

हम कृतघ्न न बनें, गुणचोर न बनें इसलिये कुछ न कुछ सेवा करें । शिष्य कुछ सेवा खोजते हैं और गुरु सोचते हैं कि शिष्यों का तन, मन, धन जीवन सार्थक हो जाय ।

गंगा में नहाते हुए गुरुजी ने दूर खड़े शिष्य से पानी मांगा । शिष्य ने गंगाजल का गिलास भर दिया । अन्य साधूओं के पूछने पर गुरुजी ने कहाः “शिष्य को सेवा का मौका दिया ।”

जो सत् शिष्य हैं वे गुरुओं के आदेशों का, उद्देश्यों का पालन करते हैं और सेवा का मौका ढूंढते हैं । जो स्वार्थी हैं वे नश्वर संसार की सेवा करने में रूचि रखते हैं लेकिन शाश्वत परमात्मा की दिशा में ले जानेवाले रास्ते पर चलने की रुची कम रहती है । इसका अर्थ यह है कि उन्होंने ईश्वर को कम मूल्य दिया है । परमात्मा को जो मूल्य देना चाहिये वह मूल्य उन्होंने जगत दिया है । जगत का जो मूल्य है, वह रख दिया है परमात्मा के लिये । वे हैं भगत । जगत का और परमात्मा का, दोनों का मूल्य जिन्होंने जगत में लगा दिया वे हैं मूढ़ । दोनों दृष्टियाँ जिन्होंने जगत में खर्च कर दी वे हैं पामर ।

जो लोग संतों के पास आते हैं वे मूढ तो नहीं हैं, पामर तो नहीं हैं लेकिन संत जिन उच्च कोटि के जिज्ञासु की तलास में हैं वैसे जल्दी मिलते नहीं । संत अपने खजाना बाँटते रहते हैं , वह खजाना खूटता नहीं । लेकिन पूरे का पूरा खजाना लेनेवाला कोई मिल जाय  ऐसी ताक में रहते हैं । ऐसा उत्कट जिज्ञासु , पूरा सत्-शिष्य जल्दी मिलता नहीं । कवि काग अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहते हैः

अमे नीसरणी बनीने दुनियामां ऊभा,

पण चड़नारा कोई ना मळ्या रे जी ।

अमे दादरो बनीने खीला खाधा,

पण तपस्यानां फळ ना फळ्याँ रे जी ।

अंगड़ां कपाव्यां अमे, आग्युंमां ओराणा,

अमे जन जननी थाळीए पीरसाणा,

पण जमनारा कोई ना मळ्या रे जी ।

माथड़ां कपाव्या अमे, पाणीमां बफाणा

अमे अत्तर थईने रूने पूमड़े नखाणा

पण सूंघनारा कोई ना मळ्या रे जी ।

‘काग’ सरगापुरी छोड़ी अमे पतीतोने काजे

अमे हेमाळेथी देहने पड़ता मेल्या

पण झीलनारा कोई ना मळ्या रे जी ।

ऐसा क्यों होता है ? संतों के पास सत्संग सुननेवाले तो हजारों की संख्या में लोग आते हैं लेकिन तत्त्वज्ञान की, आत्म-साक्षात्कार की, परमात्मा की आखरी यात्रा सब लोग नहीं कर पाते । क्यों   ? क्योंकि उनको ज्ञानवानों का संग कम है और संसार में उलढी हुई व्यकियों का संग ज्यादा है । खानपान की खबरदारी नहीं । जन्मजात ज्ञान के संस्कार नहीं । इसीलिये देरी होती है । अन्यथा परमात्मा प्राप्ति में कुछ देरी नहीं, कोई तकलीफ नहीं । जो खिलाड़ी है उसके लिये खेल आसान है । जो अनाड़ी हा उसके लिये खेल कठिन है ।

जो बोलते हैं कि परमात्मा-प्राप्ति करना कठिन है, आत्मज्ञान पाना कठिन है, अपने दिल में छुपे हुए दिलवर का दीदार करना कठिन है, अपने आपकी मुलाकात करना कठिन है, आत्मदेव की मुलाकात करना कठिन है, वे खिलाड़ी नहीं अनाड़ी हैं । लेकिन जो बोलते हैं आसान है, सरल है, परमात्मा तुमको मिल सकते हैं, ऐसे महापुरुष का मिलना कठिन है । रमण महर्षि जैसे  आत्मवेत्ताओं  का मिलना कठिन है, याज्ञवल्क्य और अष्ठावक्र जैसे ज्ञानवानों का मिलना कठिन है ।

ईश्वर मिलना कठिन नहीं है लेकिन हमारे हृदय में ईश्वर की सहजता, सरलता, आनंद प्रकट करनेवाले, हमारे दिम में ईश्वर-प्राप्ति के लिये जिज्ञासा का तूफान भरनेवाले, परमात्म-प्राप्ति कराने में उत्सुक ऐसे महापुरुषों का मिलना कठिन है । जो बोलते हैं कठिन नहीं है ऐसे संत पुरुषों का मिलना कठिन है ।

मौत के समय भी अगर यह स्मृति आ जाय तो निहाल हो जाओगे । विद्यार्थी नहीं पढ़ता है, तो उसका कसूर है  फिर भी मास्टर को लगता है कि वह पास हो जाय तो अच्छा है । किसी तुक्के से निकल जाय तो अच्छा है ।

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