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कैसा निराला है गीता का योग और उसके भक्त !
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कैसा निराला है गीता का योग और उसके भक्त !

(श्रीमद्‌भगवद्‌गीता जयंती : 8 दिसम्बर)

वेदोक्त रीति के अनुसार यज्ञशाला में बैठकर देवताओं के लिए जो होम-हवन किये जाते हैं, संकल्पपूर्वक दान किये जाते हैं उसमें धर्म की प्रधानता है । धर्म की भावना के बल पर यह सब सम्पन्न किया जाता है । मंदिर या एकांत स्थल में बैठ के की जानेवाली पूजा उपासना-प्रधान है । आसन, प्राणायाम एवं योग आदि साधना-विधियों में समाधि की प्रधानता है । वेदांत इन तीनों से विलक्षण है । इसमें तत्त्वदर्शन की प्रधानता है । ‘आत्मा क्या है ?’ इसका श्रवण करो, मनन करो, निदिध्यासन करो और अंततः उस तत्त्व का साक्षात्कार करो । यही वेदांत की रीति है ।

गीता जिस धर्मोपासना, योग या ज्ञान का विवेचन करती है वह कुछ निराला ही है । वह यज्ञशाला, मंदिर, गिरि-गुफा या नदीतट पर पद्मासन लगाकर की जानेवाली साधना नहीं है । गीता में निर्दिष्ट साधना दैनंदिन लोक-व्यवहार में भी की जा सकती है । गीता में वर्णित धर्म-अनुष्ठान, कर्मयोग, ज्ञानयोग का अनुष्ठान व्रतमात्र नहीं है, होम-हवन ही नहीं है, गीता का योग तो ऐसा है जिसे दैनिक जीवन के क्रिया-कलापों के मध्य भी सिद्ध कर सकते हैं । भोजन पकाते हुए, रोजी-रोजगार चलाते हुए या कार्यालयों में कार्य करते हुए भी गीता का कर्मयोग आचरण में उतार सकते हो । अरे ! भगवान तो यहाँ तक कहते हैं कि युद्ध करते हुए भी तुम गीता का योग सिद्ध कर सकते हो । युद्ध करने पर भी युद्ध से निर्लेप रह सकते हो । विश्व का कोई भी धर्म हमारे लोक-व्यवहार को अंतरंग, सूक्ष्म और भगवन्मय बनाने में इतना शक्तिमान नहीं है । गीता (6.30) में तो भगवान ऐसा भी कहते हैं कि

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ।।

‘जो सम्पूर्ण भूतों (समस्त प्राणियों) में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अंतर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता ।’

गीता का भक्त कैसा होता है इसका वर्णन भगवान 9वें अध्याय के 14वें श्लोक में करते हैं :

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ।।

‘वे दृढ़ निश्चयवाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं ।’

ऐसों को ईश्वर सँभाल लेता है

गीता का भक्त, भगवान का भक्त अकर्मण्य या पलायनवादी नहीं हो सकता । अर्जुन, उद्धवजी, अम्बरीष, लक्ष्मणजी, हनुमानजी, भरतजी आदि भगवान के अनन्य भक्त ही तो थे ! भगवान के सिवाय और कहीं उनकी दृष्टि टिकती नहीं थी । फिर भी उनके व्यवहार में, उनके कार्यों में कहीं भी अकर्मण्यता, पलायनवाद, भीरुता को स्थान नहीं था । साधारण व्यक्ति न कर सके ऐसे महान कार्य उन कर्तव्यनिष्ठ भक्तों ने किये हैं । वे अपने कार्य में व्यस्त रहते हुए भी परमात्मनिष्ठा में अनन्य रहे । उनका कर्तव्य-बोध विशेष सुदृढ़ रहा । उनको प्राप्तव्य की कोई भी चिंता नहीं रही । भगवान का परम भक्त तो सेवाकार्य में प्रवृत्त हो और मृत्यु भी आ जाय तो मृत्यु को भी आलिंगन देने को तत्पर रहा है । भगवान ने स्वयं कहा है :

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । (गीता : 2.47)

कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फलों में नहीं ।

पाश्चात्य कल्चर कहता है : Deserve only, no need of desiring.. ‘पहले योग्य बनो, बलिदान दो, बाद में ही इच्छा करो ।’

जबकि पौर्वात्य (प्राच्य, सनातन) संस्कृति, गीता का ज्ञान कहता है : Deserve only, no need of desiring. ‘तुम केवल अपने कर्तव्य का पालन करो, योग्य बनो, इच्छा करने की तुम्हें आवश्यकता नहीं है ।’ जैसे उपयुक्त पत्थर, लोहे का टुकड़ा या अन्य वस्तुओं को हम सँभालते हैं वैसे ही कर्तव्य-कर्म करता हुआ ईश्वर का भक्त स्वयं प्रभु के लिए उपयोगी वस्तु बन जाता है, उसे फलाकांक्षा की आवश्यकता नहीं रह जाती, अंतर्यामी ईश्वर स्वयं उसको सँभाल लेता है । समाज और प्रकृति उसकी सेवा में सजग रहती है । ऐसी दशा में निष्काम कर्मवीर को इच्छा करने की क्या आवश्यकता ? वह तो सत्कर्म की रीतियों पर चलकर स्वयं को योग्य बनाता है । फल की इच्छा से उसका क्या सरोकार ?

कैसे हो कर्मों के द्वारा भगवान की पूजा ?

गीता के अनुसार पुजारी वह है जो पूजा तो भगवान की करता है पर मंदिर या मन-मंदिर में नहीं । उसकी पूजा न तो मूर्तिपूजा है और न मानस-पूजा । वह तो अपने कर्मों के द्वारा भगवान की पूजा करता है । वह निष्काम कर्म करता है और वह भी ईश्वरार्पण भाव से । किसीके दिल को ठेस न पहुँचे, किसीका कहीं कुछ बुरा न हो, कोई हानि न हो इसका ध्यान रखते हुए जो कर्म किया जाता है वह यज्ञ है, पूजा है, उपासना है । ऐसा कर्म करनेवाला साधक ही परमात्मा के समग्र रूप का साक्षात्कार कर सकता है । गीता का भक्त झोंपड़ी, नदी-तट या वन के विभेद में न पड़कर कर्मभूमि और लोक-व्यवहार में रह के ही आध्यात्मिक ज्ञान की उपलब्धि कर लेता है । कभी-कभी मौन, अज्ञातवास या एकांतवास का सहारा लेकर फिर समाज में परमात्म-प्रसाद बाँटने में प्रवृत्त हो जाता है... मंद और म्लान (मलिन, तेजोहीन) जगत को ओजस्वी और कांतिमान बनानेवाले आत्मज्ञानी पुरुषों के दैवी कार्यों में सच्चे दिल से संलग्न हो जाता है ।     - पूज्य बापूजी

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