Shraddh Videos


Shraddh Audios



पुण्यों का संचयकाल : चतुर्मास
Ashram India
/ Categories: Teachings, June-2020

पुण्यों का संचयकाल : चतुर्मास

(1 जुलाई से 26 नवम्बर)

(‘पद्म पुराण’ व ‘स्कंद पुराण’ पर आधारित)

आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा द्वारा विश्रांतियोग का आश्रय लेते हुए आत्मा में समाधिस्थ रहते हैं । इस काल को ‘चतुर्मास’ कहते हैं । इस काल में किया हुआ व्रत-नियम, साधन-भजन आदि अक्षय फल प्रदान करता है ।

चतुर्मास के व्रत-नियम

(1) गुड़, ताम्बूल (पान या बीड़ा), साग व शहद के त्याग से मनुष्य को पुण्य की प्राप्ति होती है ।

(2) दूध-दही छोड़नेवाले मनुष्य को गोलोक की प्राप्ति होती है ।

(3) पलाश के पत्तों में किया गया एक-एक बार का भोजन त्रिरात्र व्रत (तीन दिन तक का उपवास कर किया गया व्रत) व चांद्रायण व्रत (चंद्रमा की एक कला हो तब एक कौर इस प्रकार रोज एक-एक बढ़ाते हुए पूनम के दिन 15 कौर भोजन लें और फिर उसी प्रकार घटाते जायें) के समान पुण्यदायक और बड़े-बड़े पातकों का नाश करनेवाला है ।

(4) पृथ्वी पर बैठकर प्राणों को 5 आहुतियाँ देकर मौनपूर्वक भोजन करने से मनुष्य के 5 पातक निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ।

(5) पंचगव्य का पान करनेवाले को चान्द्रायण व्रत का फल मिलता है ।

(6) चौमासे में भूमि पर शयन करनेवाले मनुष्य को निरोगता, धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है । उसे कभी कोढ़ की बीमारी नहीं होती ।

उपवास का लाभ

चतुर्मास में रोज एक समय भोजन करनेवाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है । चतुर्मास में दोनों पक्षों (कृष्ण व शुक्ल पक्ष) की एकादशियों का व्रत व उपवास महापुण्यदायी है ।

त्यागने योग्य

(1) सावन में साग, भादों में दही, आश्विन में दूध तथा कार्तिक में दाल व करेला का त्याग ।

(2) काँसे के बर्तनों का त्याग ।

(3) विवाह आदि सकाम कर्म वर्जित हैं ।

चतुर्मास में परनिंदा का विशेष रूप से त्याग करें । परनिंदा महान पाप, महान भय व महान दुःख है । परनिंदा सुननेवाला भी पापी होता है ।

जो चतुर्मास में भगवत्प्रीति के लिए अपना प्रिय भोग यत्नपूर्वक त्यागता है, उसकी त्यागी हुई वस्तुएँ उसे अक्षयरूप में प्राप्त होती हैं ।

ब्रह्मचर्य का पालन करें

चतुर्मास में ब्रह्मचर्य-पालन करनेवाले को स्वर्गलोक की प्राप्ति तथा असत्य-भाषण, क्रोध एवं पर्व के अवसर पर मैथुन का त्याग करनेवाले को अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

जप एवं स्तोत्रपाठ का फल

जो चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे खड़ा होकर ‘पुरुष सूक्त’ का पाठ करता है, उसकी बुद्धि बढ़ती है (‘पुरुष सूक्त’ के लिए पढ़ें ऋषि प्रसाद, जुलाई 2012) । चतुर्मास में ‘नमो नारायणाय’ का जप करने से सौ गुने फल की प्राप्ति होती है तथा भगवान के नाम का कीर्तन और जप करने से कोटि गुना फल मिलता है ।

स्नान व स्वास्थ्य-सुरक्षा

चतुर्मास में प्रतिदिन आँवला रस मिश्रित जल से स्नान करने से नित्य महापुण्य की प्राप्ति होती है । बाल्टी में 1-2 बिल्वपत्र डाल के ‘ॐ नमः शिवाय’ का 4-5 बार जप करके स्नान करने से वायु-प्रकोप दूर होता है, स्वास्थ्य-रक्षा होती है ।

साधना का सुवर्णकाल

चतुर्मास साधना का सुवर्णकाल माना गया है । जिस प्रकार चींटियाँ वर्षाकाल हेतु इससे पहले के दिनों में ही अपने लिए उपयोगी साधन-संचय कर लेती हैं, उसी प्रकार साधक को भी इस अमृतोपम समय में पुण्यों की अभिवृद्धि कर परमात्म-सुख की ओर आगे बढ़ना चाहिए ।

चतुर्मास में शास्त्रोक्त नियम-व्रत पालन, दान, जप-ध्यान, मंत्रानुष्ठान, गौ-सेवा, हवन, स्वाध्याय, सत्पुरुषों की सेवा, संत-दर्शन व सत्संग-श्रवण आदि धर्म के पालन से महापुण्य की प्राप्ति होती है । जो मनुष्य नियम, व्रत अथवा जप के बिना चौमासा बिताता है, वह मूर्ख है । चतुर्मास का पुण्यलाभ लेने के लिए प्रेरित करते हुए पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘तुम यह संकल्प करो कि यह जो चतुर्मास शुरू हो रहा है, उसमें हम साधना की पूँजी बढ़ायेंगे । यहाँ के रुपये तुम्हारी पूँजी नहीं हैं, तुम्हारे शरीर की पूँजी हैं । लेकिन साधना तुम्हारी पूँजी होगी, मौत के बाप की ताकत नहीं जो उसे छीन सके !

 चतुर्मास में कोई अनुष्ठान का नियम अथवा एक समय भोजन और एकांतवास का नियम ले लो । कुछ समय ‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ या ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तक पढ़ने अथवा सत्संग सुनने का नियम ले लो । इस प्रकार अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ-न-कुछ साधन-भजन का नियम ले लेना । जो घड़ियाँ बीत गयीं वे बीत गयीं, वापस नहीं आयेंगी । जो साधन-भजन कर लिया सो कर लिया । वही असली धन है तुम्हारा ।’’

चतुर्मास सब गुणों से युक्त समय है । अतः इसमें श्रद्धा से शुभ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए । साधकों के लिए आश्रम के पवित्र वातावरण में मौन-मंदिरों की व्यवस्था भी है ।

 

Ref: *RP-ISSUE247-JULY 2013

Previous Article अमृत को परोसने की परम्परा : गुरुपूनम महापर्व
Print
426 Rate this article:
No rating
Please login or register to post comments.

Shraaddh

RSS
12