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धन-धान्य, यश की वृद्धि के साथ अंतरात्मा की चिन्मय तृप्ति दिलाता श्राद्ध-कर्म
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धन-धान्य, यश की वृद्धि के साथ अंतरात्मा की चिन्मय तृप्ति दिलाता श्राद्ध-कर्म

श्राद्ध पक्ष के दिनों में पितरों को अपने-अपने कुल में जाने की छूटछाट का विधान है । अतः श्राद्ध पक्ष में पितर विचरण करते हैं । जिनके यहाँ से अपने पितरों को अघ्र्य, कव्य मिलता है, उनके पितर तृप्त होकर जाते हैं और आशीर्वाद देते हैं । उनके कुल-खानदान में अच्छी संतानें आती हैं । जो श्राद्ध नहीं करते हैं उनके पितर अतृप्त होकर निःश्वास छोड़ के जाते हैं कि ‘धिक्कार है !’ ऐसे लोग फिर अतृप्त रहते हैं ।

आपका एक मास बीतता है तो पितृलोक का एक दिन (दिन+रात) होता है । आप वर्ष में एक बार भी विधिवत् श्राद्ध कर लेते हैं तो आपके पितर तृप्त होते हैं । आप जो खिलाते हैं उन चीजों का केवल भाव ही उन तक पहुँचता है और उस भाव से ही वे तृप्त होते हैं । हमारे पूर्वज मरकर जिस लोक में या जिस योनि में गये हैं, उसके अनुरूप उन्हें तृप्ति देनेवाला भोग मिलेगा ।

पितरों के उद्धार, कल्याण के लिए पानी रखकर ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के ७वें अध्याय का माहात्म्यसहित पाठ करें और जिसका श्राद्ध करते हैं, उसके कल्याण व आत्मशांति के निमित्त वह पानी हाथ में लेकर तुलसी के पौधे में छोड़ दें तो आपका संकल्प जिनके लिए श्राद्ध करते हो उनको बड़ी मदद देगा और उनका आशीर्वाद आपका कल्याण करेगा ।

मुझे बड़ा लाभ हुआ

श्राद्ध पक्ष का मुझे बहुत लाभ मिला । जब हमारे पिता का श्राद्ध होता है तो सिर्फ पिता के लिए मैं नहीं करता हूँ । जो भी कुल-खानदान में मर गये, उनके लिए भी कर लो । यक्षों, गंधर्वों, जो अवनत हो के मर गये, जिनकी अकाल मृत्यु हो गयी है, जिनका किसीने पिडदान नहीं किया हो, जिनका कोई नहीं है, जो ब्रह्मचारी थे, उन सबकी सद्गति के लिए भी हम करते हैं तो उस दिन वह कर्म करते-करते हमारे हृदय में बड़ा आनंद, बड़ा रस, बड़े चिन्मय सुख का एहसास होता है । नाग, यक्ष, किन्नर - जो भी प्राणिमात्र हैं, उन सभीको मैं श्राद्ध के द्वारा तृप्त करता हूँ तो बड़ा अच्छा लगता है । बाहर का लाभ धन-धान्य, यश तो बढ़ता ही है लेकिन पितृश्राद्ध करने से अंतरात्मा की चिन्मय तृप्ति का एहसास भी होता है ।

श्राद्ध का मंत्र

, ह्रीं, श्रीं, क्लीं - ये चारों बीजमंत्र हैं और स्वधा देवी पितरों को तृप्त करने में सक्षम हैं तो उसी देवी के लिए यह मंत्र उच्चारण करना है : ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा ।

जो जाने-अनजाने रह गये हों, जिनकी मृत्यु की तिथि का पता न हो, उनका भी श्राद्ध, तर्पण सर्वपित्री अमावस्या को होता है । आप ज्यादा विधि-विधान न भी कर पायें तो थोड़ी-सी विधि में भी इस मंत्र की सहायता से काम चल जायेगा ।

सर्वपित्री अमावस्या के दिन कर्मकांड करके इस मंत्र का जप करोगे तो करते समय कोई भी त्रुटि रही होगी तो वह पूर्ण हो जायेगी और पितरों को तृप्ति मिलेगी । पितरों की तृप्ति से आपके कुल-खानदान में श्रेष्ठ आत्माओं का अवतरण तथा धन-धान्य व सुख-सम्पदा का स्थायीकरण होता है । श्राद्ध के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करें और ब्राह्मण भी ब्रह्मचर्य का पालन करके श्राद्ध ग्रहण करने आये । ब्राह्मण जरदा, तम्बाकू आदि मलिनता से बचा हुआ हो ।

यदि श्राद्ध करने का सामथ्र्य न हो तो...

समझो श्राद्ध करने की क्षमता, शक्ति, रुपया-पैसा नहीं है तो श्राद्ध के दिन ११.३६ से १२.२४ के बीच के समय (कुतप वेला) में गाय को चारा खिला दें । चारा खरीदने का भी पैसा नहीं है, ऐसी कोई समस्या है तो उस समय दोनों भुजाएँ ऊँची कर लें, आँखें बंद करके सूर्यनारायण का ध्यान करें : ‘हमारे पिता को, दादा को, फलाने को आप तृप्त करें, उन्हें आप सुख दें, आप समर्थ हैं । मेरे पास धन नहीं है, सामग्री नहीं है, विधि का ज्ञान नहीं है, घर में कोई करने-करानेवाला नहीं है, मैं असमर्थ हूँ लेकिन आपके लिए मेरा सद्भाव है, श्रद्धा है । इससे भी आप तृप्त हो सकते हैं ।ङ्क इससे आपको मंगलमय लाभ होगा ।

भगवान राम ने श्राद्ध किया पुष्कर में कंदमूल से और अयोध्या गये तो फिर खीर, पूड़ी आदि व्यंजनों से किया । एकनाथजी महाराज ने भी श्राद्ध किया । ऐसे-ऐसे महापुरुषों ने श्राद्ध-कर्म किया तो आप भी अपने पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध-कर्म करें ।

सर्वपित्री अमावस्या पर सामूहिक श्राद्ध का आयोजन

जिन्हें अपने पूर्वजों की परलोकगमन की तिथियाँ मालूम नहीं हैं, उन्हें सर्वपित्री दर्श अमावस्या के दिन श्राद्ध-कर्म करना चाहिए । संत श्री आशारामजी आश्रम की विभिन्न शाखाओं में इस दिन ‘सामूहिक श्राद्ध’ का आयोजन होता है, जिसमें आप सहभागी हो सकते हैं । इस हेतु अपने नजदीकी आश्रम में पंजीकरण करा लें ।

श्राद्ध हेतु अपने साथ दो बड़ी थाली, दो कटोरी, दो चम्मच, ताँबे का एक लोटा और आसन लेकर आयें । अन्य आवश्यक सामग्री श्राद्ध-स्थल पर उपलब्ध रहेगी । श्राद्ध-कर्म सम्पन्न होने के बाद लाये हुए बर्तन सब वापस ले जाने हैं । अधिक जानकारी हेतु पहले ही अपने नजदीकी आश्रम से सम्पर्क कर लें ।

(श्राद्ध से संबंधित विस्तृत जानकारी हेतु आश्रम की पुस्तक श्राद्ध-महिमा पढ़ें ।)

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