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उत्सवों की लड़ी : दीपावली
Ashram India

उत्सवों की लड़ी : दीपावली

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

(दीपावली पर्व : 5 से 9 नवम्बर)

पर्व क्यों मनाये जाते हैं ?

सारे जीव सच्चिदानंद परमात्मा के अविभाज्य अंग हैं । परमात्मा आनंदस्वरूप है, शाश्वत है, ज्ञानस्वरूप है तो ये सारे पर्व, उत्सव और कर्म हमारे ज्ञान, सुख और आनंद की वृद्धि के लिए तथा हमारी शाश्वतता की खबर देने के लिए ऋषि-मुनियों ने आयोजित किये हैं । सत्, चित् और आनंद से उत्पन्न हुआ यह जीव अपने सत्, चित् और आनंद स्वरूप को पा ले इसलिए पर्वों की व्यवस्था है ।

धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, नूतन वर्ष, भाईदूज - इन पर्वों का झुमका मतलब दीपावली पर्व । इसमें आतिशबाजी भी है, दीपोत्सव भी है, मिष्टान्न खाना-खिलाना भी है, नये वस्त्र, नयी वस्तु लाना-देना भी उचित है ।

धनतेरस

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को धन्वंतरि महाराज का प्राकट्य दिवस है । यह पर्व धन्वंतरिजी द्वारा प्रणीत आरोग्य के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाकर सदैव स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने का संकेत देता है ।

‘पद्म पुराण’ में लिखा है कि ‘धनतेरस को दीपदान करनेवाले की अकाल मृत्यु टल जाती है ।’

नरक चतुर्दशी के दिन क्या करें ?

कार्तिक के महीने में तैलाभ्यंग करना वर्जित है लेकिन नरक चतुर्दशी को तिल के तेल से मालिश करके स्नान करने का बड़ा भारी महत्त्व है । पहले शौच जायें, फिर मालिश करके स्नान करें । इस दिन सूर्योदय के बाद जो स्नान करता है उसके पुण्यों का क्षय माना गया है । हो सके तो जौ, तिल और आँवले का चूर्ण मिला के बनाया उबटन या सप्तधान्य उबटन अथवा तो देशी गाय के गोबर को शरीर पर रगड़ के स्नान करें ।

नरक चतुर्दशी का संदेश

भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर को क्रूर कर्म करने से रोका और उसे यमपुरी पहुँचाया । नरकासुर प्रतीक है वासनाओं के समूह एवं अहंकार का । आप भी अपने चित्त में विद्यमान नरकासुररूपी अहंकार एवं वासनाओं के समूह को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दो ताकि आपका अहं यमपुरी पहुँच जाय और आपकी असंख्य वृत्तियाँ परमेश्वर से एकाकार हो जायें । सोऽहम्... शिवोऽहम्... आनंदोऽहम्, चैतन्योऽहम्, शांतोऽहम्, सर्वरूपोऽहम्... ।

दीपावली

प्राचीन सत्साहित्यों से पता चलता है कि भगवान श्रीराम के पूर्व भी दीपावली का पर्व मनाया जाता था ।

वर्ष में चार महारात्रियाँ होती हैं :

(1) महाशिवरात्रि

(2) होली

(3) जन्माष्टमी

(4) दीपावली

ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव इन चार महारात्रियों में विशेष होता है । अतः दिवाली की रात में महालक्ष्मी और सुख-सम्पदा के साथ ब्रह्मविद्या को पाने के लिए जप-ध्यान, ईश्वर-प्रीति, स्मृति का विशेष महत्त्व है ।

लक्ष्मीप्राप्ति मंत्र

जो धन चाहते हैं उनके लिए लक्ष्मीप्राप्ति का मंत्र जपना लाभकारी होता है । मंत्र -

ॐ नमो भाग्यलक्ष्म्यै च विद्महे ।

अष्टलक्ष्म्यै च धीमहि । तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् 

लक्ष्मी माता की स्थायी प्रसन्नता कैसे पायें ?

एक धन होता है ‘वित्त’ । वित्त-सम्पदा तो बहुत होती है लाखों-करोड़ों-अरबों रुपयों की । वित्त तो सँभाल-सँभाल के कई मर गये । दूसरी होती है ‘लक्ष्मी’ । भगवत्सुमिरन-चिंतन से, धर्म-कर्म का खयाल करते हुए जो कमाई होती है वह लक्ष्मी होती है । यहाँ भी और परलोक में भी वह सुख देगी । तीसरी होती है ‘महालक्ष्मी’ । महालक्ष्मी भोग तो देती है साथ ही मोक्षस्वरूप परमात्मा से भी मिलाने के काम आती है और प्रेरणा देती है । तो हिन्दू संस्कृति ने वित्त की अपेक्षा लक्ष्मी और लक्ष्मी से भी महालक्ष्मी का विशेष आदर किया । क्योंकि भारतीय संस्कृति का उद्देश्य केवल भोग नहीं, केवल बाहर की सुविधा नहीं, अंतरात्मा की शांति, तृप्ति और विश्रांति है । यह स्थिति नहीं प्राप्त हुई तो सोने की लंकावाला रावण व सोने के हिरण्यपुरवाला हिरण्यकशिपु भी संसार से हारकर चले गये । शबरी भीलन, रैदासजी, कबीरजी, तुकारामजी और राजा जनक - ऐसे आत्मतृप्तिवाले जीत जाते हैं । उनकी बुद्धि से अविद्या, अज्ञान मिट जाता है । आत्मसुख और आत्मज्ञान से उनकी जगजीत प्रज्ञा हो जाती है । पूरे जगत को जीत लिया उन्होंने, जिन्हें जगजीत प्रज्ञा प्राप्त हो गयी है ।

यदि आपकी समझ बढ़े, आप हलके स्वभाव पर विजय पाओ तो लक्ष्मी को बुलाना नहीं पड़ेगा, लक्ष्मी तो आपके घर में निवास करेगी । जहाँ नारायण हैं वहाँ पतिव्रता लक्ष्मीजी हैं । जहाँ नारायण की भक्ति है, नारायण का वास है, वहाँ लक्ष्मीजी को क्या अलग से बुलाना पड़ता है ? नहीं, वहाँ तो वे अपने आप आती हैं ।

अतः इस दिन माता लक्ष्मी से यह प्रार्थना करना कि ‘माँ ! जैसे तुम्हें नारायण प्रिय हैं, वैसे हमें भी वे नारायण प्यारे लगें ।’ इस प्रकार से प्रार्थना कर माँ से बाह्य वैभव न चाहकर आत्मवैभव चाहोगे तो मुझे लगता है कि लक्ष्मी माता भी प्रसन्न होंगी और नारायण भी प्रसन्न होंगे और आप भी प्रसन्न होंगे ।

दिवाली का आध्यात्मिकीकरण

दिवाली में चार काम करते हैं - पहला काम घर साफ-सूफ करते हैं, ऐसे अपना साफ इरादा कर दो कि हमको इसी जन्म में परमात्म-सुख, परमात्म-ज्ञान पाना है ।

दूसरा काम नयी चीज लाना । जैसे घरों में चाँदी, कपड़े या बर्तन आदि खरीदे जाते हैं, ऐसे ही अपने चित्त में उस परमात्मा को पाने के लिए कोई दिव्य, पवित्र, आत्मसाक्षात्कार में सीधा साथ दे ऐसा जप, ध्यान, शास्त्र-पठन आदि का नया व्रत-नियम ले लेना चाहिए ।

तीसरा काम है दीये जलाना । बाह्य दीयों के साथ आप ज्ञान का दीया जलाओ । हृदय में है तो आत्मा है और सर्वत्र है तो परमात्मा है । वह परमात्मा दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं, पराया नहीं, सबका अपना-आपा है । ज्ञान के नजरिये से अपने ज्ञानस्वरूप में जगो । व्यर्थ का खर्च न करो, व्यर्थ का बोलो नहीं, व्यर्थ का सोओ नहीं, ज्यादा जागो नहीं, युक्ताहारविहारस्य... ज्ञान का दीप जलाओ ।

चौथी बात है मिठाई खाना और खिलाना । आप प्रसन्न रहिये । सुबह गहरा श्वास लेकर सवा मिनट रोकिये और ‘मैं आनंदस्वरूप ईश्वर का हूँ और ईश्वर मेरे हैं ।’ - यह चिंतन करके दुःख, अशांति और नकारात्मक विचारों को फूँक मार के बाहर फेंक दो । ऐसा दस बार करो तो आप मीठे रहेंगे, अंतरात्मदेव के ध्यान की, वैदिक चिंतन की मिठाई खायेंगे और आपके सम्पर्क में आनेवाले भी मधुर हो जायेंगे, उन्हें भी प्रेमाभक्ति का रस मिलेगा ।

दीपावली संदेश

दीपावली के दिन आप अपने घर तो दीया जलाओ लेकिन आस-पड़ोसवाले गरीब का भी ध्यान रखो, वहाँ भी 4 दीये जलाकर आओ ।

बच्चों को कपड़े बाँटकर आओ, मिठाई दे आओ । छोटे-से-छोटे व्यक्ति को स्नेह से मिलो और अपना बड़प्पन भूलो । जैसे आम के वृक्ष में फल लगते हैं तो झुकता है और बबूल का वृक्ष फलित होता है तो भी काँटों से लदा रहता है, ऐसे ही जिसके जीवन में धर्म है, संस्कार हैं, उसके जीवन में नम्रता, सरलता, सहनशक्ति, उदारता आदि सद्गुण आते हैं और जो अधर्म एवं कुसंस्कारों के आश्रित है, अहं की अकड़ से दूसरों को परेशान करता है व खुद भी होता है उसका जीवन दुर्गुणरूपी काँटों से लद जाता है ।

कैसे करें नूतन वर्ष का स्वागत ?

दीपावली के दूसरे दिन को वर्ष का प्रथम दिन मानते हैं । इस दिन जो मनुष्य हर्ष में रहता है, उसका पूरा वर्ष हर्ष में जाता है और जो शोक में रहता है, उसका पूरा वर्ष शोक में व्यतीत होता है ।

दीपावली और नूतन वर्ष के दिन संत-महापुरुषों व मंगलमय चीजों का दर्शन करना शुभ माना गया है, पुण्य-प्रदायक माना गया है । जैसे - सूर्यदेव, देव-प्रतिमा, गौ, अग्नि, गुरु, हंस, मोर, नीलकंठ, बछड़े सहित गाय, पीपल वृक्ष, दीपक, सुवर्ण, तुलसी, घी, दही, शहद, पानी से भरा घड़ा, कपूर, चाँदी, कुश, गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोधूलि, गौशाला, दूर्वा, चावल और अक्षत आदि का दर्शन ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में शुभ माना गया है । (ब्र.पु. श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय : 76)

नूतन वर्ष के दिन सुबह जगते ही बिस्तर पर बैठे-बैठे चिंतन करना कि ‘आनंदस्वरूप परमात्मा मेरा आत्मा है । प्रभु मेरे सुहृद हैं, सखा हैं, परम हितैषी हैं, ॐ ॐ आनंद ॐ... ॐ ॐ माधुर्य ॐ...Ÿ। वर्ष शुरू हुआ और देखते-देखते आयुष्य का एक साल बीत जायेगा फिर दीपावली आयेगी । आयुष्य क्षीण हो रहा है । आयुष्य क्षीण हो जाय उसके पहले मेरा अज्ञान क्षीण हो जाय । हे ज्ञानदाता प्रभु ! मेरा दुःख नष्ट हो जाय, मेरी चिंताएँ चूर हो जायें । हे चैतन्यस्वरूप प्रभु ! संसार की आसक्ति से दुःख, चिंता और अज्ञान बढ़ता है और तेरी प्रीति से सुख, शांति और माधुर्य का निखार होता है । प्रभु ! तुम कैसे हो तुम्हीं जानो, हम जैसे-तैसे हैं तुम्हारे हैं देव ! ॐ ॐ ॐ...’

फिर बिस्तर पर तनिक शांत बैठे रहकर अपनी दोनों हथेलियों को देखना -

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।

करमूले तु गोविंदः प्रभाते करदर्शनम् ।।

अपने मुँह पर हाथ घुमा लेना । फिर दायाँ नथुना चलता हो तो दायाँ पैर और बायाँ चलता हो तो बायाँ पैर धरती पर पहले रखना ।

इस दिन विचारना कि ‘जिन विचारों और कर्मों को करने से हम मनुष्यता की महानता से नीचे आते हैं उनमें कितना समय बरबाद हुआ ? अब नहीं करेंगे अथवा कम समय देंगे और जिनसे मनुष्य-जीवन का फायदा होता है - सत्संग है, भगवन्नाम सुमिरन है, सुख और दुःख में समता है, साक्षीभाव है... इनमें हम ज्यादा समय देंगे, आत्मज्योति में जियेंगे । रोज सुबह नींद में से उठकर 5 मिनट शिवनेत्र पर ॐकार या ज्योति अथवा भगवान की भावना करेंगे...।’

भाईदूज

यह पर्वपुंज का पाँचवाँ दिन है । इस दिन बहन भाई को इस भावना से तिलक करती है कि मेरा भाई त्रिलोचन रहे । (उसका सद्विवेकरूपी तीसरा नेत्र जागृत हो ।)

इस दिन भाई अपनी बहन के यहाँ भोजन करे और बहन उसके ललाट पर तिलक करे तो वह त्रिलोचन, बुद्धिमान होता है और यमपाश में नहीं बँधता । यह भाईदूज हमारे मन को भी उन्नत रखती है और परस्पर संकल्प देकर सुरक्षित भी करती है ।


A Chain of Festivals: Deepavali

– Pujya Bapuji

(Deepavali Festival: 5th to 9th November)

Why are the Festivals Celebrated?

All living beings are indivisible parts of the Truth, Consciousness and Bliss Absolute, Supreme Self. As the Supreme Self is Bliss personified, eternal and Consciousness personified all these festivals, celebrations and rituals have been instituted by the Rishis and Munis for the enhancement of our wisdom, happiness and bliss as well as for reminding us of our eternity. The festivals are essentially meant to enable the jiva attain its real being Sat-Chit-Ananda from where it has originated. Dhan-Teras, Narak Chaturdashi, Deepavali, New Year and Bhai Dooj – all these festivals combine together into a festive bunch called Deepavali. It has fireworks, festival of lights, eating and feeding sweets to one another, wearing new clothes and the custom of buying and giving new things is also included in it.

Dhan-Teras

The 13th lunar day of the dark fortnight of Kartika month is the birth day of the celestial physician Lord Dhanvantari. This festival inspires us to stay healthy and cheerful always by following the principles prescribed by Lord Dhanvantari.

The Padma Purana states, “The person who gives lamps on the Dhan-Teras is saved from untimely death.”

What to do on Narak Chaturdashi Day?

Oil massage is prohibited in the month of Kartika; however, taking bath after applying sesame oil on the body on Narak Chaturdashi day is held to be extremely important. One should first empty the bowels and then take bath after properly massaging oil on the body. A post-dawn bath on this day is considered to be a destroyer of religious merits. If possible, one should apply the unguent made from barley, sesame seeds and Amla (embelic Myrobalan) or –the Saptadhanya (mixed powders of seven cereals and pulses) unguent or dung of Indian cow on his body before taking bath.

Narak Chaturdashi Message

Lord Krishna killed the demon Narakasur to save the people from his evil doings. Narakasur is a symbol of all desires and ego. You too surrender the Narakasur present in your mind in the form of desires and ego at the feet of Supreme Self, so that it gets annihilated and the countless modifications of your mind get dissolved in the Supreme Self. “I am He…” “I am the auspiciousness…” “I am Bliss…” “I am Consciousness…” “I am Peace…” “I am All…”

Deepavali

On reading the ancient scriptures we come to know that festival of Deepavali was celebrated even before the advent of Lord Rama. There are 4 most important nights in every year. They are 1. Moha Ratri or Janmashtami 2. Kaal Ratri – Deepavali 3. Daruna Ratri – Holi 4. Ahoratri – Mahashivaratri.

It has been found that on these nights the position of various planets have positive effect. Therefore it is considered more important to do japa, meditation, devotional practices, remembrance of divine, etc. not only for attainment of the wealth and happiness but also for attainment of the Knowledge of Brahman.

Mantra to attain wealth

Those who want to acquire wealth and prosperity will be benefitted by chanting the following Mantra.

Aum namo bhaagyalakshmyai cha vidmahe | Ashtalakshmyai cha dhimahi |

 Tanno lakshmih prachodayaat ||

How to get permanent blessing of mother Lakshmi

There are three types of wealth. The lowest of them is Vitta. This type of wealth is in millions, nay billions of rupees. It is the wealth acquired by unfair means by the greedy persons who save it by all means and die without spending it for good cause. The mediocre wealth is called Lakshmi which is earned by righteous persons who remember God, contemplate on Truth and practice Dharma and perform actions ordained by scriptures. It gives happiness in this world and also in the other world. The best type of wealth is called Mahalakshmi. It gives not only sense enjoyments but also helps in meeting God by attaining liberation. Therefore Hindu culture has given more importance to Lakshmi than Vitta. And Mahalakshmi is given more importance than Lakshmi. The objective of the Hindu culture is peace, satisfaction and repose in the inner Self, not only sense enjoyments and physical comforts. If these are not attained one is bound to die frustrated with his life like Ravana, the king of the golden city of Lanka and Hiranyakashipu, the king of the Golden city of Hiranyapur. Those who attained contentment in their Self became victorious in life like the tribal woman Shabari, Saint Kabir, Rahidasji, Tukaramji and King Janaka. The ignorance of his mind is destroyed. He conquers all world, who attains Self-Knowledge and Self-Bliss. He has attained universal consciousness (Jagajeet Prajna). Hence he has conquered the universe.

You will not have to invoke Lakshmi, the goddess of wealth rather she will reside in your home if you increase your spiritual knowledge and conquer your lower nature. Where there is Lord Narayana His consort Lakshmi who is devoted to her husband will follow. Lord Narayana resides where the devotees of Narayana live. Is it necessary to invoke goddess Lakshmi separately? She automatically comes.

Therefore you should pray to Lakshmi, “Oh! Ma, may I also love Narayana as you love Him”. If you pray in this fashion without desire for external opulence then not only Lakshmi, but Narayana will also be pleased with you, and you will also get delighted.

Spiritual Import of Deepavali

Four things are done on the occasion of Deepavali – Just as house is cleaned; similarly have a clear and firm resolve to attain Self-Bliss and Self-Knowledge in this life only.

The second thing is buying new things. As we buy silver, clothes or utensils on Deepavali, likewise we should take a divine and pious vow of mantra-japa, meditation and scripture-reading that directly helps in Self-Realization.

Third thing is lighting lamps. In addition to physical lamps, light the lamp of spiritual Knowledge. The Pure Consciousness is called Atman when it is confined to the heart but it is also Supreme Self because it is all-pervading. That Supreme Self is not far; He is not away; He is not difficult to attain; He is not other’s; He is the real Self of all beings. Wake up in your real nature, the Consciousness with the help of spiritual outlook. Don’t spend money for unnecessary things, don’t be garrulous, don’t sleep more than required; don’t sleep less than required. Yuktaharaviharasya… Be always moderate in eating and recreation. Light the lamp of Knowledge.

The fourth thing is eating sweets and giving them to others. Be cheerful. Early in the morning, take a deep breath; hold it for 75 seconds and contemplate, ‘I belong to God, the Bliss personified God, and God is mine.’ With these thoughts in mind, puff out negative thoughts of sadness and
disquiet with forceful expiration. Do it ten times. You will always remain sweet and joyous. You will enjoy sweets of meditation on the inner Self-God and the Vedic thought. Those coming in contact with you too will become joyful because they will get the joy of devotional Love.

Deepavali Sandesh

You should light lamps on Deepavali and also look after you neighbours. Do light 2-4 lamps in his house also. Distribute clothes and sweets among their children also. Greet even the lowest of low affectionately, and forget your pride. As a mango tree bows when it fruits with mangoes and an acacia tree becomes laden with thorns when it fruits. One who has Dharma (righteousness) and Sanskaras (good tendencies) in his life becomes full of virtues like humility, simplicity, tolerance, generosity etc. and one who resorts to  unrighteousness, and evil tendencies, troubles others by egotism and remains laden with the thorns of vices in his life.

How to begin Nutan Varsh (New Year)

Day after Deepavali is celebrated as first day of the Hindu calendar. The person who remains happy on this day remains happy throughout the next year. The one who remains unhappy, remains unhappy throughout the next year.

“It is considered good and meritorious to have darshan of saints and great men, and to look at auspicious things like Sun god, idols of gods, cow, fire, guru, swan, peacock, jay, cow with calf, Pipal tree, lighted lamp, gold, basil, clarified butter, curd, honey, water filled pot, camphor, silver, Kusha grass, cow’s urine and dung and milk, cow dust, cowshed, Durva grass, unbroken rice etc. on Deepavali day and on New Year Day.”     (Chapter 76, Shrikrishna Janma Khanda, Brahma Vaivarta Purana)

One should contemplate sitting on the bed after getting up in the morning on New Year’s day: “Bliss personified Supreme Self is my own Self. He is my friend, my supreme well-wisher, ‘Aum Aum Ananda Aum… Aum Aum Madhurya Aum’. The New Year begins and one year of my life will elapse when the Deepavali will come. My life span is decreasing. Before my life span expires, let my ignorance expire, O Knowledge-Giver Lord! Let my sorrow perish, let my worries crumble. O Consciousness personified Lord, one who develops attachment to the world increases his sorrows, worries and ignorance whereas one who loves Thee attains more joy, peace, and happiness. O Lord Your real nature is known only to You. Howsoever I am, I am Yours. Aum Aum Aum…’

Then sit calmly on bed, see your palms and recite:

Karaagre vasate lakshmih karamadhye saraswati | Karamoole tu Govindah Prabhaate karadarshanam ||

Then move your hand on your face. Then see which nostril is flowing. If the left is flowing put the left foot first and if the right nostril is flowing put the right foot first on the floor.

Think on this day, “How much time did I waste in thinking and doing actions which bring me down from the greatness of human being?” Now I will not give time to such actions and thoughts but give time to such actions and thoughts that elevate the human life. That is Satsang, chanting of divine name, remaining equal in pains and pleasures, witness attitude, etc. I shall devote more time to them. I shall live in the light of Self. I shall visualize Omkara, light or the form of God on my Ajna Chakra (the eye of Shiva) for five minutes after getting up in morning every day.”

Bhai Dooj

This is the fifth day of the bunch of festivals. On this day the sister applies Tilak on her brother’s forehead, with the wish that her brother becomes (Trilochana). He opens the third eye of discrimination.

On this day if brother takes food at his sister’s house and she applies Tilak on his forehead, he shall become Trilochana, intelligent and he will not be caught in the rope cast by Yama (the god of death). The Bhaidooj elevates us mentally and protects us by mutual good resolves. 

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Diwali Greeting & Suvakyas
दीपावली पर लक्ष्मी प्राप्ति की सचोट साधना विधियाँ

 धनतेरस से आरम्भ करें –

सामग्री – दक्षिणावर्ती शंख, केसर, गंगाजल का पात्र, धूप, अगरबत्ती, दीपक, लाल वस्त्र ।

विधि – साधक अपने सामने गुरुदेव या लक्ष्मी जी की फोटो रखें तथा उनके सामने लाल रंग का वस्त्र (रक्त कन्द) बिछाकर उस पर दक्षिणावर्ती शंख रख दें । उस पर केशर से सतिया बना लें तथा कुमकुम से तिलक कर दें । बाद में स्फटिक की माला से मंत्र की सात मालायें करें । तीन दिन ऐसा करना योग्य है । इतने से ही मंत्र साधना सिद्ध हो जाती है । मंत्र जप पुरा होने के पश्चात लाल वस्त्र में शंख को बाँधकर घर में रख दें । जब तक वह शंख घर मे रहेगा, तब तक घर में निरंतर उन्नति होती रहेगी।

 

मंत्र - ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महालक्ष्मी धनदा  लक्ष्मी कुबेराय मम गृह स्थिरो ह्रीं ॐ नमः

 

 

Mantra for Deepawali Night to gain wealth and remove Poverty

लक्ष्मीप्राप्ति की साधना का एक अत्यंत सरल और केवल तीन दिन का प्रयोगः दीपावली के दिन से तीन दिन 

तक अर्थात् भाईदूज तक स्वच्छ कमरे में अगरबत्ती या धूप (केमिकल वाली नहीं-गोबर से बनी)

 करके दीपक जलाकर, शरीर पर पीले वस्त्र धारण करके, ललाट पर केसर का तिलक कर, स्फटिक मोतियों से बनी माला द्वारा नित्य प्रातः काल निम्न मंत्र की मालायें जपें। 

 

ॐ नमो भाग्यलक्ष्म्यै च विद्महै।

अष्टलक्ष्म्यै च धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्।।

 

अशोक के वृक्ष और नीम के पत्ते में रोगप्रतिकारक शक्ति होती है। प्रवेशद्वार के ऊपर नीम, आम, अशोक आदि के पत्ते को तोरण (बंदनवार) बाँधना मंगलकारी है।


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