इससे ऊँची कोई ऊँचाई हो नहीं सकती है
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इससे ऊँची कोई ऊँचाई हो नहीं सकती है

(पूज्य बापूजी का 57वाँ आत्मसाक्षात्कार दिवस: 18 अक्टूबर)

शादी की वर्षगाँठें तो लाखों लोगों की होती हैं, जन्म के दिन भी प्रतिदिन करोड़ों लोगों के होते हैं, मृत्यु के दिन बरसी (पुण्यतिथि) भी किन्हीं-किन्हीं तपस्वियों, समाज-सुधारकों की मनायी जाती है लेकिन आत्मसाक्षात्कार दिवस तो धरती पर कभी-कभी, कहीं-कहीं पर किन्हीं-किन्हीं विरले ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का होता है । भगवान का दर्शन होना कठिन तो है लेकिन उनका दर्शन होने के बाद भी ईश्वर-तत्त्व का साक्षात्कार करना बाकी रह जाता है ।

चाँगदेव महाराज ने जब विद्याध्ययन पूर्ण किया तो गुरुदेव से पूछा : ‘‘गुरुजी ! मुझे अब क्या जानना-पाना है ?’’

गुरु ने कहा : ‘‘बेटा ! मैंने तेरे को ऐहिक विद्या पढ़ा दी किंतु योगविद्या और आत्मविद्या बाकी है । योगविद्या सीखना है तो काशी के अरण्य में जो योगी रहते हैं, उनके पास जा !’’

चाँगदेव ने काशी के जंगलों में उस योगी से योगविद्या सीखी । फिर उन्होंने सोचा कि ‘अब आत्मविद्या पानी है तो आत्मवेत्ता गुरु चाहिए ।’ आत्मवेत्ता गुरु उस समय काशी में कोई प्रतीत नहीं हुए । उन्होंने ध्यान लगाकर देखा कि ज्ञानेश्वर महाराज धरा पर पधारेंगे, वे ब्रह्मज्ञानी होंगे । उनके चरणों में जाने से ही मुझे आत्मसाक्षात्कार होगा ।

चाँगदेव शरीर को सँभालते हुए जब आयु पूरी होने की घड़ियाँ देखते तो योगविद्या का आश्रय लेकर अपने प्राण सहस्रार में चढ़ा के निर्विकल्प समाधि का अवलम्बन लेते । मृत्यु का समय छूट जाता और उनका आयुष्य फिर से उतना बढ़ जाता । ऐसे 14 बार मौत को उन्होंने पीछे ढकेला और 1400 वर्षों तक आत्मसाक्षात्कारी गुरु का इंतजार करते रहे । आत्मसाक्षात्कार का मतलब है आध्यात्मिक जगत में ऊँचे-से-ऊँचा अनुभव, उससे बड़ा कोई अनुभव हो ही नहीं सकता ।

मेरे जन्मने के पहले जिस परमात्मा ने पिता के घर झूला भिजवा दिया वह कितना खयाल रखता होगा अपने भक्तों का ! पाठशाला में कविता न सुना पाने से भाई को डंडा पड़ता, हृदय में हो गया कि ‘इसको मार न पड़े’ तो हृदयेश्वर ने कैसे मेरे मुँह से कविता शुरू करवा दी ! 10 साल की उम्र में तो ऋद्धि-सिद्धियों के कुछ खेल हो जाते थे । क्या-क्या साधनाएँ कीं, क्या-क्या पापड़ बेले और न जाने क्या-क्या अनुभव किये फिर भी आत्मतृप्ति नहीं हुई, आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ था । जब सब कुछ छोड़छाड़ के सद्गुरु की खोज में गये तो कोई बोलता : ‘हमारे शिष्य बन जाओ, हम तुम्हें आश्रम का महंत बना देंगे’, कोई बोलते : ‘हमारे पंथ में आ जाओ, हम तुम्हारा यह कर देंगे, वह कर देंगे...’ मुझे तो प्यास थी कि मिल जाय कोई पीर-फकीर, पहुँचा दे भव पार ।... इसलिए वहाँ से खिसक जाता ।

यात्रा करते-करते मैं गया केदारनाथ । वहाँ केदारनाथ का लिंग मिला लेकिन केदारेश्वर के दर्शन नहीं हुए । मैं घूमते-घामते गया वृंदावन । वहाँ बाँकेबिहारी की मूर्ति मिली लेकिन कन्हैया के दीदार नहीं हुए । भटकते-भटकते तीर्थों में, मंदिरों में, उपासनाघरों में गया, वहाँ उपास्य-देवों की प्रतिमाएँ मिलीं लेकिन देवों का चमकता देवत्व मेरे से छुपा ही रहा । जब आसोज सुद दो दिवस (आश्विन शुक्ल द्वितीया) संवत् 2021 को मध्याह्न ढाई बजे सद्गुरु की कृपा बरसी तब दिखा कि सब जगह तू-ही-तू है । गुरुदेव ने दिल में ही वह दिलबर दिखा दिया । अब उन घड़ियों का वर्णन शब्दातीत है । और चीज का वर्णन कर सकते हैं लेकिन भगवान जिससे भगवान हैं उस ब्रह्मज्ञान का, उस अकाल पुरुष का वर्णन नहीं हो सकता है ।

गुरुवाणी में आता है :

मत करो वर्णन हर बेअंत है ।

जिन पाया तिन छुपाया,

छुपत नहीं कछु छुपे छुपाया ।

यह राज समझ में तो आ जाता है लेकिन समझाया नहीं जाता है, केवल उसके इशारे किये जाते हैं । इशारे इसलिए किये जाते हैं कि तुम भी शायद उन इशारों के सहारे चल पड़ो ।

संत ज्ञानेश्वर महाराज अवतरित हुए । चाँगदेव को पता चला तो ज्ञानेश्वरजी के दर्शन करने चले । उन्होंने यौगिक शक्ति से शेर को पाले हुए घोड़े जैसा बना दिया और उस पर बैठ गये । विषधर साँप को चाबुक की जगह पर प्रयोग में लिया । हजार चेलों के साथ यात्रा करते-करते आलंदी पहुँचे तो ज्ञानेश्वर महाराज को खबर भेजी । लालच यह था कि ‘ज्ञानेश्वर महाराज देखें कि चाँगदेव कैसे आ रहे हैं तो स्वागत के लिए खड़े हो जायें ।’

करना आत्मसाक्षात्कार है लेकिन ‘मैं भी कुछ हूँ’ यह जीव का दिखावा अभी मौजूद है । जब तक जीव माया के गुण-दोष अपने में आरोपित करता है तब तक उसे आत्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता है । शेर व साँप को वश किया जा सकता है, 1400 वर्ष आयुष्य लम्बा किया जा सकता है परंतु ब्रह्मज्ञानी गुरु की कृपा के बिना आत्मसाक्षात्कार नहीं होता, यह इतनी ऊँची चीज है । इसमें केवल श्रद्धा या सूक्ष्म बुद्धि अथवा तपस्या से ही काम नहीं चलता; ऋद्धि, अष्टसिद्धि-नवनिधि से भी काम नहीं चलता है, यह इतनी ऊँची बात है ! फिर भी इतनी सहज बात है कि घोड़े की रकाब में पैर डालते-डालते आत्मसाक्षात्कार हो सकता है । खट्वांग राजा को दो घड़ी में आत्मसाक्षात्कार हो गया था, राजा परीक्षित को 7 दिन में हो गया था... ऐसा भी है ।

ज्ञानेश्वरजी समझ गये कि चाँगदेव स्वागत चाहते हैं । ज्ञानेश्वर महाराज आत्मसाक्षात्कारी थे और ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ लेकर ही जन्मे थे । जिस चबूतरे पर बैठे थे उसको योगशक्ति से चला दिया । चबूतरा चल पड़ा तो चाँगदेव का नशा उतरा कि ‘मैंने तो जिंदे प्राणियों को वश किया लेकिन इनके संकल्प ने तो जड़ चबूतरे को भी वश कर रखा है, वास्तव में ये हमसे ऊँचे हैं ।’ तब थोड़े झुके, बोले : ‘‘मैं आपके पास आया हूँ, मुझे आत्मसाक्षात्कार की भिक्षा दें ।’’

ज्ञानेश्वरजी : ‘‘आत्मसाक्षात्कार करना है तो एक शीश दक्षिणा में देना पड़ेगा ।’’

‘‘मेरे साथ हजार चेले हैं और सब एक से बढ़कर एक चुनिंदे हैं जो कुर्बान जायें मेरे पर ।’’

‘‘हजार नहीं, एक ही सिर चाहिए । अभी भोजन व आराम करके फिर आना ।’’

चाँगदेव ने भोजन किया, चेलों को बुलाया और बताया कि ‘‘एक सिर चाहिए और मुझे एक बार आत्मसाक्षात्कार होगा तो फिर मैं तुम सबको करा दूँगा । एक सिर कौन-सा चेला देता है ?’’

किसी चेले ने कहा, ‘गुरुजी ! मैं तो दे सकता था लेकिन मेरे बच्चे छोटे हैं’ तो किसीने और कुछ कहा... एक ने इधर तो दूसरे ने उधर टाला और कुछ तो पहले ही पलायन कर गये थे । चाँगदेव को पता चला कि ‘अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं जाया जाता । आप मुए बिना स्वर्ग कैसे जाइये !’

ज्ञानेश्वरजी से चाँगदेव बोले : ‘‘महाराज ! बहुत सारे चेले चले गये और बाकी के जो बचे हैं वे एक-दूसरे पर डालते हैं । अब यदि मैं अपना ही सिर अर्पण करता हूँ तो फिर आत्मसाक्षात्कार कौन करेगा ? और मुझे आत्मसाक्षात्कार करना है इसलिए मैंने 1400 वर्षों से आयुष्य को खींच रखा है । जो आपकी आज्ञा हो, यह सिर अर्पण है ।’’

ज्ञानेश्वरजी : ‘‘तुम्हारा बाहर का सिर नहीं चाहिए, ‘मैं बड़ा योगी हूँ, 1400 साल का हूँ’ यह जो अहं है वही तुम्हारा सिर है, उसे अर्पण करोगे तब हो जायेगा परमात्म-तत्त्व का साक्षात्कार ।’’

चाँगदेव विनम्र हुए और ज्ञानेश्वरजी ने उन्हें तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया । फिर ज्ञानेश्वरजी की आज्ञा से मुक्ताबाई ने उन्हें महावाक्य का उपदेश देकर कृतार्थ किया और ज्ञानेश्वरजी के द्वारा चाँगदेवजी को पूर्व में दिये गये ‘चांगदेव पासष्टी’ (चाँगदेव पैंसठी) नामक उपदेश का अर्थ समझाकर उन्हें परमानंदस्वरूप परम पद पर आरूढ़ किया ।

कृष्ण जिससे कृष्ण हैं, शिव जिससे शिव हैं, राम जिससे राम हैं ऐसे ब्रह्मस्वरूप अपने आत्मा-परमात्मा की एकता का साक्षात्कार जिनको होता है उनको यह महसूस होता है कि ‘आकाश को भी ढाँपे हुए जो चैतन्य है वही मैं हूँ ।’ अणु-से-अणु (छोटे-से-छोटा) और महान-से-महान वह परब्रह्म-परमात्मा है । उसीको अपने हृदय में अनुभव करके देह में होते हुए भी देह से पार, इस आकाश में होते हुए भी इस आकाश से पार, अनंत ब्रह्मांडों से पार जो सत्ता व्याप रही है उससे अपने-आपको ज्यों-का-त्यों एकरूप, अद्वैत अनुभव करना यह आध्यात्मिक जगत में ऊँचे-में-ऊँची ऊँचाई है । इससे अधिक कोई ऊँचाई नहीं हो सकती है ।

जहाँ से ‘मैं’ उठता है उसका शुद्धरूप में अनुभव करने के लिए बुद्धि को सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम करना पड़ता है । बुद्धि की सूक्ष्मतम अवस्था, श्रद्धा की दृढ़ता, सद्गुरु का सामर्थ्य - जब तीनों चीजें एक साथ मिलती हैं तो वह आत्मसाक्षात्कार की वेला होती है ।

Ref: ISSUE321-September 2020

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