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Unforgettable Incidents of Guru’s Grace and Proximity

Unforgettable Incidents of Guru’s Grace and Proximity

गुरु-कृपा व सान्निध्य के अविस्मरणीय प्रसंग

अहमदाबाद निवासी इंदिरा गुलवाणी (इंदु बहन) पूज्यश्री के और भी कुछ जीवन-प्रसंग बताती हैं :

 

गरीबों के दाता, उद्धारक और मसीहा

एक महिला बहुत गरीब थी । एक दिन वह मुझसे बोली : ‘‘मेरी लड़की की शादी है और मेरे पास कुछ भी नहीं है, अब शादी कैसे होगी ?’’

मैंने कहा : ‘‘चलो, मैं तुम्हें अपने गुरुदेव के पास ले  चलती हूँ । उनका  आशीर्वाद मिल जायेगा तो सब ठीक हो जायेगा ।’’

मैं उसे बापूजी के पास ले गयी व हाल बताया । कोमलहृदय गुरुदेव को दया आयी और उसे प्रसादरूप में साड़ी, नारियल, काजू-बादाम व रुपये और आशीर्वाद मिला । वह खुशी-खुशी घर लौटी । उसकी सारी उदासी, दुःख दूर हो गये । बाहर से तो दिखा कि केवल साड़ी और प्रसाद दिया पर सूक्ष्मरूप से कितना दिया यह किसीको उसी तरह नहीं दिखा जैसे श्रीकृष्ण के द्वार से जाते समय सुदामा खाली हाथ दिखे पर बाद में पता चला कि उन्हें कितना दिया ।

जहाँ से पैसे आने की कोई उम्मीद नहीं थी वहाँ से भी गुरुकृपा से पैसे आने लगे और उसको बहुत सारे पैसे मिले । उसकी लड़की की अच्छी तरह से शादी हुई और वह बापूजी के आशीर्वाद से अपने वैवाहिक जीवन में खुश है ।

‘‘तू जीत गयी, मैं हार गया...’’

मेरे पिताजी सिंधी समाज के प्रतिष्ठित और पैसेवाले व्यक्तियों में से एक थे । उन्हें पूरे मार्केट के लोग जानते थे । अपनी बेटी कहीं नौकरी करे यह बात उन्हें पसंद नहीं थी । बी.एड. करने के बाद मैं इंटरव्यू देने जाती थी । मैं जहाँ इंटरव्यू देने जाऊँ, मेरे पिताजी वहाँ के प्रबंधकों को बोल के रखते थे कि ‘‘मैं पूरे मार्केट का मुखिया हूँ, इसको आपने नौकरी दी तो आपकी खैर नहीं ।’’

वैसे पूज्य गुरुदेव भी नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी करूँ और मेरी भी शिक्षिका बनने की चाह नहीं थी । लेकिन उस समय महिला आश्रम नहीं था । प्रश्न यह हुआ कि ‘करूँ तो क्या करूँ ?’ तो सबसे उत्तम मुझे शिक्षिका बनना लगा । तब गुरुदेव के श्रीमुख से वचन निकल पड़े : ‘‘ठीक है, तू शिक्षिका ही बननेवाली है ।’’

अब एक ओर बापूजी के ये उद्गार और दूसरी ओर पिताजी के पुरजोर प्रयास... लोग सोच रहे थे कि ‘पता नहीं अब क्या होगा ? देखते हैं अब इस अबूझ पहेली का अंत क्या होता है ।’

एक बार अचानक एक साधिका सहेली मेरे पास आकर बोली : ‘‘कल एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में इंटरव्यू होंगे । तुम भी जा के देखना ।’’

मैं वहाँ गयी तो देखा कि वहाँ के प्रबंधक आपस में अंग्रेजी में ही बात कर रहे थे । मेरे पिताजी वहाँ भी पहुँच तो गये परंतु पिताजी और प्रबंधक एक-दूसरे की भाषा समझ नहीं पा रहे थे । दूसरा, वे प्रबंधक किसी सुयोग्य शिक्षक की इतनी ताक में थे कि कोई दबाव वहाँ काम नहीं करनेवाला था । इसलिए मेरे पिताजी वहाँ पर कुछ नहीं कर पाये । मेरा इंटरव्यू हुआ और नियुक्ति हो गयी । मैं पढ़ाने जाने लगी । आखिर बापूजी की भविष्यवाणी सत्य साबित हुई । और इसके बाद गुरुकृपा से मेरे जीवन में एक के बाद एक चमत्कार होने लगे । जो पिताजी मुझे ईश्वरप्राप्ति के मार्ग पर चलने से रोकते थे, सत्संग और समाजसेवा के दैवी कार्य में जाने से रोकते थे, उन्हीं पिताजी का मन बदल गया । ईश्वरप्राप्ति के मार्ग में सहायक साधनों के प्रति अपने विरोध की निरर्थकता और इन साधनों की सार्थकता उन्हें समझ में आने लगी । मैंने घर लिया तो मेरे ऊपर कर्जा हो गया । वह मेरे पिताजी ने पैसे देकर उतार दिया ।

मैंने यह गुरुदेव को बताया तो वे बोले : ‘‘अच्छा, तेरे पिताजी ने पैसे दिये ! अब देखना, तेरे घर में बरकत-ही-बरकत रहेगी । अब इन्होंने जो बोये हैं उनके फल बहुत ही बड़े होंगे ।’’

कुछ ही दिन बाद हुआ भी ऐसा ही ! घर में धन-वैभव, धंधे-रोजगार में बरकत आने लगी । भाइयों के पास बँगले हो गये, कारें हो गयीं ।

एक बार जिस ट्रेन में हम जा रहे थे, उसीमें पूज्य बापूजी भी विराजमान थे । जब मेरे घरवालों को यह पता चला तो सभी कृतज्ञता के भाव से भर गये और पूज्यश्री को प्रणाम करने लगे । बापूजी ने उनको आशीर्वाद व प्रसाद दिया ।

मेरी कक्षा में पढ़नेवाले बच्चों के मार्क्स अच्छे आते थे । इससे वे वस्तुएँ भेंट में देने लगे । हम क्षत्रिय होने से मुझे भेंट लेना अच्छा नहीं लगता था । मैंने यह बात पिताजी को बतायी । परंतु गुरुकृपा से उनका मन इस हद तक परिवर्तित हो गया था कि जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी । पिताजी बोले : ‘‘बेटी ! अगर मान्यता की ही बात है तो तुम अपने को क्षत्रिय मानकर वस्तुएँ भले मत लेना लेकिन बच्चों को ज्ञानदान जरूर देना, जो अच्छे संस्कार तुमने भगवान के रास्ते चलकर पाये हैं वे उन्हें जरूर देते रहना ।’’

शरीर छोड़ने के 4 दिन पूर्व पिताजी मुझसे बोले : ‘‘अच्छा हुआ बेटी, तू इस संसार के जंजाल में नहीं पड़ी । तू तो जीत गयी, मैं हार गया । तू तो मेरी बेटी नहीं, बेटा है, बहादुर शहंशाह है !’’

ये वचन भी सत्य हुए

एक बार बापूजी मुझसे बोले थे : ‘‘तुम्हारे जीवन-प्रसंग पढ़कर लोगों को प्रेरणा मिलेगी ।’’

पूज्य बापूजी के ये वचन भी सत्य हुए । आज ‘ऋषि प्रसाद’ के द्वारा लाखों-करोड़ों लोगों तक ये प्रसंग पहुँच रहे हैं और प्रेरणा दे रहे हैं ।

बच्चों में अच्छे संस्कारों का सिंचन

पूज्य बापूजी के श्रीमुख से बहनेवाली अमृतवाणी की धारा का कोई थोड़ा-सा भी पान करता है तो उसका हृदय गद्गद, रसीला हुए बिना नहीं रहता । और वही रस हमारे दिनभर के व्यवहार में भी स्वाभाविक ही झलकने लगता है ।

मैं जब बी.एड. की विद्यार्थिनी थी उस समय मुझे बड़े-बड़े स्कूलों में जाकर बच्चों को किसी एक विषय को लेकर पाठ देना होता था । उसमें कई कॉलेजों के जाने-माने प्रोफेसर भी उपस्थित रहते थे । मैं बच्चों को पहले उच्च आदर्शों के चरित्र, वाणियाँ आदि गाकर सुनाती थी और फिर उसका अर्थघटन करके बोर्ड पर लिखकर समझाती थी । पाठ सिखाते समय मैं ऐसी तन्मय हो जाती थी कि पाठ में जो आदर्श दिये होते थे - संत कबीरजी, मीराबाई, रहीमजी आदि, उनकी कथाएँ, चरित्र, वाणियाँ ही रह जाती थीं, मैं खो जाती थी और वे ही रह जाते थे ।

ऐसी जो स्थिति बनती थी, इससे मुझे भी सिखाने में बड़ा रस आता था और विद्यार्थी भी रसमय हो जाते थे । मेरा पाठ दूसरों को कैसा लगता है, इसका मुझे और भी प्रगाढ़ता से तब अनुभव हुआ जब मेरा सिखाना जाँचने के लिए निरीक्षक के रूप में आयी हुईं हमारे कॉलेज की प्रोफेसर ने मेरा पाठ सुना । पाठ सुनते ही वे इतनी आनंदित हो गयीं कि जैसे ही मेरा पाठ पूरा हुआ, सीधे आगे आकर सबके सामने ही मेरे गले लगीं और बोलीं : ‘‘एक्सीलेंट !’’ और फिर अन्य विद्यार्थियों की ओर देखते हुए कहा कि ‘‘ऐसा होता है लेसन !’’

फिर मुझसे कहा : ‘‘तुम हमारे बी.एड. के अन्य विद्यार्थियों को भी ऐसे सिखाया करो ।’’ उस प्रसंग को देखकर सभी विद्यार्थी भावमय और गद्गद हो गये थे ।

लेकिन सच कहूँ तो विद्यार्थियों को पढ़ाते समय मेरे हृदय में रस, आत्मसंतोष, आत्मतृप्ति मिलना, विद्यार्थियों का रसमय हो जाना, महिला प्रोफेसर का संतुष्ट होकर गले लगना और गद्गद हो जाना - इसमें मेरी रंचमात्र भी विशेषता नहीं है । यह तो उन्हींकी विशेषता है जो साकार हो के हम भक्तों के सामने आ जाते हैं । मुझे ऐसा लगता है कि सबके हृदयेश्वर उन सर्वव्यापी ईश्वर से, गुरुसत्ता से ही तो तन्मयता या तदाकारता की कला आ सकती है ! बाकी इस जड़, दुःखमय संसार से परमात्मरस की उत्पत्ति कहाँ से हो ? कोई लाये तो कहाँ से लाये ? किसीको मिले तो कहाँ से मिले ? और कहीं छलके तो कहाँ से छलके ? अन्यत्र कहीं एक बूँद भी परमात्मरस हो तब न ! तो है उसी चैतन्य के महासागर मेरे गुरुदेव की छलकती कृपा, जिसकी एक बूँद भी तन्मय कर देती है, रसमय कर देती है, मधुमय बना देती है ।

यह तो है सच्ची बात ! अब सांसारिक दृष्टि से देखें तो कोई यह भी कह सकता है कि इनकी सत्संग के बिंदुओं को चुन-चुन के लिखने की आदत से इन्हें सत्संग की मधुमय बातें याद रखने की आदत पड़ गयी और पढ़ाते समय वे ही बातें बच्चों को बताने की इन्हें आदत हो गयी इसलिए शायद रस आता होगा । सत्संग के बिंदु चुनना अवश्य उपयोगी रहा होगा लेकिन वे चुनवानेवाले भी तो वे ही हैं, इसलिए पूरी सच्चाई तो वही है जो ऊपर कही ।

इसलिए मैं तो कुछ हूँ ही नहीं, जो कुछ है सब गुरुदेव का ही चमत्कार है । आज हम बापूजी के असंख्य साधक, जो शिक्षक, प्राचार्य आदि पदों पर हैं, उनके द्वारा राष्ट्र  की भावी पीढ़ी के जीवन-निर्माण की जो अनमोल सेवा हो रही है, हुई है और होगी उसका श्रेय भी हम सबके प्रेरणादाता पूज्य  बापूजी को ही जाता है । उनके ऋण से राष्ट्र उऋण कैसे हो सकता है ? यह ऋण भले न चुकाये लेकिन उन्हें ऐसा प्रतिफल तो न दे जो आज उन्हें दिया जा रहा है ! कब जागोगे मेरे प्यारे भारतवासियो ! ईश्वर सबको सद्बुद्धि दें, सबका मंगल करें ।


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Unforgettable Incidents of Guru’s Grace and Proximity


Indira Gulwani (Indu Bahan) of Ahmedabad tells more life incidents of Pujya Bapuji:

A Generous Donor, Life Saviour and a Messiah to the Poor

Once, there was quite a poor woman and she asked me, “My daughter is about to get married and I don’t own anything. How shall I manage the expenses of her marriage?”

I said, “Let me take you to my Gurudev. Once you receive His blessings, everything will be alright.”

So, I took her to Bapuji. When the entire matter was narrated to Pujyashri, the soft hearted Bapuji felt compassion towards her. As a prasada (grace or a gift given by Guru to the devotee as a sign of blessing); Pujyashri gave her a sari, a coconut, dry-fruits (cashews & almonds) and some money, along with blessings. She returned home happily. All her sorrow and sadness disappeared. Externally, it seemed as if she was given a sari and some prasada, but nobody could realise how much she was bestowed with in subtle form; the way Sudama (Shri Krishna’s childhood friend) seemed to be returning empty-handed from the doorway of Shri Krishna, but later, it became clear how much he had been bestowed with.

By virtue of Guru’s grace, she started getting money from places and people that she wasn’t even expecting to get anything from; thus, she received quite a lot of money. Her daughter’s marriage was solemnized quite gracefully and due to Bapuji’s blessings, her marital life is happy now.

“You have won, while I have lost…”

My father was one of the reputable and well-to-do persons of the Sindhi-community; he was well known throughout the entire market-area. He didn’t like to see his daughter doing a job or giving service to anyone. After finishing my B.Ed., I took various interviews for the post as a teacher. Whichever institute I would visit for the interview, my father would inform the management well in advance, saying “I am the chief of this entire market-area. If you offer her a job, then be ready to bear the consequences.”

Actually, even Pujya Gurudev didn’t want me to do a job or give service to anyone. And even I did not want to become a teacher. But at that time there was no such place as the Mahila ashram for women to do sadhana. So, the question was ‘what should I do?’ So I chose to become the best teacher.

Looking at my inclination, Gurudev instantly predicted – “OK. You are destined to become a teacher.”

On the one hand, there were these prophetic words of Bapuji, and on the other hand, there were maximum efforts made by my father to prevent me getting a job. Given such a situation, all were curious and wondered – “God knows what’s going to happen now. Let’s see what the outcome of this unsolved conundrum is going to be!”

One fine day, all of a sudden a sadhika friend of mine came to me and said, “Interviews are being conducted in an English-medium school tomorrow. You have done your B.Ed.; so, you should go there and try.”

When I arrived at the interview, I realised that the management there was communicating only in English. When my father showed up, it so happened that my father and the management couldn’t communicate with each other, none amongst them could understand any of that conversation. Secondly, the school’s management was so desperate to find an eligible, most suitable teacher that they would not yield to any pressure. Hence, my father couldn’t do anything. So, I was interviewed and got appointed. I started working there as a teacher. At last, Bapuji’s prediction came true. After that, by virtue of Guru’s grace, I started experiencing some or another miracle in my life, one after the other. The very same father, who used to stop me from treading the path of God-realization, attending the satsangas (spiritual discourses) or participating in the divine work of selfless social-service; had a change of heart. He started to realize how ineffectual and futile his opposition was against the means helpful in treading the path towards the realization of God; thereby realizing the importance of the latter. I was in debt as I bought a house. But my father helped me with money, and thus cleared- off my debts.

When I apprised Pujya Bapuji of this, Pujyashri said, “Oh, so your father cleared your debts! Now watch, you will see your family prospering and flourishing. As he has sown, so shall he reap; in fact, much more than that.”

And the same happened after a few days!  In the house, the wealth & prosperity started to increase and business started booming. My brothers became owners of bungalows and cars. Once, while we were travelling somewhere by train, coincidently, Pujya Bapuji was travelling by the same train. When my family members got to know of this, they were filled with gratefulness towards Him, and one-by-one, all of them started to greet and offer salutations to Pujyashri. Bapuji blessed them all and gave some prasada too.

Whilst at work, the students of whichever class I undertook and taught at, would always score and perform well. They were quite pleased at this, and as a result, started gifting me some or another thing. Back then, under my false-pride and belief of being a Kshatriya (a member of the warrior class), I hated accepting gifts. I shared this with my father; but by virtue of Guru’s grace, his thinking and mindset had transformed beyond my imagination. He said, “My dear daughter! If it is all about your strongly held belief, then as a Kshatriya, you may not accept any gift; but make sure to necessarily share the knowledge and the good-values (that you have gained while treading the spiritual path) with the children, thereby instilling good values in the latter.”

Just 4 days prior to his death, he said to me: “My dear daughter, it’s a good thing that you didn’t get ensnared into this worldly-life. You are the actual winner, while I am the loser. You are not my daughter; you are rather my son – the brave one, the Emperor!”

Even these words came true

Once Pujya Bapuji had said to me, “People will get inspired by reading your life-events.”

And even these words of Trikala-Darshi (One who can see the past, present and future) Pujya Bapuji came true. Today, these life-events are reaching tens of millions of people via ‘Rishi Prasad’, thereby inspiring them.

Instilling Good-values in Children

If one gets to drink even a drop of the stream of the ambrosial words originating from Pujya Bapuji’s holy mouth, his heart is undoubtedly left ecstatic and joyful. And that very joy is reflected naturally in our day-to-day dealings.

When I was a student of B. Ed., I was supposed to go to top, elite schools and teach a lesson to the children on any particular topic. Even eminent professors from many different colleges would attend the sessions. I would first narrate the biographies (and anecdotes) of the people of high ideals to children, sing them the poetic compositions, etc., and then, using the teaching-board, explain the relevant meanings with appropriate interpretation. Whilst teaching, I would get so deeply engrossed that my personality would completely dissolve and all that remained was – the tales, biographies and poems of the role models described in the lesson, be it Sant Kabirji, Mira Bai, Rahimji, and others.

When such an occasional scenario developed, I truly enjoyed teaching the lessons and the students would also become delighted. I could further evaluate my way of teaching and got a confirmation on the aforesaid when I got live feedback from a college-professor who was visiting as a supervisor to inspect my teaching style. She was so delighted to attend the session that as soon as I finished my lecture (lesson), she straightaway came to the front and hugged me in front of all students present; and said, “Excellent!” Then looking at the other students she said, “This is the ideal way of teaching a lesson.”

Then she said to me, “You should teach this to other students of B. Ed. as well.” Witnessing all this, all the students attending that class were overwhelmed with emotion and ecstasy.

But to be honest, my heart filling with joy while teaching, me getting self-satisfaction, feeling contented, students getting imbued with joy, the lady professor getting pleased and giving me a hug – all this is not due to even an iota of my speciality; instead, it should all be accredited to the One (formless), who assumes a human-form to appear before us, the devotees. I feel that it is only with the grace of all-pervading God, the Lord of every heart, the Existence of Guru, one could learn the art of getting deeply engrossed or absorbed! Otherwise, how could joy or bliss be produced from the inert and sorrowful Samsara? How can one create it or bring it; and from where? How can one find it and from where? And if it has to overflow; from where it could do so? It is possible only if there is at least a drop of it available anywhere else in the world, isn’t it! So, it is undoubtedly nothing but the overflowing grace of my Gurudev – the Ocean of Consciousness, even a drop of which is enough to engross one and imbue one with joy and sweetness.

Now this is absolute fact! But if looked from a worldly perspective, one may argue that while teaching, Indu must have got so used to telling only those nectarine points to children that she must be remembering them, due to her habit of penning down the important points and aphorisms from satsanga discourses; and probably that is why she was getting imbued with joy and delight while teaching. Fine, selecting the salient points from satsanga discourses must have certainly played an important role, yet, it’s none but He who made me select those points; and hence the absolute fact is, it is nothing but what is mentioned before.

Hence, in the real sense, I am absolutely nothing; and whatever gets executed, is all due to the Divine Miracle of Gurudev. Today, there are innumerable sadhakas of Bapuji who are working as teachers, principals, etc.; and the valuable selfless-service of life & character building of the upcoming generation, that is being executed by them, is to be accredited to none but Pujya Bapuji – the Source of Inspiration to us all. How can the nation repay the debt of obligation it owes to Him? It doesn’t matter whether the nation repays the debt to Him, but at least He shouldn’t be given the rough treatment that He is receiving today! O my dear countrymen, when will you wake up? May God bless everyone with good sense; May He do good to all.

 

[Rishi Prasad - December 2018 - Issue311]

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