गुरुदेव के एक वचन से बदली जिंदगी की राह

गुरुदेव के एक वचन से बदली जिंदगी की राह

उदयपुर आश्रम (राजस्थान) में रहकर सेवारत विजयभाई को सन् 2006 से पूज्य बापूजी का सत्संग-सान्निध्य प्राप्त होता रहा है । प्रस्तुत हैं उनके द्वारा बताये गये पूज्यश्री के पावन संस्मरण :

मैंने 2006 में पूज्य बापूजी की पावन अमृतवाणी से ओतप्रोत ‘जीवन रसायन’ साहित्य पढ़ा, जिसका पहला ही वचन मेरे हृदय को छू गया । मैं पूज्य बापूजी का सत्संग सुनने लगा, जिससे मन में ईश्वरप्राप्ति के मार्ग पर चलने की दृढ़ता बढ़ती गयी । मैंने इस मार्ग पर चलने का मन में ठान लिया और गुरुदेव की कृपा से दीक्षा के 8 महीने बाद आश्रम में समर्पित हो गया ।

कैसी है गुरुदेव की करुणा-कृपा व सहजता !

परब्रह्म-परमात्मा के साथ एकत्व को प्राप्त महापुरुष परमार्थ में तो पूर्ण कुशल होते ही हैं, साथ ही व्यवहार में भी पूर्ण निपुण होते हैं । परमात्म-तत्त्व में प्रतिष्ठित, ब्रह्मानंद में मस्त महापुरुष इस धरती पर मनुष्यों के कल्याणार्थ अनेकानेक लीलाएँ करके उनके जीवन में से दुःख-दर्द, हताशा-निराशा, अज्ञान-अंधकार दूर कर उत्साह, उमंग, ज्ञान-प्रकाश, प्रभुरस का दान करके उन्हें ईश्वर की ओर ले चलते हैं ।

सन् 2011 की बात है । मेरे पाँव में गम्भीर चोट लगी थी । उसी दौरान बापूजी दीपावली पर गरीबों हेतु भंडारे के निमित्त उदयपुर आश्रम में पधारे थे । बापूजी की कुटिया के चारों तरफ तुलसी के पौधे लगाने की और खेती की सेवा चल रही थी । 70-80 लोग सेवा में लगे हुए थे । दोपहर का समय था । पूज्यश्री कुटिया से बाहर आये और क्या, कैसे करना है, सबको बताने लगे । मेरी भी इच्छा हुई कि मैं गुरुदेव के पास जाऊँ । पैर के दर्द की तरफ ध्यान न देते हुए मैं सेवा में निकल पड़ा और सभी गुरुभाइयों के साथ गैंती लेकर सेवा में लग गया ।

बापूजी ने अचानक मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा : ‘‘ऐ गैंतीवाला ! इधर आ । तेरे को गैंती अच्छे-से चलानी आती है ?’’

‘‘जी बापूजी ।’’

‘‘चल, चारों तरफ के सारे मेंहदी के पौधे उखाड़ने हैं और उनकी जगह तुलसी लगानी है । मेंहदी के पौधों को दूसरी जगह लगाना है ।’’

मैं गैंती ले के मेंहदी के पौधों को उखाड़ने लगा लेकिन ठीक से नहीं कर रहा था तो दयालु गुरुदेव खुद ही मुझे सिखाने लगे । बापूजी बोले : ‘‘ऐसे नहीं, चारों तरफ से गहरा खोद फिर यह उखड़ेगा ।’’

मिट्टी की खुदाई के बाद मेरे अकेले से पौधा खींचा नहीं जा रहा था तो पूज्यश्री ने धोती ऊपर बाँध ली और स्वयं ही पौधे को एक तरफ से पकड़ा और मुझे दूसरी तरफ से पकड़ने को कहा । पहला पौधा बापूजी ने उखाड़ के दिखाया और बोले : ‘‘देखा ! अब चल, दूसरा पौधा उखाड़ते हैं ।’’ सारे लोग गुरुदेव की लीला देखते ही रह गये ! साक्षात् ब्रह्मज्ञानी गुरुदेव करुणावश हो के इस प्रकार सेवा कर रहे हैं, यह देख के मेरे मन में संकोच होने लगा । मैंने कहा : ‘‘बापूजी ! मैं कर लूँगा, आप रहने दीजिये ।’’

‘‘अरे क्या कर लेगा? पकड़, तेरा बाप साथ में कर रहा है ।’’ फिर से गुरुदेव ने दूसरा पौधा उखाड़ के दिखाया और बोले : ‘‘चल, अब उखाड़ के दिखा ।’’

मैं पौधा उखाड़ने में जोर लगा रहा था तो बोले : ‘‘देख, तू अकेला थक जायेगा, 2-3 भाइयों को लेकर पूरा कर लेना । चलो, शाम होने को है, अभी इसे रहने दो ।’’

सेवा की सूक्ष्मता बढ़ाते औरप्रेरणा, प्रसाद भी देते

एक गमले में पीपल का पौधा लगा हुआ था, जिसकी जड़ें गमले के नीचे बने छेद से बाहर आ गयी थीं । पौधे को जमीन में रोपना था । एक भाई गमले में पानी डालकर मिट्टी को गीली कर रहा था और उसमें लकड़ी डाल के पौधे को निकालने का प्रयास कर रहा था । बापूजी ने यह देखा तो बोले : ‘‘लकड़ी नहीं डालनी है । ध्यान रहे कि पीपल की एक भी जड़ नहीं टूटनी चाहिए और गमला भी नहीं टूटना चाहिए । गमले से मिट्टीसमेत पीपल की जड़ें निकालनी हैं ।’’ सब लोग सोच में पड़ गये । गुरुदेव मुझसे बोले : ‘‘तू निकाल लेगा ?’’

‘‘जी बापूजी! निकाल लूँगा ।’’

फिर सबको बोले : ‘‘यह कैसे निकालता है, देखो जरा ।’’

मैंने गमले को आड़ा लिटा दिया और पीछे से सारी जड़ों को  समेट के उन पर एक गीला कपड़ा लपेट दिया ताकि मिट्टी न गिरे, जड़ें भी न टूटें और आराम से गमले के अंदर आ जायें । फिर पीपल को पकड़ के धीरे-धीरे खींचा तो मिट्टीसहित बिना जड़ें टूटे सीधा बाहर आ गया ।

बापूजी बहुत प्रसन्न होते हुए बोले : ‘‘देखो, यह होती है सेवा ! अब सूर्यास्त होनेवाला है, पीपल को हाथ मत लगाना, ऐसे ही रहने देना । कल कुटिया की पश्चिम दिशा में इसे लगा देना । सूर्यास्त के बाद किसी भी पेड़-पौधे को नहीं छेड़ना चाहिए । तुम सब लोग समझ रहे हो न ?’’

‘‘जी, बापूजी ।’’

सेवा में सूक्ष्मता के प्रेरणादाता तो स्वयं बापूजी ही हैं फिर भी वे उसका यश हम शिष्यों को देकर ऊपर से प्रसन्नता और प्रसाद लुटाते हैं ।

गुरुदेव मुझसे बोले : ‘‘तू रुक जा । तेरे लिए प्रसाद लाता हूँ ।’’

पूज्यश्री अंदर कुटिया में गये और  बर्फी, बेसन के  लड्डू और सेवफल ले के आये और प्रसाद देते हुए बोले : ‘‘कैसे खायेगा ? जैसे पक्षी खाते हैं ऐसे (थोड़ा-थोड़ा व चबा-चबाकर) खाना है । चल, खा के दिखा ।’’ फिर मैंने थोड़ा-सा प्रसाद मुँह में डाला और चबाने लगा तो बापूजी बोले : ‘‘ठीक, अब जा और जितने लोग इधर सेवा कर रहे हैं उन सबको बुला के कतार में खड़ा कर । मैं सबको प्रसाद देता हूँ ।’’ 70-80 लोगों को अपने हाथों से प्रसाद देकर बापूजी कुटिया में गये ।

योगक्षेमं वहाम्यहम्...

शाम के 7.30 बजे थे । सब लोग पंडाल में चले गये । पूज्यश्री सत्संग करने के लिए पंडाल की ओर जा रहे थे । मैं और एक भाई फावड़े, तगारे, गैंती, सीमेंट आदि सामान उठाकर लारी में भर रहे थे । गुरुदेव के सान्निध्य, दर्शन, मधुर वचन और सेवा के आनंद में तन्मय होने से पूरे दिन मुझे पैर का दर्द महसूस नहीं हुआ लेकिन सेवा पूरी होते ही शाम को दर्द महसूस होने लगा । बापूजी ने मेरे को लँगड़ाते हुए देख लिया और बोले : ‘‘रुक... रुक... यह तेरे पाँव को क्या हुआ है, दिखा ।’’

मैंने कहा : ‘‘बापूजी ! थोड़ी-सी चोट लग गयी थी ।’’

गुरुदेव ने जैसे ही मेरे पैर पर टॉर्च मारकर दृष्टि डाली तो ऐसा प्रभाव हुआ कि गुरुदेव की दृष्टि पड़ने मात्र से मेरा दर्द मिट गया और मैं सीधा हो के चलने लगा ।

पूज्यश्री बोले : ‘‘इतनी चोट लगी है ! एक काम कर, इस पर आश्रम का मालिश तेल अभी और रोज लगाना ।’’

फिर हम लारी लेकर जाने लगे तो बापूजी बोले : ‘‘तू लारी ले के नहीं जायेगा, चल हट जा ।’’

गुरुदेव ने खुद लारी खींचने के लिए एक तरफ से उसे पकड़ लिया व दूसरी तरफ से एक भाई ने पकड़ा और बापूजी मुझसे बोले : ‘‘चल, तू लारी के ऊपर बैठ जा ।’’ यह सुनते ही मेरी आँखों से आँसू बहने लगे । लारी का वजन 300 किलो के आसपास हो गया होगा यह सोचकर मैंने कहा : ‘‘नहीं बापूजी ! आप मेरे लिए इतना कष्ट मत उठाइये ।’’

मैं नहीं मान रहा था तो बोले : ‘‘सिक्योरिटीवालों को बुलाऊँ ?’’ ऐसा करके बापूजी ने मुझे जबरदस्ती लारी में बैठने के लिए कहा । रास्ते में मुझे अच्छा नहीं लग रहा था कि गुरुदेव लारी खींच रहे हैं और मैं उसमें बैठा हूँ । इसका जहाँ मुझे बहुत रोना आ रहा था, वहीं गुरुदेव की ऐसी आत्मीयता, ऐसा प्रेम पाकर प्रेमाश्रुओं की धाराएँ भी थम नहीं रही थीं । मैं धीरे से उतर गया । गुरुदेव ने मुझे उतरा हुआ देखा तो बोले : ‘‘मेरी आज्ञा के बिना तू कैसे उतरा ? बेटे ! तू संकोच मत कर, तेरे पाँव में दर्द है और मेरी आज्ञा से तूने सेवा की है इसलिए मैं तेरे को ले चल रहा हूँ । देर हो रही है, जल्दी बैठ । तू लारी पर नहीं बैठेगा तो चल, मेरे कंधे पर बैठ जा ।’’

इतना सुनते ही मैंने गुरुदेव के सामने घुटने टेककर मत्था टेक दिया और बोला : ‘‘नहीं बापूजी ! ऐसी आज्ञा मत कीजिये ।’’ और मैं झट-से लारी में बैठ गया ।

बापूजी और एक आश्रमवासी भाई कुटिया से पंडाल तक (करीब आधा किलोमीटर) लारी को खींचते हुए लेकर आये ।

बापूजी ने पंडाल में टॉर्च मारी और बोले : ‘‘अरे ! उधर क्या है, इधर देखो, सारा मजा इधर हो रहा है ।’’ पंडाल में बैठे सारे साधकगण वह दृश्य देखकर दंग रह गये ।

पंडाल में जाकर बापूजी ने मेरा नाम पूछा और बोले : ‘‘अरे, विजय की सब जय लगाओ रे !’’

गुरुदेव की इस करुणा-कृपा और लीला को देखते हुए मेरे आँसू थम नहीं रहे थे । 

बापूजी बोले : ‘‘अरे, तेरी जय हो रही है और तू आँसू बहा रहा है !’’

फिर गुरुदेव विनोद करते हुए बोले : ‘‘चलो, इसको बेचना है । कौन खरीदेगा ?’’ सबने हाथ उठाये । बोले : ‘‘चलो, 1 लाख में देंगे तो...’’ फिर से सबने हाथ उठाये ।

बोले : ‘‘अरे, 1 लाख में थोड़े ही देंगे, चलो 11 लाख में दें...’’ इस प्रकार बापूजी आँकड़े बढ़ाते जा रहे थे और लीला करते जा रहे थे । 

अंत में बोले : ‘‘अरे ! इसकी तो जय हो गयी, इसको बेचना थोड़े ही है !’’

मैंने लारी से नीचे उतरकर बापूजी को दंडवत् प्रणाम किया ।   


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Gurudev’s single aphorism changed the course of my life


Vijay Bhai, who has been engaged in seva whilst being a resident of Udaipur Ashram (Rajasthan), has been blessed with the proximity of Gurudev since 2006. Presented below are some holy reminiscences of Pujyashri shared by him.


In 2006, I got the chance to read the spiritual book – ‘Jivan Rasayana’ (available as ‘The Elixir of Life’ in English) which is imbued with the ambrosial words of Pujya Bapuji; and the very first aphorism of which touched my heart. From then on, I started hearing Pujya Bapuji’s satsanga (spiritual discourses) regularly, as a result of which, I became more and more determined to tread the path to Self-realization. Finally, I firmly resolved to tread this path, and after 8 months of mantra initiation, by Guru’s grace I surrendered myself to the ashram.


What spontaneity and compassionate grace of Gurudev!


The great men who are one with the Supreme Brahman, the Supreme Self, are undoubtedly adept in Absolute knowledge, besides being expert in worldly dealings too. These great men, who are established in the Paramatma-tattva (the essence of the Supreme Self) and intoxicated with the Bliss of Brahman, enact numerous lilas (divine sports) on planet earth for the welfare & well-being of humans; to ward-off pain & sorrow, dejection & disappointment and the darkness of ignorance from their lives; and to infuse enthusiasm and exultation in them; and to give the light of true-knowledge, along with divine joy to them, leading them towards the path to God, or Self-realization.


This incident dates back to 2011. One of my legs was severely injured. At the same time, Bapuji was visiting Udaipur Ashram for the purpose of Dipavali Bhandara. The seva of agriculture along with that of planting tulsi (Holy Basil) all round the kutir (cottage) of Bapuji was being carried-out. Around 70-80 people were engaged in this seva. It was midday. That’s when Pujyashri came out of the kutir and started instructing everyone what to do and how to do it. Seeing this, I felt like getting close to Gurudev. Not bothering about the pain in my leg, I set out for this seva, and holding a pickaxe, engaged myself in the same along with other Guru-bhais (brother disciples).

Suddenly Bapuji, pointing towards me, said – “Hey gentiwala (the one working with a pickaxe)! Come here. Do you know how to use the pickaxe perfectly to loosen the soil?”


I said, “Yes, Bapuji.”


“Come on. You have to root-out the henna-plants from all-around the kutir, and plant tulsi in lieu. The uprooted henna plants have to be planted at another place.”


Loosening the soil with a pickaxe, I started to root-out the henna plants, but since I wasn’t doing it properly, the kindly Gurudev Himself started to teach me how to do it. Bapuji said, “This is not how it will come out, dig the soil around the plant a bit deeper, only then will it come out.” But after having dug the soil, I wasn’t able to pull out the plant by myself; so, Pujyashri, lifting the lower end of the dhoti He was wearing and tying it slightly above (towards the waist) so as to keep it out of the way, He Himself held the plant at one end, and told me to hold it at the other. He thus rooted out the first plant, and said: “You see! Now let’s root-out another plant.”All were left jaw-dropping at this lila of Gurudev! Seeing Brahmajnani Gurudev engaged in such seva, out of compassion right in front of me, I became quite hesitant. I said, “Bapuji! I will manage, please leave it.”


“Arre, how and what are you going to manage? Hold it, your father is working along with you.” Again, Gurudev showed me, rooting out another plant, and said, “Come, now root out a plant and show me.”


When I was pulling the plant forcibly to root it out, He said, “Look, you will get tired doing it all by yourself; get 2-3 sadhaka-brothers involved and complete it. Dusk has begun to fall; leave it for now.”


Besides improving Seva minutely, He gives us Inspiration and Prasada too!


There was a Pipal-sapling planted in a plant-pot. The roots of the plant had grown out of the hole at the base of the plant-pot. The sapling had to be planted in the soil. Pouring the water into the plant-pot, one of the sadhaka-brothers was wetting its soil; and putting a stick into it, he was trying to remove the plant. Bapuji, on noticing this, said, “You aren’t supposed to put a stick into it. Make sure that not even a single root of the plant gets broken, nor should the plant-pot break. The Pipal plant roots should come off the plant-pot along with the soil.” Everyone started wondering how to do this. Gurudev asked me, “Would you be able to do this?”


I said, “Yes, Bapuji! I shall remove it.”


Then He said to everyone, “Just notice, how he manages to do this?”


I laid the plant-pot horizontally and collecting all the roots of the plant jutting out from the bottom of the plant-pot, wrapped them up in a wet-cloth so that the soil didn’t fall off, and even the roots didn’t break; and on top, they easily get pulled-in inside the plant-pot. Then slowly and carefully, I pulled the Pipal-plant out; and it came out straight away along with the soil, and roots intact.


Quite pleased at this, Bapuji said, “See, this is what is called seva in real sense! The dusk has begun to fall, so don’t touch the Pipal now, leave it as it is. But plant it towards the west of the kutir tomorrow. One shouldn’t disturb any plant post sunset. You all understand what I am saying, don’t you?”


“Yes, Bapuji.”


It’s none but Bapuji Himself who is the inspirer of the precision, accuracy and thoroughness in our seva; yet, accrediting the success in seva to us, His disciples, He gives joy and prasada to us.


Gurudev said to me, “Just wait here! Let me bring some prasada for you.”


Pujyashri went inside the kutir and brought burfi (an Indian sweet made from milk and sugar), besan-laddoos (sweet balls made from chickpea flour) and an apple as prasada; and giving the same to me, said, “How will you eat it? Make sure you eat this prasada in tiny bits – the way birds take their food. Now show me how do you eat it.” So, I put a little bit of prasada into my mouth and started masticating it; Bapuji said, “OK, go now, and call the others engaged in seva here, just queue them up. I shall give prasada to everyone.” Later, Bapuji gave the prasada to all 70-80 people (who were engaged in seva there) and went inside the kutir.


I arrange for securing what they lack and preserving what they have…


It was half past seven that evening and everyone had made it to the satsanga-pandal, and Pujyashri was heading towards the pandal to deliver satsanga discourse. I and another sadhaka-brother were loading a lorry with spades, bricklayer’s troughs, pickaxes, cement, etc. Since I was engrossed in the bliss of Gurudev’s proximity, darshan, sweet ambrosial words, and seva, I didn’t feel the pain in my leg all day; however, as soon as I was done with the seva in the evening, I started feeling the pain again. Bapuji noticed me limping around and said, “Wait… wait… just show me what has happened to your leg.”


I said, “Bapuji! Nothing, I had sustained a minor injury.”


As soon as Gurudev flashed a torch light on my foot and cast His gracious glance on it, my pain vanished due to the magic effect of His glance and I started walking normally (without limping).


Pujyashri said, “You have sustained such a grievous injury! Do one thing; apply the ashram’s Malish-tail (massage oil) on it now, and after that, daily.”


Then as we started to drag the lorry, Bapuji said, “Go now, don’t you drag the lorry.”


In order to pull the lorry, Gurudev Himself held it from one end and another sadhaka-brother did so from the other end; after which Bapuji said to me, “Come now, just climb and sit on the lorry.” On hearing this, tears started rolling down my cheeks. Thinking that the loaded lorry must be weighing around 300 kgs, I said, “No Bapuji! Please don’t take so much trouble for me.”


When I was not agreeing to His instruction, Bapuji said, “Should I call security personnel?” Thus, Bapuji forcibly made me sit on the lorry. On our way, I was feeling quite embarrassed that Gurudev was dragging the lorry and I was sitting on it. On the one hand, I was quite upset about this awkward situation; but on the other hand, I was deeply moved, receiving such intimacy and affection from Gurudev; because of which I couldn’t stop shedding tears of love. I quietly got off the lorry. Looking at me having gotten off the lorry, Gurudev said, “How dare you get off without my permission?” Dear son! You don’t have to hesitate; your leg is painful, and you have served at my behest; and that is the reason why I am taking you along. Now hurry up, it’s getting late. If you don’t want to sit on the lorry, then come, just climb on my shoulder.”


As soon as I heard this, I knelt down before Gurudev, and said, “No Bapuji! Please do not issue such an order to me.” And then I quickly climbed onto the lorry.


Bapuji and another sadhaka-brother who was a resident sadhak of the ashram pulled the lorry all the way from the kutir to the pandal, which must be around half a kilometer. Flashing the torch-light at the pandal, Bapuji said, “Hey! What’s so great that is going on there? Look here, all the fun is going on here instead.” All the sadhakas in the pandal were quite astonished at that sight.


After getting to the pandal, Bapuji asked my name and said, “Hey guys! Everyone, just shout ‘victory to Vijay!’”


Wondering over this compassionate-grace and lila of Gurudev, my tears didn’t stop. Bapuji said, “Hey, they are shouting victory to you and you are shedding tears!”


Again, Gurudev said in a lighter vein, “OK, so he is on sale now. Who will buy him?” Everyone raised their hand. So, He said, “OK, what if I sell him for INR 1 lakh…” Again, everyone raised their hand.


To this, He said, “There’s no way I can sell him for INR 1 lakh. How about 11 lakhs…” Thus, Bapuji was increasing the price and in the process, was enacting His lila. At the end, He said, “Hey! Everyone has shouted victory to this guy, how can he be sold!”

I just got off the lorry and prostrated before Bapuji. 

 


[Rishi Prasad - July Edition-Issue-319]

 

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