दैवी कार्य में जो लगाते, उसका कई गुना पाते

दैवी कार्य में जो लगाते, उसका कई गुना पाते

(गतांक में आपने पढ़ा कि सुरेश मौर्य सेवा सम्पन्न होने के बाद बचे हुए पैसे गुरुदेव के श्रीचरणों में अर्पित करने पहुँचे तो गुरुदेव बोले: ‘‘यह तुम्हारी धरोहर मेरे पास जमा है इसका कई गुना करके मैं वापस करूँगा ’’)

पूज्यश्री के उपरोक्त वचन उनके जीवन में कैसे प्रत्यक्ष हुए इस बारे में बताते हुए सुरेश मौर्य कहते हैं : उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में आदिवासी क्षेत्र है, वहाँ लूटपाट ज्यादा होती है लेकिन उस क्षेत्र में भी हम सेवा हेतु गये । साध्वी रेखा दीदी हमारे साथ थीं । हम कम्बल, साड़ियाँ, खजूर, बर्तन, अनाज, बच्चों के लिए कपड़े आदि सामग्री बाँटने हेतु ले गये थे । पहले ही कार्यक्रम में हमारे अनुमान से अधिक लोग आये ।

दीदी ने शाम को समितिवालों के साथ मीटिंग की, पूछा : ‘‘कितना-क्या बचा है ?’’

हमने देखकर बताया : ‘‘दीदी ! आधा सामान तो आज बँट गया और इससे बड़े-बड़े प्रोग्राम आगे हैं ।’’

दीदी बोलीं : ‘‘जब तुम सर्वे करने आये थे, उसी समय तुम्हें अंदाजा लग गया होगा कि यहाँ कितनी अधिक गरीबी है, ज्यादा सामग्री की जरूरत पड़ेगी । कम-से-कम मुझे तो संकेत किया होता, मैं गुरुदेव के चरणों में बात रखती ।’’

मैं थोड़ा निराश हो गया । दीदी ने मेरे भाव को परखा और ढाढ़स बँधाया कि ‘‘चिंता मत करो, जा के सो जाओ । जिन्होंने हमें यह सेवा दी है, वे परम समर्थ गुरुदेव ही इसे पूरी करवायेंगे । पता नहीं अभी गुरुदेव कहाँ होंगे, कल किसीके फोन से या अन्य किसी माध्यम से गुरुदेव तक यहाँ का संदेश पहुँचाने का प्रयास करूँगी ।’’ उस समय मोबाइल आदि का ज्यादा प्रचलन नहीं था, किसी-किसीके पास ही मोबाइल होता था ।

रात को हम लोग अपने-अपने आवास में जाकर सो गये । मेरे पास में एक स्थानीय साधक वकील लेटे थे । प्रातः 4.30 बजे उनके मोबाइल पर रिंग हुई । उन्होंने फोन उठाया तो आवाज आयी : ‘हरि ॐ ! मैं आशाराम बापू बोल रहा हूँ ।’

बापूजी की आवाज सुनते ही वे भाई चौंक गये और एकदम मुझे जगाया : ‘‘बापूजी का फोन है !’’

मैं भी हक्का-बक्का रह गया । मैंने फोन लिया, बापूजी बोले : ‘‘कौन बोलता है ?’’

मैंने अपना परिचय दिया तो गुरुदेव बोले : ‘‘अरे भाई, यू.पी.वाला ! रेखा कहाँ है ?’’

‘‘जी, 1 कि.मी. दूर उनका आवास है, वहाँ हैं ।’’

‘‘ठीक है, कोई साधन है ? तू जा, रेखा से मेरी बात करवाना ।’’

मैं दीदी के आवास पर पहुँचा । वे उस समय नियम कर रही थीं । बापूजी का फोन है यह सुनते ही दीदी भागती हुई आयीं । उन्होंने मोबाइल पकड़ा और उनकी आँखें भर आयीं ।

पूज्यश्री बोले : ‘‘अरे ! रोती क्यों है ? कल रात में तू ही तो मीटिंग ले रही थी और बोली थी कि मुझे संकेत किया होता तो मैं गुरुदेव के चरणों में बात रखती... ।’’ बापूजी बोले जा रहे थे और दीदी की आँखों से आँसू झरते जा रहे थे ।

गुरुदेव बोले : ‘‘बच्चे बुलाते रहें और माँ न सुने ऐसा होता है क्या ! अच्छा बता, क्या समस्या है ?’’

‘‘बापू ! यहाँ बड़ी गरीबी है । जो सामान ले के आये थे उसमें से आधा तो पहले ही दिन बँट गया । लोग घर पर सामान रख के दुबारा आ जाते हैं, 1-1 व्यक्ति 2-2, 3-3 कम्बल ले जाता है । अभी 6 दिन की सेवा बाकी है और इससे ज्यादा संख्या में लोग होंगे ।’’

‘‘क्यों चिंता करती है, तू जा और समितिवालों को भी ढाढ़स बँधा । और घर में एक ही सदस्य थोड़े ही होता है, बड़े-बुजुर्ग भी होंगे । इतनी ठंड पड़ती है, उन्हें भी तो ठंड लगती होगी । घर में 4-5 सदस्य होंगे तो उनको 4-5 कम्बल लेने दो, तेरे बाप का क्या जाता है ! तेरे और सारे समितिवालों के कंधे थक जायेंगे बाँटते-बाँटते पर सामान नहीं खूटेगा ।’’

गुरुदेव ने वाराणसी आश्रम से एक ट्रक भर के सामग्री हमारे पास पहुँचवायी, कई हजार नमकीन-पैकेट कानपुर से भिजवाये व कुछ सामग्री अहमदाबाद आश्रम से भिजवायी ।

सभी जगह खूब सामान बाँटा । एक जगह हजारों लोगों की ऐसी भीड़ इकट्ठी हुई कि दोपहर 12 बजे से भंडारा चालू हुआ और रात्रि के 8 बज गये फिर भी न तो भोजन खत्म हो रहा था न ही लोग ! आखिर लोग तो पूरे हो गये पर भोजन खत्म नहीं हुआ । फिर हम घरों से बुला-बुला के लोगों को भर-भर के देने लगे । लोग 4-4, 5-5 कम्बल ले जा रहे थे ! इतना खिलाया, इतना बाँटा... आखिर वही हुआ जो गुरुदेव ने कहा था । हम बाँटते-बाँटते थक गये पर सामान कम नहीं पड़ा ।

जब-जब सेवाकार्यों में सामग्री आदि की आवश्यकता पड़ी तब-तब गुरुदेव ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से व्यवस्था करवायी है और करते-करवाते रहते हैं ।

इस स्वार्थ से भरे कलियुग में भी यदि मनुष्य-जीवन में सद्भाव, परोपकार प्रत्यक्ष है तो वह करुणासिंधु बापूजी जैसे महापुरुषों का ही भगीरथ पुरुषार्थ है ! मेरे जैसे लाखों-लाखों लोगों के हृदय में सेवा की प्रेरणा उन्हींकी है । सेवा में पैसे व सामग्री भी उन्हींकी प्रेरणा से लोग लगाते हैं । जिनकी सेवा हुई वे लोग और जिनके द्वारा सेवा हुई वे सेवक भी बापूजी के स्वजन हैं, अपने हैं । तब सेवा करके बची सामग्री या पैसे भी तो उन्हींके थे ! लेकिन मेरे दाता का स्वभाव ही है देना, फिर उनको दिये बिना रहा ही कैसे जाय ? हम एक हाथ से जितना भी उनका उन्हींको अर्पण करते हैं उससे कई गुना करके वे लौटाते रहते हैं अपने हजार-हजार हाथों से । वे सतत हमारा ध्यान रखते हैं अपनी हजार-हजार आँखों से । और साथ में अद्वैत ज्ञान के सत्संग से देते हैं ज्ञान के हजार-हजार नेत्र, जिनमें से एक-एक ज्ञान की दृष्टि इतनी तो परिपूर्ण है कि हृदय में ठहरते ही हमें अखूट आनंद से भर दे ।

हर साधक को, मनुष्य को, प्राणिमात्र को मिलनेवाली हर सहायता उन्हींकी है । सहायता के हर हाथ के पीछे सत्ता-चेतना उन्हींकी है । हमें सत्कार्य हेतु प्रेरित करनेवाला हर विचार उन्हींका है । हमारे बापूजी एक ही शरीर में नहीं हैं । उनके हजार-हजार हाथ हैं इसलिए जो भी उन्हें अर्पण करते हैं वह अर्पण करनेवाले को ही कई गुना होकर मिलता है । हजार-हजार अभावग्रस्तों की हजार-हजार दुआओं और अपने हृदय की खुशी, सुकून और संतोष की गिनती ही क्या हो ! शास्त्र की यह रहस्यमय बात मुझे प्रत्यक्ष हो गयी कि

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।

सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ।।

‘हम उन्हें वंदन करते हैं जिनके सहस्र रूप हैं, सहस्र नेत्र हैं, सहस्र शीश, चरण और बाहू हैं । हम उन सनातन (शाश्वत) पुरुष को नमन करते हैं जिनके सहस्र नाम हैं और जिन्होंने इस सृष्टि को सहस्र कोटि युगों से धारण किया हुआ है!’

जिसे भी शास्त्रों का सार समझना हो, बस बापूजी का जीवन देख ले, उनका सत्संग सुन ले । हर सत्संगी-साधक को बापूजी द्वारा अखंड रूप से जो मिलता रहता है वह कितने गुना होता है उसकी गिनती नहीं हो सकती, किसी भी प्रकार नहीं हो सकती । हर साधक शांत होकर अपने भीतर समीक्षा करे तो ‘‘मैं तेरी यह धरोहर कई गुना करके दूँगा ।’’ यह गुरुदेव का वचन उसे अपने जीवन में भी कई-कई गुना साकार हुआ मिलेगा ।

हम तन, मन, धन जो कुछ भी और जितना भी दैवी कार्यों में लगाते हैं वह कितने गुना होकर जीवन में वापस मिलता है, यह लिखने बैठें तो हर साधक के अनुभवों के संकलन से कितने ग्रंथ हो जायेंगे ! तन की निरोगता, मन की शांति, बुद्धि की कुशाग्रता, कर्ज-निवारण, संतानप्राप्ति, दुःख-निवारण, बाधा-शमन, विकारों का दमन, कलह-निवारण, धन-धान्य की बरकत, परिवार में सौहार्द, प्रेमाभक्ति की प्राप्ति, आत्मिक सुख-शांति, निर्विकारी आनंद... दैवी कार्य में लगनेवालों को कितना कुछ, कितने प्रकार से, कितने गुना होकर मिलता है ! लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि विशेष भाग्यशाली तो वह है जो उनमें से नश्वर की इच्छा न रखकर शाश्वत कमाई में प्रीति रखे । उसकी वह धरोहर गुरुकृपा से अनंत गुना हो जाती है और उसे अपने भीतर ही ऐसा आनंद मिलता है कि इस लोक या स्वर्ग, वैकुंठ लोक आदि का सुख पाने की इच्छा उस साधक को नहीं होती ।


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Whatever is invested in divine works will be returned multifold



(In the last issue you read that after accomplishing service works, Suresh Maurya, went to Gurudev to give him the remaining money. Gurudev told him: “I have your deposit. I shall give multifold returns for this.”)


Suresh Maurya narrated how the above statement of Bapuji materialised in front of his eyes. “There is a tribal area in district Mirzapur, Uttar Pradesh where plundering is rampant. We went there for service. Sadhvi Rekha Didi came with us. We carried blankets, sarees, dates, utensils, food grains, children’s clothes, etc. for distribution. On the first day of the programme, people came in greater numbers than we expected.


That evening, Didi asked the Samiti volunteers at the meeting: “Which articles are left, and in how much quantities?”


I checked and said, “Didi! Half the materials have been distributed today and there are bigger programmes forthcoming on our agenda.”


Didi said: “When you came here to conduct a survey, you must have estimated the degree of poverty prevalent and realised that more materials would be needed. You should have at least hinted this to me, then I could have mentioned it to Bapuji.”

 

I became a little disappointed. Didi read my mind and consoled me, “Don’t worry, go sleep. Now, the supremely mighty Gurudev, who assigned this service work to us, will make it accomplished. I don’t know where Gurudev is now; tomorrow, I shall try to contact Guruji via someone’s phone or by any other means and alert him of this problem.” At that time, mobile phones were not in vogue, very few people had one.


We went to sleep in our own residence. A local lawyer was lying next to me. At 4:30 in the morning, his mobile phone rang. He picked up the phone and heard: ‘Hari Om! Asharam Bapu speaking.’


Bapuji’s voice startled him and he awakened me: “Bapuji is on the phone!”


I too was shocked. I took the phone. Bapuji asked: “Who is there?”


When I introduced myself, Gurudev said: “Oh U.P. wallah brother! Where’s Rekha?”


“She is at her residence, about a kilometre away.”

 

“Okay, do you have a vehicle? Go there and let me talk to Rekha.”

 


When I reached Didi’s residence, she was doing her daily spiritual routine. Knowing that Bapuji was on the phone she hurried. She took the phone and her eyes were filled with tears.


Pujyashri said: “Arre! Why do you cry? Last night you held the meeting and said that if you hinted to me, I could let Bapuji know…” Bapuji was speaking, and Didi’s eyes were shedding tears.

 

Gurudev said: “Is it possible that the children keep calling their mother and she does not come? Okay, tell me what is the problem?”

“Bapu! This area is hugely affected by poverty. Half the materials we brought have already been distributed, on the first day. People return after taking the materials we give them home. Each person takes up to 2 or 3 blankets. Six days of the service programme are left and people will come in greater numbers.”


“Why do you worry, go and console the members of the Samiti too. And is there only one member in a house? There are some elderly members in the house. It is getting so cold, they will be feeling cold. There are probably 4-5 family members in a house, so let them take 4-5 blankets; what is your father’s loss? You and all the people of the samiti will become tired distributing stuff, but you will not run out of anything.”


Gurudev sent a truckload of materials from Varanasi Ashram to us along with thousands of packets of namkin (salted food packets) from Kanpur, and some materials from Ahmedabad Ashram.


We distributed a lot of materials in all places. One place was so thronged by thousands of people that the Bhandara continued from 12.00 pm to 8.00 pm but neither the people nor food was finishing! In the end, all the people left, taking materials with them, but food still remained. Each person took 4 to 5 blankets! We fed them so much, distributed so much… in the end, what Guruji prophesied, happened. We got tired distributing everything, but we didn’t run out of anything.


Guruji always, directly or indirectly, arranges to provide materials whenever we fall short of anything during service programmes.

If we see good disposition and benevolence in human life, even in this Kali Yuga (the age of darkness) plagued by selfishness, then it is only due to the herculean tasks performed by great men like Pujya Bapuji, an ocean of compassion. He has inspired the spirit of selfless-service in lakhs of people like me. People spend money and devote time and effort to service activities only by his inspiration. Bapuji considers the beneficiaries and the volunteers who do this service work to be his own family. So, the things and money left with us after the completion of work also belongs to Him! But it is my Giver’s nature to give, then how can we do without giving him? Whatever things we offer with a single hand to Him, (that was actually received from Him), is returned by Him manifold with His thousands of hands. He constantly pays attention to us through His thousands of eyes. Along with all these, through His Satsang on non-duality (Knowledge of non-duality), He gives us thousands of spiritual insights, each of which is so complete that it fills our heart with inexhaustible bliss when we contemplate on it.


All aid received by every Sadhaka, every human being, and every creature is given by Him. The power and consciousness behind every helping hand is His. Every thought that inspires selfless-service is His. Our Bapuji does not live only in one body. He has thousands of hands, and that is why whatever is offered to Him by any person is returned to him manifold. How can we measure the joy, peace and satisfaction we experience in our hearts with the blessings from thousands of poverty-stricken people? I have realised the statement of Scripture,


 

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।

सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ।।


 

“Salutations to Thee, oh Lord, Who runs the immeasurable time, Of thousand crore yugas, Who has no end, Who has thousand names, Who has thousand forms, Who has thousand feet, Who has thousand eyes, Who has thousand heads, Who has thousand arms, And Who is always there.”


Whoever wants to understand the essence of Shastras, should see the life of Bapuji, and listen to His Satsang. It is impossible to count or measure, by any means, what is being received continually by each satsang listener sadhaka from Bapuji. If every sadhaka examines his life with a calm mind, he/she will find the words of Pujya Bapuji: “I shall return your deposit multifold” materialised many times in their lives. If we compile the experiences of every sadhaka regarding how many fold returns of whatever fraction of Tana, Mana and Dhana they dedicated to the cause of the divine mission of SatGuru was received by them in their lives, who knows how many volumes could be written down! Whoever takes part in divine works gets so many things in so many ways such as physical health, mental peace, sharpness of intelligence, payment of debts, having progeny, removal of misery, getting rid of problems, control over lust, resolving quarrels, wealth and prosperity, affection in family, attainment of devotional love, spiritual peace and happiness, transcendental bliss and so on! But still, it feels like, the one who doesn’t desire transitory things and focuses on eternal bliss. Their deposit gets multiplied infinitely with Guru’s grace and the sadhaka gets such bliss within, that he does not desire the pleasures of this world, heaven, Vaikuntha or any other world. Forget about the happiness of this world or heaven, even the happiness of Vaikuntha doesn’t interest those sadhakas.


 

 

[Rishi Prasad - May-2019- Edition-217]

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