घंटों की उलझन क्षणभर में सुलझी

घंटों की उलझन क्षणभर में सुलझी

गौ-प्रेम से जुड़े पूज्य बापूजी के कुछ प्रेरणाप्रद हृदयस्पर्शी प्रसंग

श्योपुर गौशाला के गजानंद भाई पूज्य बापूजी के और भी कुछ अविस्मरणीय जीवन-प्रसंग बताते हुए कहते हैं :

घंटों की उलझन क्षणभर में सुलझी

सन् 1990 के आसपास की बात है । अहमदाबाद आश्रम में गुरुपूनम के निमित्त पूज्य बापूजी का सत्संग चल रहा था । एक आश्रमवासी भाई गायों को चराने के लिए नदी-किनारे ले गया था । 10-15 गायें थीं । अचानक बारिश होने लगी । वहाँ की जमीन दलदली थी, जिससे गायों के पैर धँसने लगे । गायें बहुत बुरी तरह से फँस गयीं । वे जितना निकलने का प्रयास करतीं उतनी अंदर धँसती जातीं । ऐसी स्थिति हो गयी कि गायें थक गयीं और उन्होंने ताकत लगाना बंद कर दिया ।

वह भाई गायों को निकालने में मदद प्राप्त करने हेतु पंडाल में आया और पीछे बैठे साधकों को बुलाने लगा । थोड़ी ही देर में एक-एक करके करीब 500 लोग नदी-किनारे इकट्ठे हो गये । हमने ढाई-तीन घंटे तक प्रयास किये परंतु हमारा कोई भी प्रयास उन्हें बाहर नहीं निकाल पा रहा था अपितु जितना-जितना कोशिश करते, उतना-उतना गायें और अंदर धँसती जा रही थीं ।

इतने में सत्संग पूरा हुआ । पूज्यश्री को इस बारे में जानकारी मिली तो स्वयं वहाँ पहुँचे और बोले : ‘‘सब दूर हट जाओ ।’’

बापूजी ने गायों को चौंकाने के लिए वहाँ छाता लेकर छलाँग मारी और छाते को ऊपर-नीचे, आगे-पीछे किया । इससे गायें चौंकीं और पूरा जोर लगाकर कीचड़ से बाहर निकल गयीं ।

सब लोग देखकर बड़े प्रसन्न हुए । जहाँ सैकड़ों लोग ढाई-तीन घंटे लगाकर भी गायों को निकालने में सफल नहीं हुए वहीं ब्रह्मनिष्ठ पूज्य बापूजी ने घड़ीभर में ही समस्या का निवारण कर दिया । कैसी विलक्षण सूझबूझ के धनी हैं पूज्य बापूजी !

जैसे इतने सारे लोग साथ में होने पर भी, सहयोग करना चाहते हुए भी दलदल में फँसी गायों को बाहर नहीं निकाल पा रहे थे, एक गुरुदेव ही उनके तारणहार साबित हुए जिन्होंने आकर उनका पुरुषार्थ-बल जगाया और दलदल से पार लगाया । ऐसा ही हाल संसाररूपी दलदल में फँसे मनुष्य का है, जिसका दूसरे सब लोग चाहकर भी आखिरी घड़ियों में साथ नहीं निभा सकते, एक सद्गुरु ही उस समय तारणहार हैं । वे जीते-जी तो संसाररूपी दलदल से बचा ही लेते हैं, साथ ही जीवन की आखिरी घड़ियों में जब जीव अकेला रह जाता है तब भी उसका साथ निभाते हैं ।

...तो सब आसान हो जाता है

सन् 2001 की घटना है । शुरुआत में गायें श्योपुर के जंगल में ही रहती थीं, गौशाला की व्यवस्था नहीं थी । बारिश कम होने से गायों को चारा-पानी का अभाव होने लगा । पता चला कि 50 कि.मी. दूरी पर जंगल में एक जगह है, जहाँ घास, पानी भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं । हम 4-5 आश्रमवासी भाई और 8-10 मजदूर वहाँ जाने के लिए लगभग 2400 गायों को लेकर पैदल निकल पड़े ।

5वें दिन हम वहाँ पहुँच गये । गायों के लिए पर्याप्त चारे-पानी की व्यवस्था हो गयी । वहाँ आसपास कुछ नहीं केवल जंगल-ही-जंगल था । हम लोगों को खाने-पीने की कुछ व्यवस्था नहीं थी । 40-45 कि.मी. दूर एक गाँव था । हम पैदल चलकर वहाँ जाते, रात को उसी गाँव में रुकना पड़ता फिर दूसरे दिन खाद्य सामग्री ले के वापस आते ।

जंगल में खूँखार जंगली प्राणी तो थे ही, साथ ही डकैतों का भी बोलबाला था । एक दिन पैसे आदि के लालच में हमारे एक भाई को डकैतों ने पकड़ लिया और मारपीट की ।

हमारे तो केवल सद्गुरु ही एक सहारा थे । हमने गुरुदेव से प्रार्थना की और श्री आशारामायणजी का पाठ किया । गुरुदेव की कृपा से उसके बाद डकैतों ने हमको कुछ तकलीफ नहीं दी । एक महीने के बाद पुलिसवालों ने घेरा डाला और उन डकैतों को जंगल में ही मार डाला ।

वन विभागवालों को पता चला कि ‘यहाँ पर कहीं से गायें आयी हैं’ तो वहाँ आये और हमें डाँटने लगे तथा मुझे और एक भाई को गाड़ी में डाल के 50 कि.मी. दूर लेकर गये और बहुत भय दिखाया, बोले : ‘‘तुमको जुर्माना भरना पड़ेगा ।’’

मैंने कहा : ‘‘पैसे तो यहाँ हमारे पास हैं नहीं ।’’

पैसे लाने के लिए उन्होंने मुझे छोड़ दिया ।

गुरुदेव को जब इस बात की जानकारी दी तो बोले : ‘‘गौ-सेवा में डटे रहो, कुछ नहीं होगा ।’’

मैं वापस गायों के पास पहुँचा तो ऐसा चमत्कार हुआ कि वन विभागवालों ने मुझे सामने से बोला : ‘‘आपके पैसे हमको नहीं चाहिए । जंगल में कितने दिन रहोगे ?’’

‘‘कम-से-कम 2 महीने रहेंगे ।’’

‘‘ठीक है लेकिन हिंसक जानवर तुमको क्षति पहुँचायें तो हमारी जवाबदारी नहीं रहेगी ।’’

मैंने कहा : ‘‘उसकी चिंता आप छोड़ दीजिये, सर्वसमर्थ, ईश्वरस्वरूप बापूजी हमारे साथ हैं ।’’

बाद में तो ऐसा हुआ कि जो वन विभागवाले हमें भगाने आये थे वे ही अपनी गाड़ी से हमारा दाल, आटा, सब्जी आदि हम तक खुशी से पहुँचाने लगे । बापूजी अपने हैं तो सारे अपने बन जाते हैं ।

चीता, भालू आदि जंगली प्राणियों व डकैतों से भरा घनघोर जंगल... कभी कोई समस्या आ जाय तो दूर-दूर तक गाँव-शहर कुछ नहीं ! ऐसी जगह पर ढाई महीने तक इतनी सारी गायों के साथ हम सुरक्षित एवं निर्भीक होकर रहे क्योंकि सर्वसमर्थ गुरुदेव की कृपा, गुरुदेव द्वारा सौंपी गयी सेवा को निभाने का बल हमारे साथ था । उस समय मैंने अनुभव किया कि ‘गुरुदेव ने हमें जो सेवा दी है वह कितनी भी कठिन दिखती हो लेकिन ईमानदारी से हम अपना पूरा प्रयास करें तो सब आसान हो जाता है ।’

ईमानदारी की सेवा ही साधना है

ढाई महीने बाद पूर्व स्थान पर चारे-पानी की व्यवस्था होने पर हम गायों को पुनः वहाँ ले आये । गौ-सेवा में अति व्यस्तता के चलते मेरे मन में हो रहा था कि ‘सेवा तो हो रही है पर साधना नहीं हो रही है ।’ मैंने पूज्य बापूजी को पत्र लिखा कि ‘बापूजी ! सेवा तो हो रही है लेकिन साधना नहीं हो पा रही है ।’ उस समय गुरुदेव इंदौर में थे ।

पूज्यश्री ने मुझे वहाँ से एक पत्र लिखवाया । उसमें लिखा था कि ‘गुरु के प्यारे गजानंद ! खुश रहो ! गायों की सेवा छोेड़ के अन्य कौन-सी साधना करेगा ? गायों की सेवा ही सारी साधनाओं की माई-बाप बन जाती है । सत्यकाम जाबाल की कथा तो तुमने सुनी ही होगी । गुरु की आज्ञा मानकर वह गौ-सेवा में लगा रहा और उसीसे उसको ईश्वरप्राप्ति हो गयी ।

गौ माता की सेवा ही तुम्हारी सर्वोपरि साधना है । पैसों की जरूरत हो तो मँगवा लेना और अन्य गौशालाओं में भी ध्यान देना । तुम्हारी ईमानदारी की सेवा ही साधना है ।’

जब मुझे बापूजी का यह संदेश मिला तो मेरा सेवा और साधना को अलग-अलग मानने का जो दृष्टिकोण था वह बदल गया और हृदय आनंद से भर गया । समझ में आ गया कि सब कुछ करते-कराते यदि सेवा और साधना में अलगाव की मान्यता हो तो वह आनंद से विमुख रखती है । हर कार्य को निष्काम भाव से करके उसे योग का साधन बनाने का पूज्य गुरुदेव का व्यापक सिद्धांत समझकर हृदय गद्गद हो गया ।

उसके बाद तत्परता व जिम्मेदारी में और भी बढ़ोतरी होने लगी तथा सेवा में नित्य नवीन रस आने लगा और सेवा का फल फलित होने में जो मान्यता का अवरोध था वह हटने से सेवा करते समय ही आत्मसंतोष का अनुभव होने लगा ।

(यहाँ तात्पर्य यह है कि ईश्वरप्राप्ति के लिए जो कुछ भी किया जाय वह साधना है । ‘ध्यान, जप आदि ही साधना है और गुरुसेवा साधना नहीं है’ यह मान्यता साधक को सेवा के चरम फल आत्मतृप्ति, आत्मसंतुष्टि से वंचित कर देती है । गुरुसेवा अपने-आपमें एक स्वतंत्र साधन है ।)                           (क्रमशः)

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