...ऐसी पूजा व पुकार गुरुदेव तक अवश्य पहुँचती है
Ashram India

...ऐसी पूजा व पुकार गुरुदेव तक अवश्य पहुँचती है

पूजन मानसिक, फल प्रत्यक्ष

हमारी पावन संस्कृति में सद्गुरु-पूजन की प्राचीन परम्परा है । सद्गुरु का पूजन उनके ज्ञान का, आदर्शों का, सत्य का पूजन है, उनके अनुभवों और विचारों का पूजन है, परब्रह्म-परमात्मा का पूजन है । रामायण में भगवान श्रीराम तथा श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण की गुरुसेवा व गुरुपूजा का वर्णन मिलता है ।

भगवान शिवजी कहते हैं :

गुरुरेको जगत्सर्वं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्

गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्सम्पूजयेद् गुरुम् ।।

‘ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित समग्र जगत गुरुदेव में समाविष्ट है । गुरुदेव से अधिक और कुछ भी नहीं है इसलिए गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए ।’

पूज्य बापूजी सत्संग में बताते हैं कि ‘‘गुरुपूर्णिमा अर्थात् सद्गुरु के पूजन का पर्व । गुरुपूर्णिमा के दिन छत्रपति शिवाजी भी अपने गुरु का विधि-विधान से पूजन करते थे । ...किंतु आज सब लोग अगर गुरु को नहलाने लग जायें, तिलक करने लग जायें, हार पहनाने लग जायें तो यह सम्भव नहीं है । लेकिन षोडशोपचार की पूजा से भी अधिक फल देनेवाली मानस-पूजा करने से तो भाई ! स्वयं गुरु भी नहीं रोक सकते । मानस-पूजा का अधिकार तो सबके पास है ।’’

तत्त्वसागर संहिता में देवर्षि नारदजी ने ‘मानस’ (मन के द्वारा भावित) फूल को सबसे श्रेष्ठ फूल बताया है । उन्होंने देवराज इन्द्र को बतलाया है कि हजारों-करोड़ों बाह्य फूलों को चढ़ाकर जो फल प्राप्त किया जा सकता है, वह केवल एक मानस-फूल चढ़ाने से प्राप्त हो जाता है । इससे मानस-पुष्प उत्तम पुष्प है । मानस-पुष्प में बासी आदि कोई दोष भी नहीं होता इसलिए पूजा करते समय मन से गढ़कर फूल चढ़ाने का अद्भुत आनंद अवश्य प्राप्त करना चाहिए । (स्थूल रूप से फूल चढ़ाना मना नहीं है, उसका अपना महत्त्व है । फूल वातावरण को सुगंधित, पुष्टिकारक बनाते हैं और मन को सात्त्विक, एकाग्र बनाते हैं ।)

सद्गुरु की मानस-पूजा का फल प्रत्यक्ष है । इसमें लगते ही मन की चंचलता, बहिर्मुखता शांत होने लगती है, हृदय अद्भुत आनंद व शांति से भरने लगता है । ‘मैं’पना भूल के जब साधक इसमें तल्लीन हो जाता है तो उसको अपने सद्गुरु की प्रत्यक्ष उपस्थिति ऐसे प्रतीत होती है जैसे 4700 वर्ष की दूरी मिटाकर मीरा भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष सान्निध्य का एहसास करती थी । सद्गुरु बाह्य रूप से हजारों कि.मी. दूर ही क्यों न हों, साधक की पूजा, वार्ता, उसके भावों के पुष्प गुरुदेव तक अवश्य पहुँचते हैं । इसका प्रत्यक्ष अनुभव किये हुए एक आश्रमवासी साधकभाई बताते हैं :

सन् 2007 की गुरुपूनम के आसपास की बात है । मैंने सत्संग में सुना था कि पूज्य बापूजी अपने सद्गुरुदेव पूज्यपाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज का मानसिक पूजन करते थे । तो मैंने भी प्रतिदिन दोपहर की संध्या में नियम से पूज्य बापूजी का मानस-पूजन करना शुरू कर दिया । गुरुदेव की कृपा से इसमें इतना आनंद आने लगा कि 5 मिनट से प्रारम्भ की हुई यह मानस-पूजा धीरे-धीरे 10 मिनट, 20 मिनट, 30 मिनट और कभी-कभी तो एक घंटे तक चलती । मुझे हर क्षण गुरुदेव की निकटता का एहसास होता था ।

मैं मानसिक रूप से ट्रकें भर-भर के गुलाब व मोगरे के फूल लाता तथा जिन रास्तों पर बापूजी टहलते थे उनकी दोनों तरफ कंधे के बराबर ऊँचाई तक सजा देता था ताकि गुरुदेव को खूब आह्लाददायिनी व मस्तिष्क-पोषक सुगंधि आये । मन-ही-मन रास्ते पर गुलाबी रंग का बढ़िया मुलायम कालीन बिछाता था । फूल रास्ते पर इसलिए नहीं बिछाता था क्योंकि सत्संग में सुना था कि ‘फूल पैरों में नहीं आने चाहिए ।’

मैं भावना करता कि पूज्य बापूजी पधार रहे हैं । फिर पूज्यश्री को आसन पर बैठाता और स्नान कराके, अभिषेक आदि करके दैनंदिन उपयोग की एवं अलौकिक वस्तुएँ भी अर्पित करता । फिर मन-ही-मन देखता कि बापूजी अब अपने सद्गुरुदेव यानी हमारे दादागुरुजी साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज का पूजन कर रहे हैं तो मैं भी उसमें बापूजी की मदद करने लग जाता । इसमें बहुत ही आनंद आता था ।

एक बार मैं आश्रम में, जहाँ मेरी सेवा थी वहाँ बैठकर नित्य-नियम की तरह दोपहर की संध्या में मानस-पूजन कर रहा था । पूजन करते-करते मुझे यह भाव आया कि पूज्य बापूजी टहलते हुए आ रहे हैं और मैं रास्तों की सजावट पूरी करके रास्ते में एक तरफ खड़ा हूँ । पूज्य गुरुदेव आये और मैं उनसे वार्तालाप करने लगा । यह सब मेरे मानस-पूजन में चल ही रहा था कि इतने में मेरे फोन की घंटी बजी ।

मानसिक पूजन में रसमय होने से मैंने दो बार फोन नहीं उठाया । तीसरी बार घंटी बजने पर ‘कोई जरूरी सेवा होगी’ ऐसा सोचकर फोन उठाया । वह फोन पूज्यश्री के निकटवर्ती सेवक का था । उन्होंने कहा : ‘‘तुम्हें बापूजी याद कर रहे हैं, तुरंत वाटिका आ जाओ ।’’ मेरा हृदय गद्गद हो गया । वाटिका से लगभग 3.5 कि.मी. दूर आश्रम में बैठकर मैं मानसिक रूप से गुरुदेव से बात कर रहा था और वहाँ प्रत्यक्षरूप से वे अंतर्यामी मेरे भावों को ग्रहण कर रहे थे, मुझे सुन रहे थे । मैं श्रीचरणों में उपस्थित हुआ । बहुत दिनों की अभिलाषा थी कि ‘पूज्यश्री के श्रीचरणों में बैठकर कोई शास्त्र पढ़ूँ ।’ मेरी यह भावना भी उन अंतर्यामी से छुपी नहीं थी । जो सेवक बापूजी के पास उस समय शास्त्र पढ़ रहे थे उनसे गुरुदेव ने कहा : ‘‘इसको दे, यह पढ़ेगा ।’’ मुझे तो ऐसा लग रहा था कि मैं कहीं स्वप्न तो नहीं देख रहा हूँ ! पढ़ते समय थोड़ा डर लगा लेकिन गुरुदेव की सरलता, सहजता, विनोदी स्वभाव देख के एवं मातृवत् स्नेह पाकर मेरा डर खत्म हो गया और मैंने संकेतानुसार श्री योगवासिष्ठ महारामायण एवं ऋषि प्रसाद का वाचन किया । गुरुदेव का मार्गदर्शन मिला । नजदीकी सेवा की मनोकामना भी पूरी हुई ।


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Such worship and call surely reaches Gurudev


Mental worship, but direct result


We have an ancient tradition of SatGuru Worship in our holy culture. Worship of SatGuru is the worship of His knowledge, ideals, truth, realisations and thoughts; and of Supreme Brahman, Supreme-Self. The description of Guru-worship and service to Guru performed by Lord Rama and Lord Krishna is found in the Ramayana and Shrimad Bhagawat respectively.

Lord Shiva says,


गुरुरेको जगत्सर्वं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ।

गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्सम्पूजयेद् गुरुम् ।।


“The entire cosmos inclusive of Lord Brahma, Lord Vishnu, and Lord Shiva is subsumed in the Guru. There is nothing greater than Guru. Therefore one should worship his Guru.”


Pujya Bapuji, in his Satsang discourse, says, “Guru Purnima means the festival of worshipping SatGuru. Even Chhatrapati Shivaji worshipped his Guru ceremoniously on the day of Guru Purnima. However, it is impossible today for everyone to bathe the Guru, to apply tilaka on His forehead, and garland Him. Even the Guru Himself cannot prevent one from doing mental worship which gives more fruit than worship done by offering sixteen things. Everybody has the right to do mental worship.”


In the Tattvasagar Samhita, Divine sage Narada has mentioned that the mental flower (which is imagined in the mind) is the best flower. He told Indra, the king of the Devas, that the fruit obtained by offering thousands of crores of real flowers is obtained by offering a single mental flower. This is why a mental flower is the best flower. Offering a mental flower is also free from any sin one may incur by offering stale flowers. This is why one must enjoy the amazing bliss of offering a mentally imagined flower, while performing worship. (Offering real flowers is not forbidden. It holds importance in its own way. Flowers make the environment fragrant and nourishing, and make the mind pure and one-pointed.)


One immediately attains the result of mental worship of SatGuru. As soon as one engages oneself in it, restlessness and outgoing tendency of mind start calming down. The heart starts getting filled with amazing bliss and peace. When the Sadhaka forgets his individuality (sense of being a separate person) and gets absorbed in mental worship, then he feels the direct presence of his Guru in the same way as Mirabai experienced direct proximity of Lord Krishna, eliminating the distance of 4700 years. The worship of the Sadhaka, his words, flower of his bhava certainly reach his SatGuru even if He is thousands of kilometers away from him physically. An ashram resident Sadhaka having experienced this personally, says, “It happened around the Guru Purnima in 2007. I heard in Satsang that Pujya Bapuji used to do mental worship of His SatGurudev Pujyapada Sai Shri Lilashahji Maharaj. So I started doing mental worship of Pujya Bapuji regularly everyday during noon-sandhya. I started getting so much joy doing this by Guru’s Grace that the duration of mental worship increased from 5 minutes to 10 minutes, 20 minutes, and 30 minutes to sometimes even an hour. I felt the vicinity of Gurudev every moment.


I would mentally bring truck-loads of flowers like roses and jasmine and decorate both sides of the roads with them, about shoulder high, along which Bapuji would walk, so that Gurudev would get an extremely pleasant and brain-nourishing fragrance. I would mentally lay a pink coloured soft carpet on the way. I would not lay flowers on the way because I heard in Satsang that flowers should not be trampled under feet.


I would imagine that Pujya Bapuji was coming. Then I would offer an asana (seat) to Him. I would bathe Him, sprinkle water on Him while repeating mantra, and then offer things of daily use and also unearthly things. Then I would see in my mind that Bapuji is now worshipping His SatGurudev, our Dada Guru Sai Shri Lilashahji Maharaj, so I started helping Him in that too. This delighted me greatly.


Once, while sitting in the place of my service in the ashram, I was doing mental worship as per my daily spiritual routine during noon sandhya. While doing worship I imagined that Bapuji was strolling on the way. I stood on the roadside after finishing the decoration of the roads. Pujya Gurudev arrived and I started talking to Him. All this was going on in my mental worship and my phone rang.


I didn’t pick up the call because I was enjoying mental worship. On the third ring I picked up the phone ‘thinking that someone might have called me for some urgent seva.’ The call was from the close attendant of Pujyashri. He said, “Bapuji is calling you, come to the Vatika (where Bapuji stays) immediately.” I was overwhelmed with ecstatic emotion. The Vatika is about 3 km far from the Ashram where I was doing mental worship and He, the Antaryamin was receiving my feelings directly. He was listening to me. I presented myself at His lotus feet. I had long wished that ‘I shall read any scripture sitting at His lotus feet.’ Even this desire of mine was not hidden from that Antaryamin. Bapuji told the sadhaka who was reading out the scripture to Him at that time, “Give it to him, he will read.” I felt as if I was in a dream. I was bit scared while reading, but on seeing the simplicity, easiness and humorous nature of Gurudev, and receiving motherly love from Him my fear vanished and I read out Shri Yoga Vasishtha and Rishi Prasad as per His indication. I got guidance from Gurudev. Additionally, the wish of doing close service was also fulfilled.



[Rishi Prasad - Edition-218 - June-2019]

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