That’s how Guruvar’s Compassionate Grace showered on me!

जौनपुर (उ.प्र.) के सुरेश मौर्य (वर्तमान निवास - सूरत) लगभग 26 वर्षों से पूज्य बापूजी के सत्संग-सान्निध्य व सेवा का लाभ लेकर अपना जीवन उन्नत करते आये हैं । उनके द्वारा बताये गये कुछ संस्मरण :

सन् 1990 में इलेक्ट्रॉनिक्स का डिप्लोमा करने हेतु मैं सूरत आया था । पढ़ाई पूरी होने के बाद मुझे एक दुकान पर जॉब मिला । दुकान के मालिक बापूजी से जुड़े थे । उनके घर के सभी लोग बापूजी से दीक्षित थे व पूजा-पाठ करते थे, मौन भी रखते थे । साधना की रक्षा के लिए वे नियम-निष्ठा में बहुत मजबूत थे, जिस-किसीके घर खाते-पीते नहीं थे । यह सब देख मुझे लगता था कि ‘ये किस जमाने के लोग हैं ! यह नहीं करना, वह नहीं खाना... क्या-क्या बातें पकड़ के रखते हैं !’ तब वह सब मेरी समझ में नहीं बैठ पाता था । बापूजी से जुड़ने के बाद मुझे पता चला कि साधन-भजन का सात्त्विक प्रभाव बिखरे नहीं इसलिए खान-पान, संग, माहौल आदि की सात्त्विकता का ध्यान रखना कितना जरूरी है ।

दिसम्बर 1992 में सूरत में बापूजी का ध्यानयोग शिविर था । दुकान-मालिक के घर के आध्यात्मिक वातावरण का मेरे चित्त पर ऐसा विलक्षण प्रभाव पड़ा कि मुझे भी बापूजी के दर्शन की उत्कंठा जगी । आश्रम में पहुँचा, बापूजी के दर्शन किये व सत्संग सुना । पहले ही सत्संग ने ऐसा रंग लगा दिया कि सत्संग के बाद सब लोग तो चले गये लेकिन मुझे घर जाने की इच्छा ही नहीं हो रही थी । आश्रम के दर्शन करते-करते मैं बड़ बादशाह की तरफ चला गया । वहाँ लिखा था कि ‘श्रद्धा-भक्तिपूर्वक जो भी संकल्प यहाँ करते हैं और 7 परिक्रमा लगाते हैं, वह संकल्प फलीभूत होता है ।’

मैंने बड़ बादशाह की परिक्रमा लगायीं और बापूजी के श्रीचित्र के सामने दंडवत् हो गया । शाम हो चुकी थी । दिसम्बर महीने की कड़ी ठंड थी और मैंने गर्म कपड़े नहीं पहने थे ।

आश्रम के एक भाई मुझे उठाने लगे, बोले : ‘‘हरि ॐ ! आश्रम बंद हो चुका है, लोग जा चुके हैं, आप भी पधारिये । यहाँ किसीके रुकने की व्यवस्था नहीं है ।’’

उन्होंने मुझे दो बार उठाने का प्रयास किया लेकिन मैं वहाँ से उठा नहीं । फिर वे भाई हाथ जोड़कर कहने लगे : ‘‘भाईसाहब ! अगर आपने कोई संकल्प लिया हो तो बताइये ताकि मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँ ।’’

मैंने कहा : ‘‘मैंने संकल्प किया है कि बापूजी ! आप जब तक मुझे साक्षात् दर्शन नहीं देंगे तब तक मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा ।’’

भाई बोले : ‘‘इस समय बापूजी घूमने निकलते हैं । आप गेट से जैसे ही बाहर जायेंगे तो हो सकता है कि बापूजी के दर्शन हो जायें ।’’

मैं वहाँ से उठा और गेट के बाहर पहुँचा । मुझे एक भाई के साथ पूज्यश्री दिखाई दिये । मैं दौड़कर गया और दंडवत् प्रणाम किया ।

पूज्यश्री बोले : ‘‘कौन है ? खड़ा हो जा, कहाँ से आया है ?’’

‘‘बापूजी ! मैं यू.पी. से आया हूँ ।’’

‘‘यहाँ कहाँ रहता है ?’’

‘‘जी उधना में रहता हूँ ।’’

‘‘क्या करता है ?’’

‘‘टी.वी. सुधारने का डिप्लोमा किया है । अभी कोई स्वयं का रोजी-रोटी का साधन नहीं है ।’’

जैसे ही मैंने ऐसा कहा तो उदारहृदय, करुणास्वरूप परम पिता ने कहा : ‘‘जा, जो भी करेगा, फलीभूत होगा ।’’

फिर मैंने बापूजी को अपनी पूरी आपबीती बतायी और कहा कि ‘‘जब मेरी उम्र 10 साल की थी तभी मेरे पिताजी गुजर गये थे ।’’

पूज्यश्री बोले : ‘‘दुःखी क्यों होता है ? इस धरती पर शरीर का पिता किसका सदा रहा है  जो तेरा  रहेगा ! मेरे  पिता चले गये तो तेरे पिता कहाँ से रहेंगे ? तुझे परम पिता मिल गये न !’’

मैं बापूजी से पहली बार मिला था; न ही मैंने उनसे दीक्षा ली थी और न ही कोई जान-पहचान थी लेकिन बापूजी ने इतने अपनेपन से बात की मानो वर्षों से मुझे जानते हों । मेरी एक-एक बात पूज्यश्री सुन रहे थे और मुझे ऐसे समझा रहे थे जैसे एक पिता अपने नन्हे-मुन्ने बेटे को समझाता है । लाखों-करोड़ों माताओं के हृदयों की करुणा को मिला दो तब भी उससे सद्गुरु-हृदय की करुणा की तुलना नहीं हो सकती । शास्त्रों-संतों की यह बात मुझे बाद में सुनने को मिली पर सद्गुरु की ऐसी करुणा की झलकें तो मुझे उस समय प्रत्यक्ष मिल रही थीं ।

मैं अपने निवास पर आया । मुझे लगने लगा कि ‘अब मैं अकेला नहीं हूँ, असमर्थ नहीं हूँ । मेरे सिर पर परम समर्थ महापुरुष का कृपाहस्त है ।’ मुझे स्वयं की दुकान खोलने की प्रेरणा हुई । मैंने किराये पर एक दुकान ली ।

बापूजी की कृपा से धंधा चलने लगा और इतना फला-फूला कि मैंने स्वयं की दुकान ले ली तथा अपनी कमाई से एक बहन की शादी की, अपनी शादी की । इतना सब कुछ मुझे मंत्रदीक्षा लेने के पूर्व ही बापूजी ने दे दिया ।

सन् 2000 में मैंने पूज्यश्री से मंत्रदीक्षा ली । उसके बाद मेरे रहन-सहन, खान-पान में बहुत बदलाव आया । मैंने पूजा, जप आदि का नियम शुरू कर दिया, संसारी विकारों से थोड़ा बचने लगा तो पत्नी को लगता कि ‘यह दाढ़ीवाले बाबा ने क्या कर दिया मेरे पति को ? पहले ये कैसे थे, अब दूर भागते हैं मुझसे ।’

फिर मैंने पत्नी को समझाया कि ‘‘बापूजी तो हमारे सच्चे और परम हितैषी हैं । वे कहते हैं : बुद्धिमान नारी वही है जो पति को ब्रह्मचर्य-पालन में मदद करे और बुद्धिमान पति वही है जो विषय-विकारों से अपनी पत्नी का मन हटाकर निर्विकारी अंतर्यामी नारायण के ध्यान में लगाये । पति को विकारों में गिराना या पत्नी के जीवन को विकारों में खत्म करना - यह एक-दूसरे के सहयोगी कहलाकर एक-दूसरे के शत्रु होने का कार्य है ।’’

मैं पत्नी को पूज्य बापूजी के सत्संग की पुस्तकें आदि पढ़ने को देता, कभी-कभी आश्रम ले जाता । धीरे-धीरे उसे भी सत्संग का रंग लगा और उसने भी बापूजी से दीक्षा ले ली । आज उसे भी गुरुसेवा का अवसर मिल रहा है । वह हर वर्ष ‘भक्ति जागृति प्रचार यात्रा’ में भी जाती है ।

अभी सूरत में स्वयं का मकान है, प्लॉट है, मेरी 2 बच्चियाँ एम.सी.ए. कर रही हैं । घर के सभी लोगों ने पूज्यश्री से मंत्रदीक्षा ली है । सभी खुशहाल हैं । बापूजी की इतनी कृपा है जिसका मैं बयान नहीं कर सकता ।

(सुरेशभाई को गुरुसेवा के दौरान गुरुदेव की करुणा-कृपा को साकार रूप में देखने के कई अवसर मिले । ऐसे कुछ हृदयस्पर्शी प्रसंगों को पढ़ने हेतु प्रतीक्षा करें अगले अंक की ।)


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That’s how Guruvar’s Compassionate Grace showered on me!

Suresh Maurya from Jaunpur (UP), currently residing in Surat, has been elevating his life for almost 26 years after having the benefit of Pujya Bapuji’s proximity, satsang and service. Sharing his experience pertaining to Pujyashri’s compassionate grace, he reminisces:


I came to Surat in 1990 to pursue a diploma in Electronic Engineering. After completing my studies I found a job in a shop. The shopkeeper was associated with Bapuji. I saw Bapuji’s holy picture there. All of his family-members would perform worship and read scriptures regularly; and would observe mauna (silence). They were quite strict and particular about the observance of daily spiritual routine for the protection of their sadhana; and that they wouldn’t eat or drink anything at anybody’s place. Noticing all this, I would wonder – ‘To which era do these people belong … Shouldn’t do this, shouldn’t eat that food– What traditional beliefs have they been holding on to?’ I couldn’t figure anything out at that time. However, after becoming associated with Bapuji, I came to know – how important it is to be careful about purity in food and drink, company and environment in order to preserve purity of mind, obtained by doing sadhana and devotional practices.

 

The following incident dates back to December 1992, during Bapuji’s Dhyana Yoga Shivir in Surat. The spiritual vibes of the shopkeeper’s house exercised such an extraordinary influence on my mind that even I developed a yearning for having Bapuji’s darshan. I asked a gentleman for the ashram address and set out. Upon reaching the ashram, I had Bapuji’s darshan and listened to His satsang discourses. I was so deeply imbued with the very first satsanga that I didn’t feel like leaving and going home even after everyone else had left. Seeing different parts of the ashram, I walked towards Barh-Badshah (consecrated Banyan tree). There was a board that said – ‘Any wish or resolve, when made here with full faith and devotion, followed by 7 circumambulations of Barh-Badshah, comes to fruition.’

 

I circumambulated the Barh-Badshah and prostrated before Bapuji’s Holy photo. Dusk had already fallen. It was the severe cold of December and coincidentally, I hadn’t put on any warm clothes.


One of the resident sadhaka-brothers of the Ashram came over to me and started rousing me saying – “Hari Om! The Ashram is closed now, people have already left; so, you too please go. We don’t have any accommodation arrangements here.”


He tried to rouse me twice, but I didn’t move. Folding his hands, the brother said: “Brother! If you have made a resolve, please do let me know so that I may be of some help to you.”

 

I said: “My resolve is – ‘Bapuji! Until and unless you appear directly in front of me, I won’t leave here.’”

 

 

The brother said: “Bapuji generally comes out for a stroll around this time. So, as soon as you walk out of the gate, it’s quite possible that you could have Bapuji’s darshan.”

 

I got up and walked to the exit gate. There I saw Pujyashri along with another brother. I went running (towards them) and prostrated before Him.

 

Pujyashri said, “Who are you? Just get up, where do you come from?”

 

“Bapuji! I have come from U.P.”

 

“Where do you reside here?”

 

“Ji, I live in Udhana.”


“What is your profession?”


“Bapu! I have done a diploma course in TV repairing. But I don’t have any independent source of income as yet.”


As soon as I said this, the big-hearted icon of compassion, supreme father said, “Go, whatever business you start, will flourish.”


Then sharing my life story with Bapuji, I said, “I lost my father at age 10.”


Pujyashri said, “Why do you lament? Who on the earth has his/her father live forever! When even my father departed this life, how can your father live forever? Now you have found your Supreme Father, haven’t you!”


That was the first time I saw Bapuji; I had neither taken Diksha (mantra initiation) from Him, nor had I any prior acquaintance with Him; yet, He spoke so cordially with me as if He had known me for years. Pujyashri was listening quite attentively to every single word of mine; and was explaining to me in the way a father would do to his child. The compassion of tens of millions of mothers cannot stand in comparison with that of the SatGuru. It was some time later that I got to hear of this fact as mentioned in the scriptures and as quoted by the saints; however, I was already getting direct glimpses of such compassion of SatGuru. I returned home and started to realise – ‘I am not alone or incapable anymore. I have the gracious hand of the supremely mighty Mahapurusha (my SatGuru) on my head. I was inspired to start a shop of my own and subsequently rented a shop.


With the grace of Bapuji, the business started running well and flourished so much that I bought a shop of my own. I conducted the wedding of one of my sisters, and later my wedding, with my own earnings. Bapuji had blessed me with so much, even before I took Mantra-Diksha from Him.


I took Mantra-Diksha from Bapuji in 2000. It brought about a lot of changes in my lifestyle, eating habits, etc. I started practicing the spiritual routine of worship, mantra-japa, etc. And when I started to refrain from carnal pleasures, my wife would wonder – ‘What has this bearded Baba done to my husband? He was quite different earlier, and now he runs away from me.’

 

Then I explained to my wife, “Bapuji is our true and supreme well-wisher. The woman, who assists her husband in the practice of Brahmacharya is verily the wise one; and the husband, who diverts his wife’s mind from sense pleasures to meditation on the antaryamin (inner ruler), God, Who is free from lust, is verily the wise one. It is an act of enmity in the name of co-operation to bring one’s spouse down in carnal pleasures.”

 


I would give the books based on Pujya Bapuji’s satsanga to my wife and would take her to the ashram. Over a period of time, she too got imbued with satsanga; and later, received Diksha from Bapuji. Today, even my wife is availing the opportunity of participating in Guru-Seva. Every year, she participates in the ‘Bhakti Jagriti Prachar Yatra’ (a procession for devotional awakening). Now I own a house and a plot in Surat. My two daughters are pursuing their M.C.A. course; and everyone in my family has taken Mantra-Diksha from Bapuji. All are leading a happy life. I have been so blessed with Bapuji’s grace that I can’t express in words.


(Suresh Bhai reminisces about having experienced Guruji’s compassionate grace in material form quite a lot of times during Guru-Seva. Wait until the next issue for the relevant heart-touching incidents.) 



[Rishi Prasad -ISSUE315-March-2019]

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