What an ocean of compassion, affectionate to devotees and care taker is my Gurudev!

What an ocean of compassion, affectionate to devotees and care taker is my Gurudev!

कैसे करुणासिंधुभक्तवत्सलयोगक्षेम-वाहक हैं मेरे गुरुदेव !

‘दूरद्रष्टा, करुणासिंधु, ब्रह्मवेत्ता हैं मेरे गुरुदेव !’ गतांक से आगे

धोलापाणा (जि. अरवल्ली, गुजरात) के कनुभाई तराल पूज्य बापूजी के और भी कुछ रोचक, विस्मयकारी जीवन-प्रसंग बताते हैं :

एक सेवफल ने कर दिया दुगना वजन

पहले मेरा शरीर बहुत दुर्बल एवं पतला था, केवल 45 किलो वजन था । एक बार पूनम के दिन गुरुदेव के दर्शन हेतु लाइन में खड़ा था । बापूजी मधुर मुस्कान देते हुए मुझसे बोले : ‘‘हमारा शिष्य ऐसा कैसा लगता है ! (अपनी ओर इशारा करते हुए) ऐसा बन ऐसा !’’

पूज्यश्री ने बड़ी मौज में आकर प्यार से मेरी ओर एक सेवफल फेंका और बोले : ‘‘चल ले ! यह खा जा, बन जायेगा ।’’

मैंने वह प्रसाद खाया । कुछ ही महीनों में मेरा वजन 90 किलो हो गया । वजन बढ़ने के साथ शरीर में जो दुर्बलता थी वह भी दूर हो गयी । मैं अब भी लगातार 72 घंटे काम कर सकता हूँ । मुझे कितना भी पैदल चलने या काम करने पर कोई थकान महसूस नहीं होती ।

...और चोर ही सच्चाई बोलने लगा

मैंने सन् 1990 में जब हर पूनम पर पूज्य बापूजी के दर्शन करने का व्रत लिया उसी समय हर रविवार को मौन रखने का भी नियम लिया था ।

एक बार मैं पूनम-दर्शन के लिए वडोदरा से दिल्ली जा रहा था । रेलगाड़ी में जेबकतरे ने एक व्यक्ति का बटुआ चुरा लिया । उस व्यक्ति के शिकायत करने पर पुलिसवाले आये और एक-एक की जाँच करने लगे ।

उस दिन रविवार था अतः मेरा मौन-व्रत था । पुलिसवाले मेरे पास आये पर मैंने मौन नहीं खोला । मैं पेन निकाल के लिख के बताने ही वाला था इतने में एक पुलिसवाला मुझे चोर समझ के मारने लगा । चोर पकड़ा गया ऐसा समझ के और 2-4 पुलिसवाले आ गये । इतने में गुरुदेव की ऐसी लीला हुई कि खुद चोर ही बोल पड़ा : ‘‘अरे ! इसको मत पीटो । बटुआ मैंने चुराया है, यह देखो ।’’ सच्चाई सामने आने पर पुलिसवालों ने मुझसे माफी माँगी ।

कैसे भक्तवत्सल हैं पूज्य गुरुदेव ! मेरा मौन-व्रत था तो पूज्यश्री ने चोर के मुँह से बुलवा दिया । गुरुदेव की कृपा से आज भी मेरा मौन-व्रत का नियम निरंतर चल रहा है ।

नियम, व्रत की महिमा समझाते हुए पूज्यश्री सत्संग में बताते हैं कि ‘‘व्रत का फल होता है निष्ठा । आपकी निष्ठा दृढ़ हो तो कोई भी विघ्न-बाधा या मुसीबत आपके संकल्पबल से दूर हो जायेगी । आपके जीवन में कोई-न-कोई व्रत-नियम होना चाहिए । इससे आपका मनोबल दृढ़ होगा ।’’

दो ही शिविर हुए थे और...

1997 की बात है । मेरी शादी को 4 साल हो गये थे पर मेरे घर कोई संतान नहीं थी । डॉक्टरों ने मेरी पत्नी को गर्भाशय की गम्भीर समस्या बतायी और कहा : ‘‘इनको बच्चा नहीं हो सकता ।’’

मैं बापूजी के दर्शन करने जाता था लेकिन मन में कुछ माँगने की इच्छा नहीं होती थी । एक बार मैंने गुरुदेव के सत्संग में सुना कि ‘जिनको संतान चाहिए, वे 3 ध्यानयोग शिविरों में भाग लें । उनके लिए अलग से मंत्र देंगे ।’ फिर तो हम लोग शिविर में जाने लगे । दो शिविर ही हुए थे और मेरी मनोकामना पूरी हो गयी । मुझे एक लड़की हुई, बाद में दो लड़के और हुए । आज भी सब स्वस्थ हैं ।

रख मूँछ पर हाथ !

विद्यालय दनादन चलेगा...

जून 2003 में एक पार्टनर के साथ मैंने मेघरज (जि. अरवल्ली) में एक स्कूल शुरू किया, जिसका नाम रखा ‘श्री हरि ॐ विद्यालय’ । पहले ही साल के.जी. से लेकर 5वीं कक्षा तक 211 बच्चे भर्ती हुए ।

मैंने स्कूल की सभी कक्षाओं में पूज्य बापूजी के कैलेंडर लगाये थे । पार्टनर को यह मंजूर नहीं था, उसने मुझसे कहा : ‘‘स्कूल में कहीं पर भी बापूजी का कैलेंडर नहीं लगेगा और न ही उनका फोटो लगेगा और ‘हरि ॐ’ बोलना बंद कर दो ।’’

मेरे लिए यह सम्भव नहीं था । मैंने सोचा कि ‘अगर अपने विद्यालय में बापूजी का श्रीचित्र नहीं लगा सकते तो ऐसा विद्यालय चलाने की कोई जरूरत ही नहीं है ।’

कुछ दिनों बाद उस पार्टनर ने अधिकांश शिक्षकों को अपने पक्ष में कर दूसरा विद्यालय खोल दिया और घोषणा कर दी कि ‘‘जो ‘हरि ॐ विद्यालय’ से लीविंग सर्टिफिकेट (विद्यालय छोड़ने का प्रमाणपत्र) लायेंगे, उन्हें हम मुफ्त में पढ़ायेंगे ।’’

हमारे विद्यालय के 211 में से 172 बच्चे व 10 में से 9 शिक्षक उनके स्कूल में चले गये । अब मेरे विद्यालय की आमदनी बहुत कम हो गयी और खर्च तुलनात्मक रूप से कम नहीं हुआ, जिससे मुझ पर बहुत कर्जा हो गया । मुझे रोना आया कि ‘अब विद्यालय बंद करना पड़ेगा... ।’

मैंने पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना की : ‘हे गुरुदेव ! विद्यालय का नाम आपके नाम से जुड़ा हुआ है । मुझसे जो भी गलती हो गयी हो, मुझे क्षमा कर दीजिये । अब आप ही रास्ता दिखा सकते हैं ।’

भक्तों के योगक्षेम का वहन करनेवाले गुरुदेव ने मेरी पुकार सुन ली । 4 फरवरी को अचानक सुबह मोडासा आश्रम से फोन आया कि ‘बापूजी मोडासा आश्रम में रुके हैं । यहाँ से पूज्यश्री मेघरज होते हुए राजस्थान जा रहे हैं ।’

मैं सुबह इस सोच में पड़ा था कि ‘बापूजी को कैसे मिलूँगा ? ऐसे ब्रह्मज्ञानी महापुरुष के सामने इतनी छोटी, लौकिक बात कैसे बताऊँगा ?’ और कुछ ही मिनटों बाद जो आश्चर्य देखा उसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी । मैंने देखा कि पूज्य गुरुदेव की गाड़ी मेरे स्कूल के बाहर खड़ी है ! मैं तुरंत दौड़ा ।

बापूजी ने लोगों से पूछा : ‘‘इस विद्यालय का मुखिया कौन है ? उसे बुलाओ ।’’

पता चलने पर बापूजी ने मुझसे पूछा : ‘‘कितने बच्चे पढ़ते हैं विद्यालय में ? कितना शुल्क लेते हो ?’’

‘‘189 विद्यार्थी पढ़ते हैं । कक्षा के अनुसार 1400 से 1700 रुपये के बीच फीस लेते हैं लेकिन 50 प्रतिशत बच्चे गरीब होने से उनको निःशुल्क पढ़ाते हैं ।’’

‘‘इतने कम शुल्क में यह विद्यालय कैसे चलता है ?’’

‘‘बापूजी ! यहाँ पर इससे अधिक शुल्क लेने पर बच्चे नहीं आते । मुझ पर बहुत कर्जा हो गया है । मेरी ताकत नहीं है कि मैं यह विद्यालय चला पाऊँ । मेरे आगे-पीछे कोई नहीं है । अब यह विद्यालय आपको समर्पित करता हूँ ।’’

पूज्यश्री थोड़ी नाराजगी दिखाते हुए बोले : ‘‘क्या आगे-पीछे कोई नहीं है ! तूने मुझे विद्यालय दे दिया और मैंने ले लिया । अब यह मेरा हो गया और मैं तुझे देता हूँ । यह तुझे ही चलाना है, तुझे ही सँभालना है, रख मूँछ पर हाथ ! विद्यालय दनादन चलेगा, टनाटन चलेगा ।’’

फिर बापूजी बोले : ‘‘कितना कर्जा है ? कितना पैसा चाहिए ?’’

मैंने कहा : ‘‘6 लाख रुपये का कर्जा है, बस इतने ही चाहिए ।’’

फिर बापूजी थोड़े शांत हो गये और बोले : ‘‘6 लाख मिलेंगे तो तेरा पूरा कर्जा खत्म हो जायेगा न ?’’

‘‘हाँ जी ।’’

‘‘ठीक है, आश्रम से पैसे ले लेना, मैं बोल देता हूँ । आश्रम से जुड़े रहना, कोई भी तकलीफ हो तो आश्रम तुझे मदद करेगा ।’’

फिर पूज्यश्री ने प्राचार्य के हाथों में सभी बच्चों को बाँटने केलिए प्रसाद दिया ।

मुझे आश्रम से 6 लाख रुपये की मदद मिली । आज गुरुकृपा से विद्यालय 12वीं तक चलता है । कुल 500 बच्चे पढ़ते हैं और उनका परीक्षा-परिणाम भी अच्छा रहता है । इस प्रकार पूज्य बापूजी की वाणी सत्य हुई ।

पूरे विद्यालय में बापूजी के कैलेंडर लगे हैं । बच्चे बापूजी का लॉकेट पहनते हैं । कोई भी बड़ा कार्यक्रम होता है तो मान्यवरों की उपस्थिति में हम बापूजी का बड़ा श्रीचित्र लगाते हैं, श्री आशारामायणजी का पाठ करते हैं, आरती करते हैं उसके बाद ही कार्यक्रम की शुरुआत करते हैं । आज भी पूरे विद्यालय के शिक्षक एवं आसपास के क्षेत्र के लोग बापूजी के लिए सद्भाव रखते हैं ।

श्री हरि ॐ विद्यालयके सभी बच्चे हमेशा उत्तरायण शिविर पर अहमदाबाद आश्रम में आते थे । एक बार हम 8 बड़ी गाड़ियाँ भर के बच्चों को ले के गये थे । उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी तो लगभग 500-600 बच्चों की खाने-पीने, रहने की व्यवस्था आश्रम की ओर से निःशुल्क हुई थी ।


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What an ocean of compassion, affectionate to devotees and care taker is my Gurudev!


(Continuation of the previous article - An ocean of compassion, a visionary, and the King of Yogis is my Gurudev)


One apple doubled my weight


My body was very weak and thin. My weight was just 45 kg. Once, on a full moon day, I was in the queue to have Bapuji’s darshan. Bapuji said to me with a sweet smile on his face: “Why should my disciple look like this!” Then (indicating towards himself) he said, “Be like this!”


Pujyashri became ecstatic and threw an apple affectionately towards me and said: “Take it! Eat it, and you will become what I said.”

I took the prasadam. Within a few months, my weight increased to 90 kg. Due to the increase in body weight, the weakness of my body also went away. Even now I can work for 72 hours continuously. No matter how much I walk or work, I don’t feel tired at all.


And the thief started telling the truth…


When I took the vow of having darshan of Pujya Bapuji on every full moon day, I also took the vow of silence (to observe mouna) on every Sunday.


Once, I was travelling from Vadodara to Delhi by train to have Bapuji’s darshan on a full moon day. A pickpocket stole a person’s wallet. After the complaint was reported, the police arrived and started to interrogate each and every one.


It was a Sunday, the day of observing silence for me. A Policeman came to question me but I didn’t break the vow of silence. I was about to write down my innocence after taking out my pen, but the policeman suspected me of theft and started beating me. Realising that the thief was caught, the other 2-4 policemen also came towards me.


Meanwhile Gurudev played such a lila that the thief blurted out, “Oh! Don’t beat him. I stole the wallet; see it is here.” When the truth was revealed, the policemen apologized to me.


How affectionate Gurudev is to His devotees! Gurudev made the thief confess, as I was observing the vow of silence. With Gurudev’s grace I have been observing the vow of mouna continually to this day.


Pujyashri mentions about the glory of the vow (Vrata) in His satsang discourses, “The fruit of Vrata is devotedness. If you are firmly devoted, any obstacle, hurdle or trouble you encounter will be removed by your willpower. You should observe one or the other Vrata in your life. It will strengthen your willpower.”


Only two camps were attended…


This incident occurred in 1997. I did not have a child despite leading a married life for 4 years. The doctors said that my wife had a serious uterine problem and hence, could not conceive a baby.”


I used to visit Bapuji (for darshan) but did not like to ask for anything. Guruji, once said in his Satsang, “The childless couples desirous of a child should attend three Meditation camps. If anyone wants to have a baby, a special mantra will be given to them.” We started to attend the camp. My wish was fulfilled after attending only two camps. I fathered a baby girl, followed by two baby boys. All of them are healthy.

Preen your moustaches!


The school will run with booming success…


I, along with a partner started a school in June 2003, named it ‘Shri Hari Om Vidyalaya’ in the village Megharaj, Distt. Aravalli. In the first year, 211 students (from K.G. to grade five) were admitted.


I hung Pujya Bapuji’s calendar in every classroom. My partner didn’t like it. He said, “Bapuji’s calendar or photo will not be hung anywhere in the school. Stop saying ‘Hari Om’.”


It was impossible for me to follow his order. I thought: “It is not necessary at all to run a school in which we cannot hang a photo of Bapuji.”


After a few days, my partner tried to bring disgrace to the school. He formed a majority group of teachers by persuading them to favour him, and opened another school and announced that anyone with a school leaving certificate from the ‘Hari Om Vidyalaya’ would be given free education in his school up to grade 12.


After this announcement, 172 out of 211 students and 15 out of 16 teachers went to his school. So, a accrued a huge debt because my income was greatly reduced but the expenses remained the same. I broke into tears with the thought: “Now I shall have to shut down the school.”


I prayed to Gurudev: ‘O Gurudev! The name of the school is connected with your name. Please forgive me for whatever mistake I might have made. Now only you can show me the path, Gurudev!’

 

Gurudev, Who arranges for securing what His devotees lack and preserving what they have, heard my prayer. On the morning of February 4th, I received an unexpected phone call from Modasa Ashram mentioning that Bapuji stayed in Modasa Ashram. He would be travelling to Rajasthan, via Meghraj from there.

 

I was puzzled in the morning: ‘How shall I meet Bapuji? How shall I mention such a trivial worldly matter to such a Self-realized Great Man?’ And the miracle I saw after a few minutes was just beyond my imagination. I saw Pujya Bapuji’s car halting outside my school! I ran out immediately.

 

Bapuji asked the people: “Who is the director of this school? Call him.”

 

Bapuji asked me: “How many students study here? What fees do you charge?”


I replied: “189 students study here. The fees are between 1400 to 1700 rupees depending on the class but we give free education to 50% of the students who are poor.”

 

“How does this school run with such low fees?”, Bapuji asked.


“Bapuji! Students do not come here if I charge more. I have accrued a huge debt. I am not capable of running this school. No one is here to support me. Now I offer this school to you.”


Showing some displeasure, Bapuji said: “How do say that there is no-one to support you? You have given the school to me and I have accepted it. Now it is mine and I give it back to you. You will have to run it; you will have to manage it. Preen your moustaches! The school will run with booming success.”


Then Bapuji asked: “How much debt have you incurred? How much money do you need?”


I replied: “I am in debt to the tune of 6 lakhs; I just need that much.”


Then Bapuji became calm for some time, and said: “Will 6 lakhs be enough for the repayment of your entire debt?”


“Yes.”


“Okay, get the money from the Ashram. I shall tell them. Keep in touch with the Ashram. The Ashram will help you with any problems.”

Then Pujyashri gave Prasadam to the principal to distribute among all the students.


I received 6 lakhs rupees as aid from the Ashram. Now, the school runs grades up to 12 with Guru’s grace. A total of 500 students study here and their results are also good. This is how the words of Pujya Bapuji came true.


The calendars of Bapuji are hung in the entire school. Students wear Bapuji’s locket. Whenever a big function is held in the school, we display a big photo of Bapuji, recite Shri Asharamayanaji, perform Aarati and then start the programme. The teachers and the local people have good feelings towards Bapuji.


All the children studying in ‘Shri Hari Om Vidyalaya’ attended the Uttarayana Shivir regularly. Once, we took eight big vehicles to take the students to the ashram.


The ashram provided food and accommodation facilites to around 500-600 children free of charge because their economic status was not good.


 


[Rishi Prasad January 2019-Issue-314]

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