An ocean of compassion, a visionary, and the King of Yogis is my Gurudev
Ashram India

An ocean of compassion, a visionary, and the King of Yogis is my Gurudev

दूरद्रष्टा, करुणासिंधु, ब्रह्मवेत्ता हैं मेरे गुरुदेव !

गुजरात के अरवल्ली जिले के धोलापाणा गाँव के कनुभाई तराल (संचालक, श्री हरि ॐ विद्यालय, मेघरज, जि. अरवल्ली) सन् 1988 से पूज्य बापूजी का सत्संग-सान्निध्य पाते रहे हैं । प्रस्तुत हैं उनके द्वारा बताये गये पूज्य बापूजी के कुछ विस्मयकारी, रोचक जीवन-प्रसंग :

मेरी वर्षों की खोज पूरी हुई

मैं मंत्रदीक्षा से पूर्व आध्यात्मिक साहित्य पढ़ता था इसलिए इस बात का ज्ञान तो था कि जीवन में गुरु एक ही होने चाहिए और वे भी समर्थ सद्गुरु हों । सद्गुरु की खोज करते-करते मैंने 3-4 गुरु किये, किसी गुरु से कंठी भी पहनी थी लेकिन बिना सद्गुरु के मन में संतुष्टि नहीं थी, जीवन में कोई आनंद, कोई रस नहीं था ।

एक साधक द्वारा मुझे पूज्य बापूजी के बारे में पता चला तो मैं अहमदाबाद आश्रम में हो रहे शिविर में गया । जब मैंने पूज्यश्री के दर्शन किये तो मुझे ऐसी अपूर्व आनंदमय अनुभूति हुई, जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता । मेरा रोम-रोम झंकृत हो गया । मेरा भटकता हुआ चित्त ठहर-सा गया और अंदर से आवाज आयी कि ‘यही वह मंजिल है, जिसे मैं वर्षों से खोज रहा था । यही मेरा आखिरी ठिकाना है ।’ मैंने उसी समय निश्चय कर लिया कि ‘ये ही मेरे सच्चे सद्गुरु हैं । आज के बाद कोई दूसरे गुरु नहीं करूँगा ।’ और उसी शिविर में मैंने पूज्य बापूजी से सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा ली ।

मैं घर आकर आश्रम के सत्साहित्य व पूज्य गुरुदेव के सत्संग की कैसेटों आदि का वितरण तथा उनकी महत्ता समझाना आदि सेवा करने लगा । उससे मन में बड़ा आनंद आने लगा । सारस्वत्य मंत्रजप के प्रभाव से पढ़ाई में भी अच्छे मार्क्स आने लगे थे । आगे चल के मैं शिक्षक बना और गुरुकृपा से मेरी उत्तरोत्तर पदोन्नति होती गयी ।

एक दिन ऐसा आयेगा...

सन् 1992 में मैंने पूज्य बापूजी से गुरुमंत्र की भी दीक्षा ले ली और हर पूनम को पूज्यश्री के दर्शन का व्रत ले लिया । सन् 1994 की बात है । मुझे पता चला कि बापूजी का पूनम-दर्शन हरिद्वार में है । वहाँ पहुँचा और पूज्य बापूजी के निवास-स्थान पर जाने का विचार किया । किसीने बताया कि बापूजी का निवास ऋषिकेश में है । ऋषिकेश गया तो वहाँ पर पूज्य गुरुदेव के निवास का पता नहीं चल रहा था । उस समय यातायात व मोबाइल आदि की इतनी सुविधा नहीं थी ।

गुरु-दर्शन के लिए मैं बहुत छटपटा रहा था, बड़ा तीव्र वैराग्य था । बस, कुछ भी करके बापूजी की एक झलक पाने की लालसा थी । मैंने बापूजी से प्रार्थना की : ‘गुरुदेव ! मैंने सब प्रयास कर लिये, अब आप ही मुझे अपने तक पहुँचने का मार्ग दिखाइये ।’ और संकल्प करके बैठ गया कि ‘अगर रात को 12 बजे तक बापूजी के दर्शन नहीं हुए तो शरीर गंगाजी में अर्पण कर दूँगा ।’ आधे घंटे बाद ही मुझे जोर का पेशाब लगा जबकि मैंने उस दिन पानी तक नहीं पिया था । मैं पेशाबघर में गया तो मेरी नजर दीवाल पर लगे एक पर्चे पर पड़ी । उससे पता चल गया कि लक्ष्मण त्यागीजी के आश्रम में बापूजी का सत्संग है । उसी पर्चे में रास्ते की भी जानकारी थी ।

‘दिङ्मूढ़ की स्थिति में (जब कोई मार्ग नहीं दिखाई देता है), चित्त भ्रमित हो जाता है उस समय जिन्होंने मार्ग दिखाया उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है ।’ भगवान शिवजी के ये वचन उस दिन मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किये । किस तरह प्रेरणा करके गुरुदेव ने मुझे अपने तक पहुँचने का मार्ग दिखा दिया !

मैं 4-5 कि.मी. पैदल चलकर वहाँ पहुँच गया । वह एकांत स्थान था । कोई माइक, स्पीकर आदि नहीं था, बापूजी एक शिला पर आसन लगा के बैठे थे और साथ में 10-15 साधक भी बैठे थे ।

मैं वहाँ तक किस प्रकार पहुँचा यह सब अंतर्यामी गुरुदेव जान गये थे । पूज्यश्री मुस्कराते हुए बोले : ‘‘कैसे आया ?’’

मैंने सोचा, ‘गुरुदेव को कैसे बताऊँ कि पेशाब लगा और पेशाबघर में एड—ेस मिला... !’

मैं कुछ न बोल पाया । गुरुदेव ने मुस्कराते हुए अपने करकमलों से मुझे प्रसाद दिया और संकेत करते हुए बोले : ‘‘जितना लेना है, उतना ले लो । जितना पाना है, उतना पा लो । जो प्राप्त करना है, कर लो । एक दिन ऐसा आयेगा कि मेरा ही नहीं, मेरी धोती का भी दर्शन दुर्लभ हो जायेगा ।’’

त्रिकालज्ञानी, योग-सामर्थ्यसम्पन्न पूज्य बापूजी द्वारा सन् 1994 में की हुई वह भविष्यवाणी आज प्रत्यक्षरूप से सत्य होते देखी जा रही है । वर्तमान में भी गुरुदेव ने कई बार कहा है कि ‘‘मैं आऊँगा ।’’ तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि बापूजी बाहर आयेंगे और सबको दर्शन-सत्संगामृत की प्यालियाँ पिला के कृतकृत्य करेंगे ।

एक ही समय में दो स्थानों पर !

जब बच्चों के बीच प्रकटे बापूजी

सन् 1993 से 2000 तक मैंने वडोदरा के वनादरा गाँव में सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी की । उस समय मैं स्कूल के बच्चों को हमेशा आध्यात्मिक संस्कार मिलें इस हेतु प्रयासरत रहता था । उनको पूज्य गुरुदेव के सत्संग का लाभ मिले इसलिए विद्यार्थी शिविरों में ले के जाता था । हर गुरुवार को गाँववालों को इकट्ठा करके बच्चों के साथ प्रभातफेरी निकालता था और उसी दिन बाल संस्कार केन्द्र भी चलाता था तथा श्री आशारामायण का पाठ भी होता था ।

अनेक बच्चों को मैं पूज्य बापूजी से सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा दिलाने के लिए ले के जाता था । सन् 1993 से 2000 तक उस गाँव के कुल लगभग 1000 बच्चों को सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा का लाभ मिला । बड़े बच्चों और गाँववालों को गुरुमंत्र की दीक्षा का लाभ मिला । इस प्रकार पूरे गाँव का माहौल आध्यात्मिक बन गया । मेरे स्कूल के सभी बच्चे मिलकर दैवी कार्यों में सहभागी हो के समाजसेवा का लाभ लेते थे ।

5 जनवरी 1997 को हमने बच्चों का पावागढ़ (जि. पंचमहाल, गुज.) में एक टूर रखा था । पावागढ़ पहुँचने के बाद मेरे घर से फोन आया कि‘माँ बहुत बीमार हो गयी हैं ।’ बच्चों की मुख्य जिम्मेदारी मुझ पर ही थी । मैं धर्म-संकट में पड़ गया कि ‘क्या करूँ ?’ मैंने दूसरे शिक्षक को बच्चों को सँभालने की जवाबदारी दी और गुरुदेव से प्रार्थना की : ‘बापूजी ! अब आप ही बच्चों को सँभालिये !’

मैंने घर जाकर माँ की चिकित्सा आदि की व्यवस्था की । 2-3 दिन के बाद जब मैं स्कूल गया और बच्चों से मिला तो उन्होंने मुझसे जो कहा वह सुनकर मैं दंग रह गया !

मैंने जाते ही बच्चों से पूछा : ‘‘कोई समस्या तो नहीं आयी ?’’

उन्होंने बताया : ‘‘नहीं... समस्या किस बात की ! वहाँ तो संत आशारामजी बापू आये थे । बापूजी के साथ मजा आ गया । उन्होंने हमारे साथ फोटो भी निकलवाया ।’’

मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था क्योंकि 5 जनवरी को जिस समय बच्चों ने पावागढ़ में बापूजी के साथ फोटो निकलवाया, उसी समय डी.एन. विद्यालय, आणंद (गुज.) में बापूजी का सत्संग-समारोह चल रहा था । और सत्संग सुनने हेतु उसी गाँव (वनादरा) के कुछ लोग भी गये थे । उन लोगों से पूछा तो उन्होंने बताया कि ‘‘5 जनवरी को तो बापूजी का सत्संग चल रहा था, हम शांति से सत्संग सुन रहे थे ।’’ और बच्चों ने बताया कि ‘‘उस समय तो बापूजी हमारे साथ थे ।’’ जब मैंने बच्चों के साथवाले बापूजी के फोटो देखे तो गुरुदेव की ऐसी करुणाभरी लीला देखकर मेरा हृदय भर आया । तब से तो ऐसा लगने लगा कि सर्वत्र बापू-ही-बापू हैं !

यह घटना पूरे गाँव को पता चली तो लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ ।

करुणाकर का करुणावतार

सन् 1997 में मैं जबलपुर में पूनम-दर्शन के लिए गया था । बापूजी जहाँ रुके हुए थे वहाँ हम दर्शन हेतु गये पर गुरुदेव के दर्शन नहीं हुए । मेरे मन में थोड़ी फरियादात्मक वृत्ति आयी कि ‘हम इतने कष्ट सहकर आये और बापूजी के दर्शन नहीं हुए ।’ मैं निराश होकर सत्संग-स्थल पर दर्शन करने के लिए जाने लगा । उस समय मेरा वेतन भी कम था । रिक्शा के पैसे बचाने के लिए मैं पैदल ही चलने लगा । जैसे ही थोड़ा चला, इतने में पीछे से किसी गाड़ी के हॉर्न की आवाज सुनाई दी । गाड़ी एकदम मेरे नजदीक आ गयी । पीछे मुड़कर देखा तो उसमें पूज्य गुरुदेव विराजमान थे । मैं बापूजी के दर्शन करके बहुत आनंदित हो गया ।

बापूजी ने काँच खोला और मुस्कराते हुए पूछा : ‘‘पूनमवाला है क्या ?’’

‘‘हाँ जी ।’’

‘‘चल, गाड़ी में बैठ जा ।’’ पूज्यश्री के साथ गाड़ी में बैठने की हिम्मत नहीं हो रही थी ।

मैं हाथ जोड़कर खड़ा था । थोड़ा क्रोध का अभिनय करते हुए गुरुदेव बोले : ‘‘गुरु की आज्ञा का पालन नहीं करेगा ! चल, मैं बोलता हूँ न, बैठ जा ।’’ फिर मैं गाड़ी में बैठ गया ।

जैसे ही सत्संग-स्थल के पास गाड़ी पहुँची, बापूजी ने गाड़ी रुकवाकर कहा : ‘‘हम इधर से (व्यासपीठ की ओर जानेवाले रास्ते से) जाते हैं, तुम उधर से (पंडाल जानेवाले रास्ते से) आना और सत्संग मैं बैठ जाना ।’’

मैं तुरंत पंडाल पहुँचा । देखा कि सभी एकाग्रचित्त होकर पूज्यश्री के वचनामृत का पान कर रहे हैं । बापूजी आते हैं तो पहले ‘हरि ॐ... हरि ॐ...’ कीर्तन होता है, कुछ प्रेममयी लीला करते हैं... लेकिन वहाँ तो कुछ अलग ही माहौल था । कोई हलचल नहीं दिख रही थी । मुझे ऐसा लगा मानो घंटों से सत्संग चल रहा हो ।

मैंने धीरे से पास में बैठे एक भाई से पूछा : ‘‘भाई ! सत्संग कब से चल रहा है ?’’

वे बोले : ‘‘1 घंटे से । बस, अभी पूरा होनेवाला है ।’’

यह सुनकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा ! मैंने कहा : ‘अभी-अभी तो मैं बापूजी के साथ गाड़ी से उतरा और बापूजी एक घंटे से यहाँ सत्संग कर रहे हैं... यह कैसे सम्भव हो सकता है !’

फिर मैंने कुछ और साधकों से भी पूछा : ‘‘सही बताओ न, सत्संग कब से चल रहा है ?’’

उन्होंने भी वही उत्तर दिया । मैं 15 मिनट बैठा होऊँगा इतने में सत्संग की पूर्णाहुति हो गयी । तब मुझे निश्चय हुआ कि बापूजी ने स्वयं दो रूप धारण करके दर्शन दिये, सत्संग दिया और ऑटो के पैसे भी बचा दिये । मुझे कष्ट न पड़े इसलिए बापूजी ने स्वयं कष्ट उठाया । उस दिन के बाद मैंने निश्चय कर लिया कि ‘आज के बाद ऐसा कोई संकल्प नहीं करूँगा जिससे गुरुदेव को कष्ट हो ।’ अब तो लगता है कि हमारी कोई भी लौकिक चाह न रहे । बस, जो बापूजी चाहते हैं, जो गुरुदेव को पसंद है वही हमसे होता रहे ।    

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An ocean of compassion, a visionary, and the King of Yogis is my Gurudev

Kanubhai Taral (Director, Shri Hari Om School, Meghraj, Dist. Aravalli, Gujarat) from Dholapana village of Aravalli district, Gujarat has been availing of the Satsang (spiritual discourses) and proximity of Pujya Bapuji since 1988. We present here some interesting and amazing life incidents of Pujya Bapuji shared by him.

My search for years ended

Before getting Mantra-initiation (mantra-diksha), I would read spiritual literature, that is why I already had the knowledge that one should have only one Guru in his life who is Self-realized. In search of a SatGuru, I had made 3-4 Gurus, I even wore a rosary (kanthi, mala) given by a Guru, but without a SatGuru, I had no satisfaction in my mind. I had no peace in my life.

I got to know about Pujya Bapuji from a sadhaka and I went to the spiritual camp held in Ahmedabad Ashram. When I had darshan of Pujyashri I experienced unprecedented bliss which cannot be described. Every hair on my body was thrilled with joy. My wandering mind became still and I heard an inner voice saying, ‘this is the destination that I had been searching for all this time. This is my final destination.’ I decided then that ‘He is my true SatGuru. I shall not make any other Guru from now on.’ And in the same camp, I took Saraswatya-Mantra initiation from Pujya Bapuji.

After returning home, I began to distribute and explain the importance of the spiritual books and audio cassettes of Gurudev’s satsang discourses. Performing this service gave me great delight. By the positive influence of Saraswatya Mantra japa, I also started to get good marks in examinations. Later, I became a teacher and by the grace of Guru, I received higher and higher promotions.

Such a day will come...

I was initiated into Guru Mantra by Pujya Bapuji in 1992 and took the vow of having Pujyashri’s darshan on every full moon day. This is an incident from 1994. I found out that the programme of Pujya Bapuji’s full moon Darshan was held in Haridwar where Pujya Bapuji stayed. After arriving there, someone informed me that Bapuji’s temporary residence was in Rishikesh. I went to Rishikesh but could not find where Gurudev was staying. At that time, transport and cell phone facilities were not so good.

I was longing to have darshan of Guruji. I had intense dispassion. I had an ardent desire to have a glimpse of Bapuji at any cost. I prayed to Bapuji: ‘Gurudev! I have tried everything; now please show me the way to see you.’ I made a resolve that ‘If I don’t have darshan of Bapuji by midnight, I will offer my body to the River Ganges.’ Half an hour later I had an intense urge to urinate, even though I hadn’t drunk any water that day. When I went to a urinal, I saw a poster on the wall. It said that Bapuji would deliver Satsang discourses at the Ashram of Laxman Tyagiji. The same poster also had directions on how to get to there.

‘To one confused in the forest of transmigration regarding directions, etc., the one who shows the right path; to that Guru, be these salutations.’

I had practical experience of the above mentioned words of Lord Shiva on that day. How Gurudev had inspired me on how to get there!

I walked 4-5 km and arrived at a secluded place. There was no sound system. Bapuji was sitting on a rock on an asana and there were 10-15 disciples seated as well.

How I got there was already known to the Antaryamin Gurudev. Pujyashri asked with a smile on his face: “How did you get here?”

I thought, ‘How do I say to Gurudev that I had an intense urge to urinate and found the address in the urinal…!’

I couldn’t say anything. Gurudev gave me prasadam with his lotus hand and signaled, “Take as much (spiritual benefit) as you want. Get as much as you want. Whatever you want to attain, get it. Such a day will come when not only darshan of mine, but even my cloth (dhoti) will become extremely difficult.”

Omniscient, great Yogic power holder Gurudev, predicted this prophecy in 1994 and it has come true. Gurudev has said many times that “I shall come.” So I have implicit faith that Bapuji will come out and will make us accomplished of our goal by giving us the opportunity to have his darshan and nectar of Satsang.

Appearing in two places at the same time!

When Bapuji appeared among children

I was a teacher in a govt. school located in Vanadara, a village of district Vadodara from 1993 to 2000. I was engaged in efforts to inculcate spiritual sanskaras in the children of the school. In order to avail the benefit of Pujya Gurudev’s Satsang to them, I took them to the students’ camp. Every Thursday I gathered villagers and held a chanting procession in the morning (Prabhatferi) and ran a Baal Sanskar Kendra on the same day, when Shri Asharamayana was recited.

I took many children for initiation into Saraswatya Mantra by Pujya Bapuji. By doing so, during 1993 to 2000 around 1000 children were blessed with Saraswatya Mantra initiation. Teenagers and villagers received the benefit of Guru Mantra initiation. Likewise, the environment of the entire village became spiritual. All the students of my school participated in divine works and did social service.

On 5th January 1997, I organised a tour to Pawagarh (dist. Panchmahal, Gujarat). Upon arrival, I received a call from my home- ‘Your mother is seriously ill.’ I was the responsible person for the children and was in a very difficult situation. Unable to decide ‘what to do’, I handed over the responsibility of the children to the other teacher and prayed to Gurudev: ‘Bapuji! Now you take care of the children!’

I went home and arranged treatment for my mother. When I went to school 2-3 days later and met the children, I was astonished by what they said to me!

As soon as I arrived at the school, I asked the children, “Did you encounter any problems?”

They answered: “No… what sort of problem! Sant Asharamji Bapu came here. We had fun with Bapuji. He even took a photo with us.”

I couldn’t believe it, because the very same day the children took a photo with Bapuji, Bapuji’s Satsang programme was held at D. N. School, Anand (Gujarat). People of that village (Vanadara) also went to hear Satsang. Upon asking them, they said, “On 5th January Bapuji was giving Satsang, we were listening quietly.” The children said that “Bapuji was with us.” While seeing the photo of Bapuji with the children, my heart was overwhelmed with devotion seeing the Lila of compassionate Gurudev. Following that incident, I started feeling that Bapuji is everywhere!

When the villagers came to know of this event they were astonished.

Compassionate incarnate appears out of compassion

In 1997, I went to Jabalpur to have darshan of Bapuji on a full moon day. We went to see Bapuji where he was staying but couldn’t have his darshan. My mind had a small complaint: ‘I came bearing so many difficulties but couldn’t have Bapuji’s darshan.’ I started walking towards the satsang venue disappointed. My salary was low at that time. In order to save the rickshaw fare, I started walking. As I walked, I heard a car horn from behind. The car came very close to me. When I turned round, I saw Pujya Bapuji sitting inside. I was delighted to have Bapuji’s darshan.

Bapuji wound the car window down and asked, with a smile on his face: “Are you a full moon vower?”

“Yes.”

“Come on, get in the car.” I did not dare to sit with Bapuji in the car.

I was standing with folded hands. Acting slightly irritated, Bapuji said: “Won’t you obey Guru’s command? Come on, I am telling you, sit.” Then I sat in the car.

When we drew close to the Satsang venue, Bapuji got the car stopped, and said to me: “I shall go this way (towards the Vyasa peetham), you go that side (towards the pandal) and sit in the Satsang.”

I quickly went to the pandal. I saw everyone listening to the nectarine words of Pujyashri with rapt attention. Usually at the beginning of Satsang, when Bapuji arrives, kirtan of ‘Hari Om… Hari Om…’ is performed followed by an affectionate lila, however, the environment was different there. No movement was to be seen. I felt like Satsang had been going on for hours. I asked a person nearby in a low voice: “Brother! How long has Satsang been going on?”

He said: “An hour. It is about to finish.”

I was surprised to hear this! I said: ‘I just got out of the car here with Bapuji and Bapuji has been doing Satsang for an hour… how can it be possible!’

Then I asked some other sadhakas: “Tell me the truth, how long has Satsang been going on?” He answered the same. I might have sat there for about 15 minutes and the Satsang was concluded. Then I realised that Bapuji had taken two forms to bless me with His darshan, Satsang, and also saved my rickshaw fare. Just to save me from trouble, Bapuji himself took trouble. After that day I decided: ‘From today onwards I shall not make any resolve which could trouble Gurudev.’ Now I wish that I don’t get any worldly desire. May I just do whatever Bapuji wants, whatever Bapuji likes.


 

[Rishi Prasad Issue313-January 2019]

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