Sweet Memories of Guru’s Company
Ashram India

Sweet Memories of Guru’s Company

गुरु-सान्निध्य के मधुर संस्मरण

अहमदाबाद निवासी इंदिरा गुलवाणी पूज्य बापूजी के और भी कुछ जीवन-प्रसंग बताती हैं :

सरलता का मात्र वर्णन नहीं, पग-पग पर प्रत्यक्ष दर्शन

पूज्य बापूजी के जीवन में जितनी ब्रह्मज्ञान की ऊँचाई है उतनी ही सरलता व सहजता भी देखने को मिलती है । उन दिनों की बात है जब अहमदाबाद आश्रम में सत्संग-भवन बनने का काम चल रहा था । उस समय ज्यादा सेवाधारी नहीं होते थे । कभी-कभी पूज्यश्री स्वयं ही सेवकों के बीच पहुँच जाते और फावड़े से सीमेंट, रेत आदि का मिश्रण करके उन्हें तगारों में भर के देते थे । दीवाल मजबूत बने इसके लिए कितना और कैसा मिश्रण आवश्यक है इसका ज्ञान भी देते थे । और जब दीवाल बन जाती तब पूज्यश्री स्वयं उस पर पानी डालते थे ।

सरलता व सहजता का मात्र उपदेश या वर्णन नहीं बल्कि पग-पग पर उनका प्रत्यक्ष दर्शन यदि हमने कहीं देखा है तो वह है पूज्य बापूजी का जीवन ! हम साधकों के जीवन में दिखनेवाली सरलता हमारी विशेषता नहीं है, वह बापूजी का ही प्रसाद है ।

एक-एक कौर का है महत्त्व !

अन्न, जल आदि का बिगाड़ न हो इसका पूज्यश्री बहुत खयाल रखते हैं और अपने साधक-भक्तों को भी इसकी सावधानी बताते हैं ।

कई बार बापूजी आश्रम के रसोईघर में आ जाते थे और देखते थे कि कहीं भोजन का बिगाड़ तो नहीं हो रहा है । जरूरत से ज्यादा तो नहीं परोसा गया है । खानेवाला खा न सके और अन्न फेंकना पड़े ऐसा तो नहीं हो रहा है ।

एक बार पूज्यश्री रसोईघर में पहुँचे तो देखा कि भोजन परोसनेवाले भाई ने एक साधक को पहले का बचा हुआ भोजन खत्म न होते हुए भी ऊपर से और भोजन परोस दिया । पूज्यश्री ने देखा तो पूछा : ‘‘इसने पहले का खाया नहीं है, ऊपर से और क्यों परोस दिया ?’’

साधक : ‘‘बापूजी ! इसने माँगा था ।’’

पूज्यश्री : ‘‘तो बोलना चाहिए कि आप पहलेवाला पूरा खा लीजिये, मैं फिर से आऊँगा तब ले लीजिये ।’’

साधक : ‘‘क्षमा कीजिये गुरुदेव ! अब आगे से इस बात का खयाल रखूँगा ।’’

व्यवहार में छोटी-छोटी सावधानी रखने की भी कैसी हितभरी, कल्याणकारी शिक्षा देते हैं ये परम विद्या के दाता !

केवल साधक ही नहीं अपितु समस्त मानव-जाति का विवेक जगाते हुए पूज्यश्री अपने जाहिर सत्संगों द्वारा अन्न आदि के सावधानीपूर्वक सदुपयोग का संदेश देते हुए कहते हैं : ‘‘आप जो कौर खाते हैं वह प्रत्येक कौर किसी-न-किसीके मुँह से बचाकर, छीना-झपटी करके आप तक लाया गया होता है । जीव-जंतुओं और पक्षियों के मुँह से छीनकर अन्न आपकी रसोई तक पहुँचाया जाता है । अतः अन्न, फल, दूध एवं अन्य वस्तुओं का सदुपयोग करके कर्म को कर्मयोग बना लो । सावधान हो जाओ भैया ! समय बीता जा रहा है ।’’

व्यावहारिक वेदांत की शिक्षा

गर्मियों के दिन थे । आश्रम में आये सत्संगियों हेतु शरबत बनाया गया था । एक नया सत्संगी बाँटने की सेवा के लिए खड़ा हुआ । उसने अपने लिए चार गिलास शरबत रख लिया । थोड़ी देर बाद पूज्यश्री का उधर आना हुआ । शरबत से भरा डिब्बा देख बापूजी ने उस भाई को अपने निकट बुलाया और डिब्बे की ओर इशारा करके बोले : ‘‘अरे, इतने शरबत में तो चार लोग तृप्त हो जायेंगे । तुम यदि नियत मात्रा में शरबत लेते हो तो और तीन लोगों को यह मिलेगा । और इतना लेने से भले शरबत खूटता भी न हो लेकिन इससे तुम्हारी मनोवृत्ति निःस्वार्थ और व्यापक नहीं हो पायेगी । औदार्य सुख का तुम अनुभव नहीं कर पाओगे । दूसरों के अधिकार की रक्षा करोगे तो तुम्हें अंतरात्मा की तृप्ति का अनुभव होगा । हकीकत में दूसरों में भी तुम ही हो बेटे !’’

उस दिन व्यावहारिक वेदांत की शिक्षा उस नये सत्संगी के निमित्त से हम सभीको मिली और सेवा का परमोच्च फल क्या होता है यह भी हमें सीखने को मिला । व्यावहारिक जीवन को निमित्त बनाकर अद्वैत दृष्टि को पोषित करते हैं ब्रह्मज्ञ महापुरुष पूज्य बापूजी ।

मात्र पुरानी बीमारी ही नहीं मिटी, जन्मों-जन्मों के पाप भी धुल गये

सन् 1987 की बात है । मैं सुबह 10.30 बजे स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए घर से निकली थी । सोचा, ‘बापूजी के दर्शन करके फिर स्कूल जाऊँ ।’ मैंने दर्शन किये और निकल पड़ी ।

मैं नदी के किनारे तक ही पहुँची थी, तभी एक बहन ने आवाज लगायी : ‘‘बापूजी बुला रहे हैं, वापस आ जाओ ।’’

मैं वापस पहुँची तो बापूजी कुछ दर्शनार्थियों से विचार-विमर्श कर रहे थे ।

मुझे देख पूज्यश्री बोले : ‘‘कहाँ तक पहुँची थी ?’’

मैंने कहा : ‘‘नदी तक ।’’

फिर पूज्यश्री पुनः विचार-विमर्श करने में व्यस्त हो गये ।

पूज्यश्री को व्यस्त देख थोड़ी देर बाद मैं दोबारा निकल गयी । बापूजी ने मुझे फिर से बुलवाया । ऐसा लगभग 3-4 बार हुआ ।

तब मुझे इन बातों का इतना ज्ञान नहीं था कि गुरु जब किसीको बुलायें तो उसका कारण समझे बगैर एवं गुरु की आज्ञा लिये बिना ऐसे ही निकल नहीं जाना चाहिए । उस दिन यह भूल मेरे द्वारा 3-4 बार हो गयी । भूल तो मेरी थी लेकिन मैंने नासमझी से बापूजी के सामने खड़े-खड़े एक सत्संगी बहन को बोल दिया : ‘‘मैं रुक जाऊँ ऐसा यदि बापूजी को लगता था तो बोलते न, कि नहीं जाना है... तो मैं बैठ जाती !’’

पूज्यश्री ने यह सुन लिया तो उस सत्संगी बहन से बोले : ‘‘देखो, यह कैसी फरियाद कर रही है ! इसको ले जाकर इसके ऊपर बाल्टियाँ भर-भर के पानी डालो ।’’

माइयाँ मुझे ले गयीं । पानी की 30-40 बाल्टियाँ मेरे ऊपर उँडेली गयीं । उस परीक्षा में मैं धैर्य न रख सकी । मुझे सर्दी की पुरानी बीमारी थी, मैंने एक को झुँझलाकर अभद्र शब्द बोल दिया । बात पूज्यश्री तक पहुँची । मुझे खूब डाँट पड़ी । मुझे तब यह पता नहीं था कि ब्रह्मनिष्ठ संत जब हमारी किसी बात को निमित्त बनाकर उत्साहवर्धक वचन बोलते हैं तब यह उनकी दया है और जब वे कठोर व्यवहार करते हैं, डाँटते हैं तब यह उनकी कृपा है ।

सद्गुरु हमारी जीवन-नैया के कर्णधार हैं और उनके पास दया और कृपा - ये दो पतवारें हैं । क्या एक पतवार से जीवन-नैया को पार लगाया जा सकता है ? कदापि नहीं, लेकिन प्रायः लोग प्रेम, पुचकार, करुणा - यह दया की पतवार ही जीवन में चलती रहे ऐसा चाहते हैं और दूसरी ओर यह भी इच्छा करते हैं कि हमारी जीवन-नैया पार लग जाय । यह मानवी मन की कितनी बड़ी विडम्बना है !

हकीकत में जो उद्देश्य दयारूपी पतवार का है वही उद्देश्य कृपारूपी पतवार का भी है, प्रत्युत दया से भी अधिक महिमा कृपा की है क्योंकि दया का पात्र तो हर कोई है लेकिन कृपा के पात्र होना किसी-किसी सौभाग्यशाली के नसीब में होता है । अज्ञानवश हम कृपा के खजाने से कतराते हैं और केवल दया के पात्र होकर रहना चाहते हैं, यह कैसी आत्मवंचना है !

किसीकी भारत के संतों-महापुरुषों के प्रति दोष-दर्शन में रची-पची मूढ़ मति हो तो उसे लगेगा, ‘देखो, जिसे सर्दी की इतनी पुरानी बीमारी है उसीके सिर पर बाल्टियाँ भर-भर के पानी उँडेला गया । कितना अनुचित हुआ !’ लेकिन यदि वह आगे क्या हुआ यह जान ले तो उसका भी हृदय गद्गद होकर इन महापुरुष के श्रीचरणों में झुके बिना नहीं रहेगा ।

मैं बचपन से ही बिल्कुल ठंड नहीं सह सकती थी और तभी से मुझे सर्दी की प्रबल शिकायत थी, जिससे नाक बहती रहती थी । इससे मुझे दैनिक कामकाज में बड़ी बाधा आती थी । अनेक प्रकार की दवाइयाँ मैं ले चुकी थी, खूब उपचार करवाकर थक गयी थी लेकिन सब विफल रहा । इससे मैं बहुत परेशान रहती थी । बाद में पता चला कि कुछ व्याधियाँ पूर्व के पापों की वजह से होती हैं, जिनमें अच्छी-अच्छी दवाएँ भी बिल्कुल बेअसर साबित हो जाती हैं ।

मेरी यह समस्या गुरुदेव को पता चल गयी थी । इस घटना के बाद मुझे पता चला कि कृपासिंधु पूज्य बापूजी की उस कृपा में मेरा कितना हित छुपा हुआ था ! उस एक-एक बाल्टी पानी ने मानो दैवी औषधि का काम किया और ऐसा चमत्कार हुआ कि उस दिन के बाद मेरी बचपन से कष्ट देती आयी सर्दी की बीमारी कहाँ चली गयी मुझे पता ही नहीं चला ! मेरी नाक बहना बिल्कुल बंद हो गया । हालाँकि इस प्रकार पानी की बाल्टियाँ उँडेलना यह कोई पुरानी सर्दी ठीक करने का प्रयोग नहीं हो सकता, उल्टा इससे सर्दी बढ़ ही जानी चाहिए । फिर भी मेरी ठीक हुई तो यह तो पूज्य बापूजी जैसे ब्रह्मनिष्ठ, समर्थ महापुरुष का संकल्प-सामर्थ्य एवं उनकी कृपा का ही चमत्कार था ।

बाद में अंतर्यामी गुरुदेव बोले : ‘‘तुम्हें क्या पता, इससे तुम्हारे जन्मों-जन्मों के पाप धुल गये । तुम्हें उन पापों का फल न जाने और कितने समय तक भुगतना पड़ता !’’

सिर्फ मेरा ही नहीं, बापूजी के अनगिनत शिष्यों का यह अनुभव है कि

गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट ।

अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट ।।

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Sweet Memories of Guru’s Company

 

Indira Gulwani of Ahmedabad enumerates some more life incidents of Pujya Bapuji:

Not just preaching simplicity, but teaching by example:

Pujya Bapuji’s life displays the same simplicity and spontaneity as the height of Self-knowledge (Brahmajnana) he has attained. This relates to the days when the present Satsang hall at Ahmedabad ashram was under construction. Not many selfless servitors were available at that time. Sometimes Pujyashri Himself would go amongst the servitors and start mixing sand, water and cement with a spade and fill it into bricklayer’s troughs. He would also instruct them regarding preparing good quality mortar and how much should be used for building strong walls. Then, He would Himself water the walls once they were erected.

It is only in Pujya Bapuji’s life that we have seen not only precepts and exposition of simplicity and spontaneity, but also exemplification of these qualities at every step! Thus, the simplicity in the lives of we Sadhakas is not our distinguishing quality, but verily the gift of Bapuji.

Each Morsel of Food is Precious!

Pujyashri takes special care to prevent wastage of food, water, etc. and teaches caution about the same to His Sadhakas and devotees.

On many occasions Pujyashri would visit the kitchen cum dining hall of the ashram to make sure that food was not wasted, or served lavishly so that the person could not finish it.

Once, while visiting the dining hall, He found that a server had served food to a person who had not finished the food served earlier. Pujyashri asked: “Why did you serve him more food when he was yet to finish the food already served to him?”

Sadhaka: “Bapuji! He asked for it.”

Pujyashri: “In that case, you should have said to him: ‘Please finish the food in your plate first. You will get it when I come again.”

Sadhaka: “Please forgive me Gurudev! I shall take care of this from now on.”

How salutary and beneficial precepts for observing cautiousness in day to day life are being imparted by this Giver of the Supreme Knowledge!

Giving the right message for alerting not only sadhakas, but humanity, about observing cautiousness in consumption of food, etc., he said, “Each of the morsel of food you eat is actually taken from another’s mouth, or snatched from someone. Food materials are brought to your kitchen only by snatching them from the mouths of insects, birds and animals. Hence, you should utilize food grains, fruit, milk and other materials to transform your karma into karma-yoga. Be vigilant brother! Time is ticking away.”

Precept of Practical Vedanta

It was summer. Sherbet was prepared for the Satsangis (Satsang attendants) visiting the ashram. A novice Satsangi stood up to distribute it. He kept 4 glasses aside for himself. Sometime later Pujyashri came to that place. Upon noticing the jugful of sherbet, Bapuji called that brother and said pointing to the jug: “Hey, this is enough to satisfy the thirst of as many as four persons. If you take the sherbet in moderation, another three persons can get it. And even if by taking this much Sherbet yourself did not create a shortage thereof, it will not help you develop selflessness and broadness of mind. You will not be able to experience the joy of generosity. If you protect the rights of others, you will experience satisfaction of the inner self. As a matter of fact, you alone exist, even in other people, sonny.”

That day, all Satsangis received the precept of practical Vedanta imparted to that new Satsangi brother, along with the lesson on what actually is the supreme fruit of selfless service. Self-realized Great Man, Pujya Bapuji strengthens our vision of non-duality on the pretexts of practical life.

Got relieved of not just the chronic catarrh, but also the sins of numerous births

This happened in 1987. I left home at 10:30 am to teach the children of my school and thought of having Darshan of Bapuji on my way to the school. I had His Darshan and then left for the school.

I had hardly reached near the river, when a sister called out from behind: “Bapuji is calling you, come back.”

Upon returning, I saw Bapuji having a discussion with some visitors.

On seeing me, Pujyashri asked: “How far did you get?”

I said: “Up to the river.”

Again Pujyashri got busy in the discussion.

Seeing Pujyashri busy, I left again. Bapuji got me called back again. This happened 3-4 times.

At that time, I was unaware of the fact that that upon being called by the Guru, one should not leave without first knowing the real reason and without taking the permission of the Guru. On that day, I happened to commit this mistake 3-4 times. It was my own mistake, but while standing in front of Bapuji I happened to spoke out to a Satsangi sister: “If Bapuji wanted me to stay back, He should have asked me to do so. I would have sat down!”

Pujyashri heard this and said to the Satsangi sister: “See, how she is complaining! Take her with you and pour bucketfuls of water on her.”

Sisters took me with them. 30-40 buckets of water were poured on me. I could not observe patience in that test. Irritated, I hurled a filthy word towards a sister. It was reported to Pujyashri. I was severely rebuked. At that time, I did not know that when a Self-realised saint speaks encouraging words on any matter to us, it is actually His mercy and when he behaves sternly, and rebukes us, it is His grace.

Mercy and grace are like the two oars of our life-boat in the hands of our helmsman, the SatGuru who takes us across the torrential stream of samsara. Can the boat of life ever reach the shore with the help of just a single oar? Never. However, people often wish that only the oar of mercy comprising of love, fond words, and compassion are used in their life-boat, while still seeking their boat to reach the shore. What an irony of human mind!

As a matter of fact, both the oars of mercy and grace have the same objective; nay, grace is far more important than mercy, because while everyone is eligible for mercy, only the rarest fortunate ones are eligible for grace. Out of our ignorance, we avoid the wealth of grace and seek to remain eligible for mercy alone. What a self-deception!

Someone with a deluded mind deeply engaged in looking to the faults of Indian saints and Great Men would think, ‘So many bucketfuls of cold water are poured on the head of a patient of chronic common cold. What an improper act!’ However, if he comes to know about the result thereof, he too will bow at the lotus feet of this Great Man with deep reverence.

I had a severely restricted cold tolerance since childhood, and since then I had a terrible problem of common cold. I had a runny nose, which badly disturbed my day to day life. I had taken many types of medicines and tried many treatments but failed to get cured. I was troubled a lot by this problem. Later on I came to know that some diseases we suffer from the birth are all products of sinful actions done by us in previous lives and hence even good medicines do not have any effect.

Gurudev came to know about this disease of mine. It was only after this incident that I could realize how greatly beneficial to me was that compassionate grace of Pujya Bapuji. Water poured on my head from each bucket worked like divine medication and miraculously cured me of the chronic cold which had troubled me since childhood. My runny nose became absolutely normal. Pouring buckets of water on the head of a patient of chronic cold could not be a remedial measure. It should have worsened the cold. But it cured my cold. It was just the miracle of a Self-realised mighty Great Man Pujya Bapuji’s will power and grace.

Antaryamin Gurudeva said, “You do not know that sins committed by you in many lives have been destroyed. Only God knows how long you would have to bear the consequences of those sins!”

It is not just mine but a common experience of innumerable disciples of Pujya Bapuji that:

गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट ।

अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट ।।

  “Guru is the potter; the disciple is the unbaked pot. Guru gives shape and cures flaws, with care, protecting with palm from inside, while pounding the pot from outside.”


[Rishi Prasad issue-311-November-2018]

 

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