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Vrit Siddhi
Vrit Siddhi

 


 

पद्मपुराण में लिखा है –
"अकामान् च व्रतं सर्वं, अक्रोधात् तीर्थ सेवनं |
दया जप्य क्षमा शुद्धम्, संतोषो धन मेव च ||”
ये पद्मपुराण के त्रेपनवे खंड का साठवाँ श्लोक है | अकामान् च व्रतं सर्वं, अक्रोधात् तीर्थ सेवनं | जो कामना रहित हो गया, उसने सब व्रत कर लिए । आसक्ति को, कामनाओं को छोड़ देने से सब व्रतों की सफलता हो जाती है । अक्रोधात् तीर्थ सेवनं | जो क्रोध रहित हो गए, कामना रहित हो गए, उसने सब व्रत कर लिए, सब तीर्थ कर लिए । तीर्थ में तीर्थत्व भी तभी आता है जो अकामी होता है, निष्कामी होता है । कामना से ही क्रोध आता है । कामना उठती है, कामना पूरी नहीं होती तो क्रोध होता है । काम ऐश क्रोध रजोगुणात समोत भवेत । जीव नहीं चाहता की हम दुखी हों । जीव नहीं चाहता की हम जन्म-मरण के गट-माल में पड़ते रहें । जीव नहीं चाहता कि माताओं के गर्भों की परम्परा चलती रहे । फिर भी बलात्कार से जीव क्यों प्रेरित हो जाता है दुःख की तरफ । नहीं चाहता है कि हम क्रोधी हो, नहीं चाहता है कि हम कामी हो । नहीं चाहता है कि हम कर्मों की जाल को बढ़ाएँ । फिर भी क्यों गिरता है? ऐसा अर्जुन ने प्रश्न किया था, भगवान ने जवाब दिया । काम ऐश क्रोध रजोगुणात समोत भवेत । काम और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होता है, कामना रजोगुण से पैदा होती है । रजोगुण से कामना पैदा होती है तो आदमी का ज्ञान ढक जाता है । आदमी का ईश्वरदत्त जो विवेक है वो नाश हो जाता है । ईश्वरदत्त विवेक क्या है? ईश्वर ने दिया है विवेक क्या है? सत्य, असत्य, शाश्वत, नश्वर, रहने वाला, जाने वाला, सच्चा और झूठा, अस्थिर और स्थिर मतलब दुखदाई और परम मंगलदाई क्या है? ये जीव के पास विवेक है, लेकिन रजोगुण के कारण वो विवेक ढक जाता है । विवेक ढक जाता है तो कामना करता है कि ये मिले, ये करूँ, इतना पाऊँ तो सुखी होऊँ । ये करूँ, इतना पाऊँ, यहाँ जाऊँ, यहाँ खाऊँ, ये करूँ, ये स्थितियाँ जो हैं, ये कुछ परिस्थितियाँ बनाकर सुखी होना चाहता है । क्यों? कि अपने सुख स्वरूप जो आत्मा है उसका ज्ञान ढक गया है ।

सत्व संजायते ज्ञानं । सत्वगुण बढ़ता है तो ज्ञान प्रकाश होता है और रजोगुण से कामनाएँ उत्पन्न होती हैं | तो काम ऐश क्रोध रजोगुणात समोत भवेत । कामनाएँ रजोगुण से पैदा होती हैं और रजोगुण जितना बढ़ा उतना जीवन में हैशो-हैशो-हैशो…।  और अंत में देखो तो हाथ में कुछ लगेगा नहीं । रजोगुण बढ़ जाता है तो आदमी को कामनाएँ सताती हैं और कामनाएँ पूरी नहीं होती तो क्रोध होता है । कामनाएं पूरी होती हैं तो उसमें आसक्ति होती है और नही पूरी होती हैं तो क्रोध होता है । आदमी का चित्त-मलिन हो जाता है । तो आज का ये श्लोक है काम ऐश क्रोध रजोगुणात समोत भव: महाषणो महापापं ॥ भगवान बोलते हैं, रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है । यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी ना अघाने वाला और बढ़ा पापी है । इसको ही तू इस विषय में वैरी जान । बड़े में बड़ा वैरी है ये काम । काम माना संसारी व्यवहार को, पति-पत्नी के व्यवहार को, ये काम का अंग है । कामना-इच्छा । इच्छा जो है बढ़ी दुष्ट है । इच्छा से ही, हम हैं तो आत्मा, हैं तो शांतस्वरूप, हैं तो ब्रह्म स्वरूप लेकिन इच्छा ने हमको दुष्ट बना दिया, नीचे ला दिया ।

ये इच्छाएँ जितनी बढ़ती हैं, इच्छाएँ जितनी प्रगाढ़ होती हैं उतना ही हमारा चित्त मलिन होता है । इस जगत में महा-वैरी, महा-षणों, महा-पापं काम है, काम-वासना है । काम-वासना माने इच्छाएँ । इच्छाएँ क्या होती हैं कि सुख लेने की इच्छा होती है, वस्तुओं  को सदा रखने की इच्छा होती है, धन को कमाने की इच्छा होती है, धन को बढ़ाने की इच्छा होती है । हकीकत में धन बढ़ाओ-कमाओ, लेकिन अंत में क्या है ये अगर समझ में आ जाये तो इच्छा कम हो जाएगी । इच्छा कम होते ही प्रारब्ध में जो होगा अच्छे ढंग से गाड़ी चलेगी । लेकिन इच्छा करते-करते कुछ मिल भी जाता है तो उसमें आसक्ति हो जाती है और चले जाने का भय होता है । तो आदमी आंतरिक शांति से अपने असलियत से दूर चला जाता है ।

पद्मपुराण का श्लोक है
"अकामान् च व्रतं सर्वं, अक्रोधात् तीर्थ सेवनं |
दया जप्य क्षमा शुद्धम्, संतोषो धन मेव च ||”
दया ये जप है, संतोष बड़ा धन है । अगर गंगा किनारे भीड़ हो गयी है पहले जैसा वातावरण नहीं रहा, तभी भी चिंता करने की कोई बात नहीं है । आप अंदर की गंगा को प्रकट कर सकते हैं । ज्ञान की गंगा को प्रकट कर सकते हैं, समझ की गंगा को प्रकट कर सकते हैं । तो कामनाओं को बिखेर दिया जाये और कामना कई जन्मों तक भटकाती रहती है । कामना करके अगर गंगा किनारे गए, स्नान भी किया, तो भविष्य में स्वर्ग का सुख मिला । स्वर्ग का सुख भोगकर भी फिर पतन हो जायेगा । इसलिए गंगा में नहाये तो स्वाभाविक नहाये । और नहाये तो ये ही कामना करें कि कोई कामना न उठे । उसका तीर्थ तो बड़ा तीर्थ हो गया । बाकी का तो फिर हो गया मेला, जय श्री कृष्ण ।

गंगा किनारे हिमालय में दीर्घतपा नाम के तपस्वी तप करते थे । और वो शरीर को तपाने का तप नहीं करते थे । जुती नहीं पहनना, पानी उबाल के पीना या कंद मूल ही खाना ऐसा तप नहीं करते थे । वे कामना त्याग का तप करते थे । जो कामना उठी उसको विवेक की कैंची से काट दो । जैसे घास होता है खेत में फालतू घास होता है तो फिर उसको निकाला जाता है । ऐसे ही जो कामना उठी उसको विवेक के खुरपे से निकाल दो । तो चित्त हो गया कामना रहित । कामना रहित होते ही चित्त शांत हो गया । चित्त शांत हुआ तो उसमें परमात्मा तत्व, अंतर्यामी परमात्मा का बोध हुआ, साक्षात्कार हुआ । दीर्घतपा हिमालय की उस सुंदर गुफा में अपनी पत्नी और २ पुत्रों के साथ तप करते थे । कंद-मूल का भोजन करते थे । वो जमाना था । पत्नी भी ऐसी आज्ञाकारी ऐसी पवित्र थी मानो दीर्घतपा की वो छाया थी । जैसे छाया व्यक्ति को छोड़कर नहीं जाती ऐसे ही पति के विचार छोड़कर उसको दूसरा विचार नहीं आता था । वो पतिव्रता स्त्री । पतिव्रता स्त्री और सत्शिष्य का ये स्वभाव है कि गुरु की निष्ठां में, गुरु के स्वभाव में अपना स्वभाव मिल जाये । पतिव्रता स्त्री का ये स्वभाव है कि पति के स्वभाव में अपना स्वभाव मिल जाये । तो बड़े-बड़े जोगियों को जोग करने से, तपियों को तप करने से, जपियों को जप सिद्ध होने से जो मिलता है वो पतिव्रता स्त्री को घर बैठे मिल जाता है । सत् शिष्य को मुफ्त में मिल जाता । स्वाभाविक मिल जाता है क्योंकि अपनी कामना रही नहीं । कामना त्यागने के लिए तप करना एक तरीका है, दूसरा कामना गुरु के चरणों में अर्पित कर देना, गुरु की हाँ में अपनी हाँ मिला देना अथवा पति की हाँ में अपनी हाँ मिला देना । तो पतिव्रता स्त्री को बड़ी-बड़ी सिद्धियां जो मिली हैं, वो अपनी कामना रही नहीं, पति की कामना में अपनी कामना मिला दी, तो कामना का त्याग हो गया, अनजाने में ही योग हो गया । शिष्य ने, टोटकाचार्य ने, अथवा पूरणपुरा ने, या एकनाथ ने या एकलव्य ने या और जो सांदीपक जैसे पवित्र शिष्य हुए हैं तो ये महान सिद्धि को कैसे पाये ? कि अपनी कामना उनकी छूट गयी |

गुरु आज्ञा ही केवलं शिष्यस्य परम मंगलं ।
मतलब गुरु की आज्ञा के आगे अपनी कामना कोई महत्व नहीं रखती । तो कामना छूटी, कामना छूटी तो चित शुद्ध हुआ। अब यूँ पकड़ो नाक अथवा यूँ सीधा पकड़ लो। जप करो, व्रत करो, उबला पानी पियो, तपस्याएँ करो, शरीर को सुखाओ या कामनाओं को छोड़ों तुम्हारी मर्जी । पती की कामना में अपनी कामना को समर्पित कर दो तुम्हारी मर्जी । गुरु की कामना में अपनी कामना को समर्पित कर दो तुम्हारी मर्जी । ईश्वर की इच्छा में अपनी इच्छा मिला दो तुम्हारी मर्जी । लेकिन इच्छा को छोड़ना । काम ऐश क्रोध ऐश रजोगुणात समोत भव: । ये कामनाएँ रजोगुण से उत्पन्न होती हैं । कामनाएँ छोड़ दी तो रजोगुण शांत हो गया । रजोगुण शांत हो गया तो कामना छूट गयी, एक दूसरे की सहायक भी है । कामना पूरी होगी तो भोग भोगने की इच्छा होगी, रजोगुण बढ़ेगा ।  रजोगुण होगा तो कामना होगी और कामना होगी तो रजोगुण आएगा । जैसे नाविक नाव को ले जाता है, नाव नाविक को ले भागती है, ऐसे ही कामना पूरी होने से रजोगुण बढ़ता है, रजोगुण बढ़ने से फिर कामनाएं होती हैं । इसलिए रजोगुणी आदमी जिंदगी भर मजदूरी कर करके, जवाबदारियाँ निभा-निभा के बेचारा थक जाता है । आखिर में जिस पत्नी के लिए, पुत्र के लिए, कुटुम्बियों के लिए, भतीजों के लिए, काकाओं के लिए, मामाओं के लिए, मामियों के लिए, जिन-जिन के लिए जो-जो कुछ किया मरते समय देखता है कि कोई किसी का नहीं है | अनित्यं असार । आखिर बस! पछता कर आदमी मरता है |  सब कामनाएँ तो किसी की आजतक पूरी हुई नहीं । चाहे फिर वो राजा हो, महाराजा हो, चक्रवर्ती सम्राट हो, दूसरे को फूँक मार कर उठा देने वाला हो, अथवा यूँ कह दो श्री रामचन्द्रजी, अथवा राम के पिता दशरथ हों, दशरथ की भी सब कामनाएँ तो पूरी नहीं हुई । दशरथ नहीं चाहते थे कि कैकई ऐसा व्यवहार करे, कौशल्या नहीं चाहती थी कि दशरथजी चले जाएँ । रामजी नहीं चाहते थे कि दशरथजी चले जाएँ । भरत नहीं चाहते थे कि रामजी चले जाएँ । रामजी नहीं चाहते थे कि लक्ष्मण मूर्छित हो जाएँ । तो जहाँ संसार व्यवहार हुआ उसमें तो - खून-पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा, ये किश्ती तो हिलती जाएगी तू हस्ता जा या रोता जा । शरीर बना बाद में, पहले प्रारब्ध बना । आयुष्य, देह और भोग ये प्रारब्ध के अनुसार चलता है । हम कामना करके उसमें कर्ता बन जाते हैं । अष्टावक्र मुनि कहते हैं - अकर्तृत्वं, अभोगतृत्वं, मन्यते यदा । जिस समय अकर्ता और अभोग्ता अपने को मन मानता है उसकी सब कामनाएँ क्षीण होने लगती हैं । हकीकत में अकर्तृत्व, अभोगतृत्व वास्तविक में  हमारा आत्मा तो अकर्ता, अभोग्ता है लेकिन कामना करके, कामना से मिलता कुछ नहीं है बंध जाते है, फस जाते हैं । मुसीबत मिल जाती है, बस !

मैंने बताई थी वो घटना । मद्रास से गाड़ी चली । कोई अनजान आदमी आया पैसेंजर को कहा कि मैं जरा आता हूँ, बक्सा रख दिया । गाड़ी चल पड़ी कई स्टेशनें बदली लेकिन वो महाशय आये नहीं । आखिर मद्रास की गाड़ी बॉम्बे पहुँची, सब पैसेंजर उतर गए बक्सा पड़ा रहा । देखा कि अब वो आया नहीं, चलो अपन ही ले लें वो बक्सा । कुली को कहा कि सामान उतार दो । अपने सामान के साथ वो बक्सा उतारवा दिया । आये बाहर थोड़ा तो लगेज वालों ने पकड़ा कि इतना सारा एक टिकट पर वजन है किसका माल है ? हमारा है । ७ रुपय और ६ आने की पर्ची काट दी, उतने वज़न की । निकले बाहर कि ये माल इतना किसका है ? कि मेरा है । बक्से में क्या है ? कि चाबी गुम हो गयी । चाबी गुम हो गयी तो क्या है ? कस्टम वालों ने रोक लिया । खोलो । ताला तोड़ा तो अंदर से मर्डर निकला, शव निकला, लाश निकली । अब वो कितना ही कहे मेरा नहीं है, मेरा नहीं है ३०२ का केस बन गया । मेरा कह दिया ना । ऐसे ही हम लोगों के ऊपर ३०२ के ना जाने कितने ही केस हो जाते हैं । दिन में ना जाने मेरा, मेरा, मेरा, मेरा...कितनी बार कहते हैं । इसलिए ३०२ का केस बनता है तो उसको तो १ जन्म टिपायेगा । लेकिन हमको तो ८४-८४ लाख जन्म टिपाती रहती है । उसने तो एक बक्से को मेरा कहा, लेकिन हम ने तो ना जाने कितने-कितने को मेरा कहा । जितना अधिक मेरा कहते हैं उतने केस ज्यादा फिट हो जाते हैं । जय श्री कृष्ण ! जितना-जितना मेरा अधिक होता है, मन से जितना-जितना मेरेपन का भाव अधिक होता है, उतना-उतना वो प्राणी जन्मों की घट-माला में जाता है ।

मेरो मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सो तोर ।
ये आँख जो देखती है ये प्रकाश का गुण है, ये सूरज से लिया है । ये कान जो सुनते हैं ये आकाश का गुण, शब्द गुण है ये आकाश, महाकाश का गुण है ये कान सुनते हैं । शरीर में जो हरकतें होती हैं वो वायु का गुण है । तो एक-एक भूत का एक-एक स्वभाव है वो हमारे शरीर के द्वारा हो जाता है । हम हैं तो अनुमन्ता, दृष्टा, अभोग्ता, अकर्ता । लेकिन इन पाँच भूतों के अंशों से बने हुए शरीर को मैं मानते हैं और इनसे होने वाली चेष्टाओं को मेरी चेष्टा मानते हैं और फिर अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा करना चाहते हैं, प्रतिकूल परिस्थितियाँ हटाना चाहते हैं और सदा रहना चाहते हैं । सदा कोई रहा नहीं, प्रतिकूल परिस्थितियाँ जीते-जी सबकी कोई हटी नहीं । और अनुकूल परिस्थितियाँ सबकी सब किसी की हुई नहीं । ये हम मानते जरूर हैं लेकिन जानते नहीं हैं । मानते हैं । ऐसा कौन है माई का लाल जिसकी सब इच्छाएँ पूरी हो गयी होंगी । किसी फकीर के चरणों में गया बाबाजी मैं बहुत दुखी हूँ छोकरा कहने में नहीं है, जमीन बिकती नहीं है, पत्नी का स्वभाव ऐसा है, तंदरुस्ती खराब है और कुछ उसने लिस्ट बताई । बाबा ने कहा कि ये समझता है कि सारी दुनिया सुखी है, मैं अकेला दुखी हूँ । बाबा ने कहा बेटा देख मैं तेरे सब दुःख मिटाऊँ लेकिन तू सुखी आदमी की जूती ले आ बस | जो सुखी हो उसकी तू जूती ले आ । बोला महाराज कितनी लाऊं । एक ही ला, दूसरी की तो जरूरत नही है, एक ही ला खाली । एक जोड़ा ही ला खाली । वो भागा गया नगर सेठ के पास कि सेठजी १० जूतियाँ ला के दूँगा क्योंकी बाबाजी प्रसन्न होने वाले हैं । एक जूती आपकी ले जाता हूँ । सेठजी ने कहा, नगर सेठ ने कि जूती ले जाओ कोई हरकत नहीं है लेकिन क्यों ले जाते हो ? आप तो सुखी हैं, आपकी सब कामनाएँ पूरी हो गयी हैं आप सुखी हैं, जो चाहें खरीद सकते हैं, जहाँ चाहे जा सकते हैं, खा सकते हैं, आप तो सुखी हैं । वो सेठ सिर पे हाथ रखता है कि मुझे तुम सुखी मानते हो ? ऐसे बैठे हैं करोड़पति, उनसे भी पूछो कि आप सुखी हो । जमीन जागीर तो करोड़ रुपय की है लेकिन संसार में कोई सार नहीं है । श्री राम! इतना भी अगर समझ में आता है और संतों का सान्निध्य है तो ये कोई पुण्याई है । सेठ ने कहा कि मेरे जैसा कोई दुखी मिलेगा नहीं ऐसा करके सेठ ने अपना रामायण चालू कर दी । उसने तो जूती छोड़ी उसको तो रामायण सुनना नहीं था । उसको तो सुखी आदमी की जूती चाहिए थी । वो भागा कलेक्टर के चरणों में कि साहब माफ़ करना मैं आपको अभी लाकर देता हूँ, आप तो जिलाधीश हैं | बोले जिलाधीश हैं तो क्या, हमारा सचिव ऐसा है न जाने कब बदली कर दे... उसने अपने रोने चालू किये । वो रोने कौन, कब तक सुने ? ख़ुशी की बात हो तो आदमी सुनने को ज़रा जी करता है । कोई रोने की बात करता है न तो सुना अनसुना करते हैं, हूँ-हूँ कर देते हैं उसको बुरा न लगे । लेकिन दुःख की बात कोई सुनने को कोई राजी नहीं है ज्यादा । ॐ ॐ ॐ

इच्छा पूरी करने में मेहनत है और इच्छा पूरी हुई तो दूसरी इच्छा जरूर आएगी । लेकिन इच्छा छोड़ने में मेहनत नहीं है । उसमें केवल विवेक चाहिए ।
मेरो चिंत्यो होत नही, हरि को चिंत्यो होए |
हरि को चिंत्यो हरि करे, मैं रहूँ निश्चिंत ||

आप केवल ७२ घंटे ये पक्का कर लो । ३ दिन हुए और क्या हुआ । इतनी उम्र आपने दाव पर लगा दी है कोई विशेष लाभ हुआ नहीं मजूरी माथे पड़ी और क्या हुआ ? इतनी सारी उम्र दाव पे लगा दी मजूरी माथे पड़ी और क्या हुआ ? अंदर गहराई में देखो तो कोई सार नहीं । अब ३ दिन के लिए आप गाँठ बाँध लो कृपानाथ ऐसी कि ३ दिन तक बस कोई भी इच्छा आएगी तो उसको हटा दूँगा । अगर वो बरसात करता है तो धन्यवाद, धूप करता है तो धन्यवाद, भोजन में नमक अधिक आ गया तो धन्यवाद, अगर रोटी थोड़ा-सा कम मिली तो धन्यवाद । ३ दिन मैं अपनी इच्छा छोड़ूँगा, उसकी इच्छा में अपनी इच्छा मिला दूँगा । खाली ३ दिन करके देखो आप साक्षात्कार के द्वार पहुँच जायेंगें । आप महापुरुष हो जायेंगें । कटपुतली हो जाओ खाली ३ दिन के लिए । आप नहीं चाहते तभी भी होता है ।  लेकिन नहीं-नहीं करके जो होते हैं तो उसको मजूरी बोलते हैं । चतुर आदमी होते हैं - किसी के यहाँ, गाय पाली हुई थी सेठ के पास २-३, गढ़वाल चला गया था तो छोकरा बछड़े को घसीट रहा था, बछड़ा चल नहीं रहा है, घसीट रहा है, चल नहीं रहा है । तो खींचता है, पीछे से पूंछ्डा दबाता है, डंडे से मारता है, लेकिन बछड़ा भी अपना जोर लगाता जाता है । अब उसको जाना तो है गौशाला में, ले तो जाना है लेकिन चलता नहीं तो घसीटता-घसीटता जा रहा है । डंडे खा-खा के । बाप आ गया, बोलता है छोरा अक्ल नहीं है शहर में पढ़ा है लेकिन बुद्धू है बछड़ा ऐसे आता है क्या ? तो बोले क्या करूँ ? बछड़े को छोड़ दिया, जरा-सा हरा घास दिखाया, बछड़ा भाग के वहाँ पहुँच गया । ॐ  घसीट-घसीट के ले गए तो नहीं । ऐसे ही हरि रस का थोड़ा स्वाद दिला दो मन को, तो अपने आप अंतर्मुख हो जायेगा । अपने-आप अंदर आ जायेगा । वैसे इसको अंदर आये बिना शांति नहीं मिलती । आंतरिक यात्रा के बिना मन को शांति नहीं मिलती है और शांति के बिना सुख की संभावना नहीं है और सुख के बिना जीवन की संभावना नहीं है ।  जीवन और सुख दो नहीं हो सकते । हकीकत में हम लोगों ने बड़ी गलती कर दी । हम लोग परिस्थितियों को  जीवन मानते हैं । परिस्थितियाँ जीवन नहीं हैं । अमृत की पहचान वो कि विष डालो तो अमृत हो जाये जीवन की पहचान कि मौत भी आ जाये तो वो भी जीवन बन जाये । तो जीवन हमेशा एक रस होता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं । स्थूल शरीर से होने वाले कर्म शुभाशुभ, सूक्ष्म शरीर से होने वाला शुभाशुभ चिंतन और कारण शरीर से मिलने वाली ये शांति की स्थिति की अवस्था । ये सब शरीर के धर्म हैं, माया के धर्म हैं । ये माया के धर्म हम अपने में मान बैठे हैं । और अपने आप का पता नहीं है । ये माया के धर्म अपने में मानने से और अपने आप का पता ना होने से मजूरी कर-करके मर जाते हैं फिर भी अंत में हमारे कर्मों की जाल के बंडल बड़ जाते हैं घटते नहीं हैं।

अकामांच व्रतम् सर्वम |
सब व्रतों में श्रेष्ठ व्रत ये है कि निष्काम हो जाएँ, कामना रहित हो जायेन ।
तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार |
चाहे सुख दे दे, चाहे दुःख दे दे हमें दोनों हैं स्वीकार ||
ये भाव आते ही आपके कितने ही बर्डन, कितने ही टेंशन हों, चले जायेंगें । और ये जरूरी नहीं है कि आप कामना करते हैं, छोकरा के लग्न की, छोरी के लग्न की, तो लग्न होता है, नहीं तो नहीं होता है । जिस समय जिसका जो विवाह, जो मेला-जोला होना है वो होता है । लेकिन कामना करके हम अड़चन डालते हैं । कामना छोड़ते ही, प्लॉट बिक जाये, प्लॉट बिक जाये चिंता करते हैं तो प्लॉट बिकने में देर हो जाएगी । प्लाट बिक जाये ये इच्छा तो आपकी है लेकिन इस इच्छा को छोड़ दो । इच्छा को छोड़ते ही इच्छा पूरी होने लगेगी । लेकिन शर्त ये है कि इच्छा पूरी करने के लिए इच्छा नहीं छोड़ना । इच्छा पूरी हो जाये चलो इच्छा छोड़ देता हूँ तो इच्छा छूटी नहीं । सचमुच में इच्छा छूटते ही इच्छित घटना घट जाती है । क्योंकी इच्छा छूटते ही आपका हृदय शुद्ध हो जाता है । शुद्ध हृदय में परमात्मा के हस्ताक्षर हो जाते हैं ।  हस्ताक्षर कहाँ होंगें ? साफ़ कागज़ पर होंगें न । अखबार पे तो हस्ताक्षर नहीं होंगें । कोरे कागज़ पे होते हैं । तो जब कामना रहित चित्त होता है तो आपकी चेतना जो परमात्म-तत्व है, उस अंतर्यामी के हस्ताक्षर हो जाते हैं, मोहर लग जाती है । तो प्रकृति को वो काम करना पड़ता है । तो हम लोगों में और महापुरुषों में ये फर्क है कि हम अपनी कामना पूरी कराने के लिए, आशीर्वाद लेनें के लिए महापुरुषों के पास गिड़गिड़ाते हैं, हमारे जैसे हज़ारों आदमी आते हैं, जाते हैं, संतुष्ट हो जाते हैं । हम तो अपना एक कुटुंब-कबीला लेकर बैठे हैं तभी भी परेशान होते हैं और महापुरुष इतने कुटुम्बों के साथ सबंधित हैं, इतने कुटुंब उनसे आशीर्वाद, प्रेरणा लेते हैं फिर भी मौज में रहते हैं क्यों ? क्योंकि उनको अपनी व्यक्तिगत कामना नहीं है । व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है । व्यक्तिगत सुख भोग की इच्छा नहीं है । तो वो व्यक्तित्व को, अपने देह को ५ भूतों का समझते हैं । मैं आपको महापुरुष बनने की कुंजियां बता रहा हूँ । जय-जय । कामना पूरी  करने की कुंजियां बता रहा हूँ ।

काम ऐश क्रोध ऐश, रजोगुणात समोत भवेत ।
महाषणो महापापं रजोगुण से उत्पन्न हुआ ये काम ही क्रोध है, ये बहुत खाने वाला है । अर्थात कामनाएँ पूरी नहीं होतीं । कितनी भी कामनाएं पूरी हो गयी फिर और कामनाएँ आ जाएँगी । जीवन खा जायेंगें लेकिन कामनाएँ रह जायेंगीं । अब कामनाएँ पूरी नहीं होती तो उसको छोड़ो । उसको छोड़ते ही जो, अब कामनाएँ होती हैं - कुछ तो होती है आवश्यकता और कुछ होती है इच्छा । आवश्यकता वो जनता है परमात्मा । हमारी क्या आवश्यकता है उसको भली-भांति खबर है । हमें जन्म के बाद दूध की आवश्यकता है तो व्यवस्थित दूध न ज्यादा गर्म, न ज्यादा ठंडा, न ज्यादा मीठा, न ज्यादा फीका मिल जाता है । हमें आवश्यकता है श्वास लेने की, व्यवस्था है । हमें आवश्यकता है पानी पीने की, मिल जाता है, हमे आवश्यकता है जमीन पर चलने की वो मिल जाती है । हमे आवश्यकता है सूरज के किरणों की, बहुत जरूरी आवश्यकता है । सूरज के किरण गरीब-अमीर को मिल जाते हैं । हमें आवश्यकता है ठंडी की कभी गर्मी की वो मिल जाती है । हमें आवश्यकता है भोजन की, वो थोड़े प्रयास से पेट भर जाता है । आवश्यकता है पानी की, वो थोड़े प्रयास से मिल जाता है । लेकिन भोजन में ४ सब्जी हो ये है इच्छा । आवश्यकता है अंग को ढकने की । सुविधा हो ऐसा कपड़ा पहन लिया । लेकिन दूसरे के चमकीले, दमकीले, टेरिकोटन अमुक-अमुक देख के अपने पास सुविधा नहीं है लेकिन इच्छा कर दी । तो आवश्यकता तो आसानी से पूरी हो सकती है । लेकिन इच्छाओं का कोई अंत नहीं है । और इच्छा हमेशा यहाँ होती है कि अपने से छोटे की तरफ नहीं देखती । अपने से भौतिक पदार्थों में जो बड़े हैं उनको देखती है । अगर अपने से बड़ों को देखते जाओगे तो बड़े-बड़ों का अंत नहीं है और उन बड़े-बड़ों की गहराई में देखो तो बेचारों को दिन को आराम नहीं और रात को नींद नहीं । श्री  राम! जो भौतिक नजर से बड़े दिखते हैं, सुखी दिखते हैं, वे स्वयं तो बेचारे सुखी नहीं हैं, और अगर सुखी मानते हैं तो वो गलती करते हैं । लेकिन उनको जो दूसरे लोग सुखी मानते हैं और अपनी शांति खो देते हैं वो ज्यादा गलती करते हैं । तो ये कामनाएं जो पूरी होती हैं अच्छा बंगला, अच्छा मकान, अच्छा भोग भोगते हैं, तो कामनाएं गहरी होती हैं, वो अपने आप के साथ हिंसा करता है । अपने आत्मस्वभाव का घात करता है और वस्तुओं के आधीन होता है । दूसरा जिन के पास नहीं हैं उनके चित्त में भी शोभ पैदा करता है । समझो कि दूसरों के पास वो चीज नहीं है, वो गाड़ी नहीं है, वैसा बढ़िया मकान नहीं है, बढ़िया कपड़ा नहीं है । तो हमने बढ़िया मकान में रहना शुरू किया, बढ़िया कपड़े पहने, बढ़िया गाड़ियों में घूमें । तो जिनके पास नहीं है उनके चित्त में अशांति  होगी । उनकी मानसिक हिंसा का पाप लगेगा । अपना धन अपना वैभव पाकर किसी के आगे श्रेष्ठ होने की जो इच्छा है, वो इच्छा हिंसा में प्रवृत्त करवा देती है, मानसिक हिंसा होती है, वो पाप लगता है । दूसरा कि अपन उन वस्तुओं के आधीन हो जाते हैं । उन वस्तुओं से हम अपने को बड़ा मानते हैं । तो अपने बड़पन का अनादर हो जाता है । अपने आत्म स्वभाव का, स्वतंत्र जीवन जीने के लिए जो बड़प्पन हैं उसका अभाव हो जाता है । लेकिन जो महापुरुष हैं, आत्मरामी उनपर ये नीयम लागू नहीं होता । क्योंकि वे वस्तु लेकर, अपने बड़प्पन का प्रभाव नहीं दिखाते । वे वस्तुओं का उपयोग करके, तन का, मन का, वस्तुओं का उपयोग करके, औरों को सुख देते हैं । इसीलिए महापुरुषों का धन, वैभव या तेज दूसरों के तेज को दबाने वाला नहीं होता । दूसरों के अहंकार को विकसित करने वाला नहीं होता । दूसरों की वासनाओं को विकसित करने वाला नहीं होता । अपितु दूसरों के प्रेम को, शांति को विकसित करने वाला होता है और दूसरों के अहंकार को विसर्जित करने वाला होता है ।

राजा जानसुत की कथा:
उपनिषद में एक कथा आती है । जानसुत राजा बड़ा दानी था और उसकी ये मान्यता थी कि मैं इतना दान करूँ, इतना दान करूँ कि पृथ्वी पर मेरे जैसा कोई दानी ना रहे । और हर इंसान की यह कमजोरी है कि अपने को इतना श्रेष्ठ बनाना चाहता है कि उसकी बराबरी कोई ना कर सके । ये आंतरिक कमजोरी है । हर एक आदमी यह चाहता है कि मैं अद्वितीय हो जाऊँ, मेरी बराबरी का कोई ना हो । तो जानसूत राजा ने अपने गावँ में प्याऊ खुलवा दिए, धर्मशालाएँ बनवा दीं । अन्नक्षेत्र खुलवा दिए, औषधालय बनवा दिए | धर्मशाला किसकी है? राजा जानसुत की | ये अन्नक्षेत्र किसका? राजा जान्सुत का | ये साधुओं के रहने की जगहें किसकी हैं ? बोले राजा जानसुत की । ख़ैर दान-पुण्य करने से लाभ तो होता है | कोई आत्मज्ञानी, पूर्ण निष्काम महापुरुष घूमते-घामते जानसुत राजा के नगर में आये । देखा प्याऊ जानसुत का, ये जानसुत का, जहाँ भोजन किया वो अन्नक्षेत्र भी राजा जानसुत का था | देखा कि ये राजा दानी तो है | जय श्री कृष्ण ! दानी तो है लेकिन दान करने वाला मौजूद है । आया था तो पानी की एक बूंद से आदमी बना था । क्या लाया था?! और ले क्या जाना है ?! और बीच में दान करने का अगर का भाव रहा तो स्वर्ग भोगेगा और फिर गिरेगा तो दुखी होगा । ज्ञानी संतों के हृदय में दया होती है । उसकी धर्मशाला में आराम करते थे लेकिन पहले आपस में चर्चा की कि इसका कल्याण कैसे हो ? जो अत्यंत निष्कामी है, अपनी व्यक्तिगत सुख लेने की जिसकी कामना नहीं है वो दूसरों का कल्याण कैसे हो ऐसी भावना मात्र से दूसरों के कल्याण के द्वार खोल देते हैं । जय, जय ! जो पूर्ण निष्कामी हैं, आत्मरामी संत हैं उनको तो अपना व्यक्तिगत सुख लेने की इच्छा होती नहीं है । तो उसके सम्पर्क में जो लोग आते हैं या जिन पर उनकी मीठी नजर पड़ती है तो उन महापुरुषों के हृदय में होता है कि इसका कल्याण कैसे हो ?  कल्याण कैसे हो ऐसा सोचते ही उनके देर-सवेर कल्याण के द्वार खुल के ही रहेंगे । क्योंकी हस्ताक्षर हो गए कोरे कागज पर । जय-जय । वे महापुरुष तो सो गए ।

उपनिषद की कथा है यह । राजा जानसुत ने रात्रि को स्वपना देखा कि दो हँस हैं । वो आकाश को उड़ान ले रहे थे । ऊपर-ऊपर को जा रहे हैं । तब दूसरा हँस जिसका नाम था ब्लाक्ष उसने कहा कि इतना ऊपर मत उड़ो ये तो राजा जानसुत का इलाका है । उसके इलाके में इतना ऊँचा उड़ने से, कहीं वो देखेगा तो तेरे को जलाकर भस्म ना कर दे । उसने कहा- ब्लाक्ष, ये राजा जानसुत का इलाका नहीं है । जानसुत स्वप्न देख रहा है । हँसों की चर्चा सुन रहा है । ये तो रेकोमुनि का इलाका है । जानसुत का तो जमीन की रेखा का, जमीन के बॉर्डर का इलाका है । ये तो रेकोमुनि का, चिदाकाश तत्व, ज्ञानी की वृत्ति ब्रह्मलोक तक व्यापक होती है । जानसुत राजा के राज्य में एक ब्रह्मवेत्ता रहते थे । जिनका नाम था रेकोमुनि बैलगाड़ी चलाते थे । शरीर में खुजली थी, खुजलाते रहते थे । दिन को बैलगाड़ी चलते थे । लेकिन थे ज्ञानी, साक्षात्कारी पुरुष । ये ब्लाक्ष मैं अज्ञानी-मूढ़ जानसुत राजा के इलाके में नहीं सैर कर रहा हूँ । राजाओं का तेज तो दूसरों को घबराने वाला होता है, तपाने वाला होता है । लेकिन महापुरुषों का तेज तो दूसरों को निर्भय बनाने वाला होता है, शांति और आनंद देने वाला होता है । तो मैं मुर्ख, अज्ञानी जानसुत के राज्य के इलाके में नहीं जा रहा हूँ, मैं तो रेकोमुनि के राज्य में सैर कर रहा हूँ । रेकोमुनि ब्रह्मवेत्ता हैं और ब्रह्मवेत्ता के राज्य में शीतलता आती है, भले बाहर से सूरज तपता रहे लेकिन हृदय में बड़ी शीतलता आती है । ये ब्रह्मवेत्ताओं का रेंज होता है और अज्ञानियों का, मूढ़ राजाओं का रेंज क्या होता है ? बाहर से एयरपोर्ट पर एयरकंडीशन लेकिन अंदर देखो हैशो-हैशो ! बीड़ी ऊपर बिड ! सिगरेट ऊपर सिगरेट ! जय-जय । तो ये रेको मुनि का इलाका है जानसुत अज्ञानी, मूढ़ का इलाका नहीं है । अब वो राजा जानसुत सुन रहा है । सुबह हुआ, वजीर को कहा के रेकोमुनि कोई रहते हैं क्या, ज्ञानी हैं और अपने राज्य में ही रहते हैं और उसका इलाका आकाश तक, ब्रह्मलोक तक है । जाँच करो । गुप्तचरों ने जाँच लगाई रेकोमुनि नाम के तो हैं लेकिन वो तो बैलगाड़ी चलाते  हैं । बोले ज्ञानी की बाहर से कोई तुलना नहीं होती । बाहर की कैसी भी उनकी प्रारब्ध हो, कैसी भी लीला हो । ज्ञानी हैं ना । वो अपनी खचरी पर ६०० अशर्फियाँ लदवाकर रेकोमुनि के पास गए और चरणों में ६०० अशर्फियाँ धरी कि महाराज कृपा करके आप हमें ब्रह्म विद्या का उपदेश दो, ब्रह्मज्ञान दें । रेकोमुनि ने पैर से सर तक देखा, देखा तो उसमें जरा मैं कुछ करता हूँ, और आत्मज्ञान कोई बढ़िया चीज है वो पाकर भी मैं बड़ा बन जाऊँ । क्योंकि अभी उसमें तो वासनाएँ थीं । रेको मुनि ने सोचा कि ये दवाई से या टिकरी से काम नहीं चलेगा, ये तो ऑपरेशन करने का मरीज है । डांट दिया चल रे दरिद्र कहीं का ! ६०० अशर्फियाँ लाकर ब्रह्मज्ञान लेने आया है । भाग-भाग तेरे जैसे भिखारी कई आये । डाँट दिया, ब्रह्मवेत्ता ने । कुछ तो पुण्य था, इसलिए ज्यादा हिटलर जैसी अकड़ आई नही, सिकंदर जैसी । देखा कि ब्रह्मज्ञानी महापुरुष हैं, डाँट दिया चलो । चले गए लेकिन ये महापुरुष कैसे प्रसन्न हों इसकी खोज लगाओ । खोज करते-करते देखा कि इनको सेवक की जरूरत है । इनको गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने की प्रारब्ध है, रूचि है । अपनी लड़की रेकोमुनि को ब्याह दी । और एक गाँव रेकोमुनि को अर्पण करके और कहा कि भगवन आज के बाद इस गाँव का नाम रेकोपरम रहेगा । अब तो अपना नजदीक का संबंध हो गया है । और आप ऐसे ब्रह्मवेत्ता और मैं अज्ञानी मुर्ख होकर मरुँ ! ये तो ठीक नहीं । आप मुझ पर कृपा करो, बोले हाँ! नम्र हुआ है । अब नम्र हुआ है, नम्रता देखकर, रेकोमुनि ने जानसुत राजा को आत्मज्ञान का उपदेश दिया । और आत्मज्ञान का उपदेश यह है कि इच्छा को त्यागते ही आत्मपद का प्रकाश होता है । ये भगवान कृष्ण अर्जुन पर प्रसन्न होकर ये कह रहे है-
काम ऐश क्रोध ऐश, रजोगुणात समोत भवेत ।


दीर्घतपा की कथा :

योगवशिष्ठ की एक बड़ी सुंदर कथा है कि दीर्घतपा अपनी पत्नी सहित हिमालय में तप कर रहे थे । तप कर रहे थे माना आत्मशांति में मस्त थे । पत्नी भी उनकी छाया जैसी थी । कंद-मूल पति को अर्पण करती, पति खा लेते बाद में पाती थी । पति के विचारों में उसके विचार सम्मलित थे । हमारी शर्तों से तो हम पकोड़े माँगे । हमारी शर्तों से तो हम सिंग-चना मांगेगें लेकिन हमारा जिसमें हित हो वो तू सदा कर ही रहा है फिर हम शर्त किस बात की रखें? ॐ ॐ ॐ

बच्चा जो माँगे वही बाप देता जाए, तो बच्चे का कभी विकास नहीं हो सकता । लेकिन पिताजी जनते हैं कि बच्चे को किस वक्त क्या चीज देने से उसका कल्याण होगा । ऐसे ही हमारे पिता के भी पिता, पिता के भी पिता परमात्मा सब जानते हैं । कि आपको किस समय सुख की जरूरत है, किस समय दुःख की जरूरत है, किस समय अपमान की जरूरत है, किस समय बीमारी की जरूरत है, किस तंदुरुस्ती की जरूरत है वो सब जानते हैं । इसीलिए सिस्टेमेटिक रहते हैं । अगर वो नही जानते होते तो तुम जो चाहते वह होता रहता । और तुम जो चाहते वो होता रहता न, तो अभी तुम यहाँ नहीं होते ।

एक महात्मा थे ईश्वर से कुछ नहीं माँगते थे, उनकी वाणी में बड़ा प्रभाव था । उनके दर्शन करके लोग आनंदित हो जाते थे । चित्त प्रसन्न हो जाता था । लोग बढ़ने लग गए । फिर वो महात्मा तो दयालु होते ही हैं । प्राणी मात्र के परम सुह्रद होते हैं । लोग आके कोई अपना दुःख रोये कोई कुछ दुखड़ा रोये । महात्मा एक दिन समाधि में बैठे और भगवान को कहा कि देखो मैंने आज तक तुम्हारे से कुछ नहीं माँगा है, और अपने लिए माँगूँगा नहीं । मेरे पास जो भी आदमी आते हैं, उनके जो भी प्रॉब्लम हैं, सबके प्रोब्लम सॉल्व कर दो बस । भगवान ने कहा महाराज छोड़ो इस बात को । मैं जो करता हूँ ठीक है । लेकिन महाराज भी ब्रह्मवेत्ता थे । उन्होंने कहा तुम करते हो ठीक है, मैं भी जो कहता हूँ ठीक है, हस्ताक्षर कर दो । भगवान ने कहा, मैंने तो वचन दिया है कि ज्ञानियों से मैं परे नहीं हूँ | आप अगर  आग्रह करते हो, तो मैं कर देता हूँ ।  लेकिन इसमें महाराज जी मजा नहीं है । बोले मजा नहीं है तो देख लेंगें लेकिन एक बार मेरे पास जो भी आदमी आते हैं उनके सब प्रॉब्लम सॉल्व कर दो । करो हस्ताक्षर । भगवान का हाथ पकड़ के उस बात पर हस्ताक्षर करा दिया । लोगों के तो रातों-रात प्रॉब्लम सॉल्व हो गए । महाराज शनिचर की रात थी तो प्रॉब्लम सॉल्व हो गए । रविवार को देखे तो कोई आदमी नहीं कथा में । बाबाजी धीरज वाले होंगें बोले चलो लोगों ने समझा होगा कि बाबाजी गए हैं बाहर। सोमवार को देखा कोई आदमी नहीं, मंगल को देखा कोई आदमी नहीं । बुधवार को देखा तो कोई नहीं । ध्यान किया भगवान से पूछा बोले महाराज आप बोलते थे कि प्रॉब्लम सॉल्व कर दो, उनकी सब इच्छाएँ पूरी कर दो । अब उनको इच्छित पदार्थ मिल गए हैं तो उसी में फस गए हैं । कुछ थोड़ी बहुत गड़बड़ करके भी मैं उनको इधर लाता था ताकि वो सत्य को पा लें । आपने मेरे से हस्ताक्षर करा लिया इसलिए वो तो मौज-मजा में नरक की तरफ जा रहे हैं । बाबा ने कहा भगवान तुम्हारी बात ठीक थी । हम अपनी बात वापस लेते हैं ।

जब तक कुछ अटक-सटक नहीं होती है, तो हमारे जीवन का विकास नहीं होता है । जय-जय ! उसका मतलब ये नहीं कि हम चाहेंगें कि आपको प्रॉब्लम हो । हम ये नहीं चाहते । लेकिन जो करता है वो ठीक करता है । जय-जय ! कभी कोई प्रॉब्लम सॉल्व हुआ, कभी कोई आया, ऐसे करते-करते सब प्रोब्ल्मों का मूल कारण है जन्म-मृत्यु । वप जन्म-मृत्यु का प्रॉब्लम सॉल्व हो जाये न, बाकी के प्रॉब्लम की वैल्यू नहीं रहेगी । बार-बार जन्म लेना बार-बार मरना, फिर जन्म लेना, फिर मरना ये बड़े में बड़ा प्रॉब्लम है । वो बड़ा प्रॉब्लम दूर करने के लिए भगवान छोटे प्रॉब्लम देता है ताकि वहाँ जाओ ।
तो दीर्घतपा ने देखा कि संसार दुखों का घर है । प्रोब्ल्मों का घर है । जबतक एग्जाम नहीं आये तबतक सोचते हैं कि बस सातवीं कक्षा पास हो जाये, हाश ! लेकिन बाद में फिर, फिर शुरू । तो ये दुनिया का ऐसा रिवाज है हाश करते-करते जी रहे हैं और सब अधूरा का अधूरा करके मर गए । दीर्घतपा ने तो आत्मज्ञान पाकर अपने स्वरूप में विश्रांति पाई । समय पाकर उनके देह का अन्न-जल पूरा हुआ । वे अपनी धारणा करके सर्व व्यापक चैतन्य परब्रह्म परमात्मा मैं हूँ । ये देह मेरा नहीं, देह पाँच भूतों का है । पांच भूतों का देह पांच भूत में लीन हो जाये । बूढ़ा हो जाए तो क्या?! जवान रहा तो क्या?! बचपन रहा तो क्या ?! ऐसे देह तो मेरे कई आये और कई गए । मैं देह में होते हुए भी विदेही, चिदाकाश, चैतन्य आत्मा हूँ ।
मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहंन च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु: चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||

वो शिवोअहम्, शिवोअहम् की भावना करते हुए अपने स्वरूप में डटके उन्होंने, जैसे साँप केचुली का त्याग कर देता है । बुद्धिमान आदमी नहाता है तो शरीर के मैले पानी का त्याग कर देता है । ऐसे ही वे आत्मज्ञान में नहाकर अपने देह का प्रारब्ध पूरा हुआ, देह छोड़ दिया जैसे साँप केंचुली छोड़ता है । पत्नी बुद्धिमता थी, रोइ नहीं । पति की स्मृति करके उसने भी धारणा शक्ति बड़ा रखी थी । उसने भी अपने प्राण-अपान की गति को सम करके, भू-मध्य में वृत्ति लाई । ॐ कार का ध्यान किया । ॐ कार का ध्यान करते-करते, ॐ के अकार, उकार, मकार और अर्ध मात्रा में । अकार माना स्थूल शरीर, उकार माना सूक्ष्म जगत, मकार माना कारण जगत । इन सबको सत्ता देने वाला, जाग्रत को, सपने को और सुषुप्ति को सत्ता देने वाला जो तुरिया पद है आत्मा, उस आत्मा की धारणा करके पत्नी ने भी अपने प्राण छोड़ दिए । महाराज दीर्घतपा तो ब्रह्मलीन हो गए लेकिन उनकी पत्नी भी ब्रह्मलीन हो गयी । बाद में उनका पावक नाम का एक लड़का था । वो ज्ञातज्ञय था । पिता का प्रभाव था उसके ऊपर । वो भी माँ और बाप की डेथ हुई, क्रिया-कर्म किया । शास्त्र उचित उनकी पुण्य-क्रिया किया, यज्ञ, दान, होम, हवन, जो कुछ भी पिंड-दान करना था कर दिया । लेकिन देखा कि पुण्यक रो रहा है । वन-वन में घूम रहा है । हे मेरा बाप! तुम मेरे को यज्ञ में बैठते थे, ऐसे करके रो रहा है । पावक ने एक दिन बैठाया पुण्यक को । पावक ने कहा कि भाई पुण्यक! तू ये छाजिया निकालता हुआ माता-पिता की याद में जंगल में, वन-वन भटकता है । तेरे छाजिया निकालने से या पुरानी स्मृति दोहराने से वो पिता का शरीर साकार नहीं होगा, माता भी साकार होकर आएगी नहीं । वो पाँच भूतों के उनके शरीर थे, पाँच भूतों में लीन हो गए । अब तेरे छाजिया निकालने से तो तेरा दुःख बढ़ेगा और कुछ होने वाला है नहीं । अब दुःख बढ़ाकर तू बेचैन हो तो तेरी मर्जी और समझ बढ़ाकर तू परम चैन से जी तो तेरी मर्जी । अगर तुझे रोना है तो इस बात पर रो कि ब्रह्मज्ञानी पिता मिले और ऐसी पवित्र माता मिली । और फिर भी तू अज्ञानी का अज्ञानी, मूढ़ का मूढ़ । ज्ञानी पिता मिले, ऐसी माता मिली और फिर भी तू अज्ञानी मुर्ख रहा इस बात पर तू रो । और हे पुण्यक ! कई जन्मों के तेरे माता-पिता थे । एक बार तू भवर हुआ, तो बड़ी भवरी तेरी माँ थी और भवर तेरा बाप था । एक बार तू हिरण हुआ था, तो हिरण के परिवार वाले तेरे माता-पिता और बंधु थे । एक बार हिरण को शिकारी ने मारा । तो शिकारी को देखते-देखते हिरण मरा । और वो हिरण फिर शिकारी हुआ, तो तू शिकारी हुआ था एक बार । और फिर तेरे घीवर लोग जो थे, शिकारी लोग जो थे, क्षूद्र लोग, वो तेरे भाई-बंधु, माता-पिता थे । उनका भी चिंतन कर, उन लिए भी रो । और वो घीवर ने फिर जंगल में शिकार करते-करते कोई साधु-संत, महापुरुष का दर्शन किया । तो कुछ पुण्य था और कुछ पाप था फिर वो वैश्य के जन्म में आये । तो वैश्य के जन्म के तेरे माता-पिता और बंधू थे, वैश्य ने फिर दान किया और धन का चिंतन किया । धन के चिंतन-चिंतन में मरा और वो विषधर हुआ, सांप हो गया । तो सर्पिणी तेरी माँ थी और सांप तेरा बाप था और दूसरे सांप जो थे न, तेरे भाई-बंधु थे । अब उनके लिए भी थोड़ा रो । भंग देश में तू हाथी हुआ था । मालंव देश में तो गंडक हुआ था । और अरुणाचल की तलेटी में एक छोटा सा गावँ था जहाँ विश्वदेव नाम के एक राजा राज्य करते थे । वहाँ तू बछड़ा हुआ था । वहाँ तू १५ महीने जिया और फिर तड़प-तड़प के तूने प्राण त्याग दिए । मैं अपने योग बल से और ज्ञान के सत्व बुद्धि से तेरे कई जन्मों को जानता हूँ । और बछड़ा होने के बाद तूने किसी रबाड़ी के घर, किसी अहीर के घर जन्म लिया था । और तू और हम दोनों भाई थे । तुम्हारा और हमारा लेना-देना बाकी हो गया । फिर तुमने भी कई जन्म पाये और मैंने भी कई जन्म पाये । अभी हम आये हैं । मेरा तो आखरी जन्म है और मेरी सीख यह है कि तू भी इसे अपना आखरी जन्म बना ले बस । ॐ ॐ । कभी तू गधर्ब हुआ, कभी तू बछड़ा हुआ, कभी तू शूद्र हुआ, कभी तू लता हुआ, कभी तू भवरा हुआ, कभी तू हिरण हुआ, कभी तू हाथी हुआ, कभी तू महावत हुआ । तो कभी तू मोर हुआ, कभी तू सियार हुआ । तो कभी तू सस्ला हुआ । और मैंने भी कई जन्म पाये । इस प्रकार की वो अपने अगले जन्मों की बीती हुई कथा, उसके अगले जन्मों की बीती हुई कथा, पावक ने अपने पुण्यक नाम के भाई को बताया । जब भाई ने अपने बड़े भाई के ज्ञान को सुनकर उसका विचार किया तो उसकी इच्छाएँ क्षीण हो गयी । और वो निरिच्छित पद में, आत्मपद में विश्रांति पाये । हे रामजी ! इस प्रकार पावक के उपदेश से पुण्यक अपने आत्म-स्वभाव में स्थिर हुआ और पिता-माता जैसे मोक्ष पद को प्राप्त हुए, ऐसे ही वो मोक्ष गति को प्राप्त हो गया । इस कथा को कहने का तात्पर्य यह है कि आप भी अपनी इच्छाओं को, अहँकार को, ममता और वासनाओं को दूर करके अपने शांत स्वभाव, मोक्ष स्वभाव, जो आत्मा है उसमें स्थिर होने के लिए ही तुम्हारा जन्म हुआ है । और वो तुम्हारे को एक बार मिल जाये स्थिति, तो फिर संसार का कोई भी व्यवहार तुम करो तभी भी तुम्हारे चित्त पर उसकी सत्य बुद्धि का प्रभाव नहीं पड़ेगा । इसीलिए भगवान शिवजी कहते हैं :
उमा कहूँ मैं अनुभव अपना सत्य हरि भजन, जगत सब स्वप्ना ।
जब जगत स्वप्ना है तो उसकी तमाम कामना करने की जरूरत क्या है ? जिसको वो विधाता अनुकूलता देना चाहता है उसके आगे अनुकूलता आती है । जिसको वो प्रतिकूलता देना चाहता है प्रतिकूलता आती है । अनुकूलता आकर चली जाती है, प्रतिकूलता आकर चली जाती है । बचपन आकर चला जाता है, जवानी आकर चली जाती है । दुःख के दिन आकर चले जाते हैं, सुख के दिन आकर चले जाते हैं । मान की घड़ियाँ आकर चली जाती हैं, अपमान की घड़ियाँ आकर चली जाती हैं । मुसाफिरी की घड़ियाँ आकर चली जाती हैं, आगमन की घड़ियाँ आकर चली जाती हैं और परदेश गमन की घड़ियाँ भी आकर चली जायेंगीं । जय-जय ! ये सब काल की विशाल धारा में सब आना-जाना ये खिलवाड़ मात्र हो रहा है । इस खेल को खेल समझ कर जो अपने आत्मपद में स्थिर होता है उसको हमारा प्रणाम है । उसके माता-पिता को भी हमारा प्रणाम है ।
तुलाधार की कथा :
तुलाधार नाम का एक महाभाग्यवान वैश्य । उसने त्याग व्रत धारण किया था । शरीर पर एक ही वस्त्र । एक ही धोती फ़टी-फटी । पत्नी भी ऐसी ही थी पवित्र । वो पति के व्रत में सम्मलित थी । पति आजीविका के लिए कोई आयस नहीं करते थे । प्रारब्धवेग से जो उन्हें मिल जाता था खेतों में से दाने चुन लेते थे । उसको कूट के सत्तू बना लेते थे । राब बना लेते थे, खाते थे भगवान के भजन में मस्त होते थे । इच्छाएँ छोड़कर भगवान के रस में इतने तृप्त हुए कि बड़े-बड़े राजे-महाराजाओं का सुख भी उनके आत्मसुख के आगे कुछ नहीं था । फिर भी भगवान ऐसे जो निष्कामी होते हैं, जो आत्मरामी होते हैं ऐसे पवित्र संतों को प्रसिद्द करने के लिए भगवान भी कभी कुछ ना कुछ लीला किया करते हैं । कभी किसी का काम कर लिया करते हैं, कभी प्रकृति काम कर लेती है । कभी उनके वचन से कुछ हो जाता है तो । ऐसे कुछ ना चाहने वाले महापुरुष भी प्रसिद्धि या वाह-वाही या ये-वो । आप जितना नहीं चाहते न, उतना संसार का झमेला आपके गले ज्यादा लगता है । जय-जय ! इसीलिए शायद आप समझदार हैं कि कुछ ना चाहने से तो संसार का झमेला ज्यादा हो जायेगा, इसीलिए आप इच्छा रखते होंगें शायद ऐसा होगा । जय-जय !
तुलाधार कुछ ना चाहता था । आखिर भगवान ने तुलाधार की महिमा बढ़ाने के लिए, तुलाधार की परीक्षा ली | तुलाधार नदी किनारे स्नान करने गए | एक ही फ़टी धोती, 2-4-5 वस्त्र पड़े हैं नदी किनारे । किसी के भी होंगें । मेरे काम-गुज़ारा इससे चल जाता है । जिस शरीर को ढकता हूँ वो जल जायेगा । जिसको जला देना है उस शरीर के लिए किसी के पड़े हुए वस्त्र, न जाने कैसे हों, किसके हों, क्यों लूँ ? इनका चिंतन ही क्यों करूँ ? मुझे तो चिंतन भगवान का करना चाहिए । वस्त्र देखते हुए, अपनी फ़टी हुई धोती का ख्याल आते हुए भी वो वस्त्र न उठाये और घर चले आये । भगवान ने देखा, है तो ये पक्का । दूसरे दिन जहाँ नदी में स्नान करने जाते तुलाधार, वहां एक अशर्फियों का कुल्हड़ भरा हुआ था । दही मिलता है न कुल्हड़ में, मिटटी का कुल्हड़ । वो अशर्फियों का, सोने की गिन्नियों का भरा हुआ है । अशर्फियों पर नजर भी पड़ी, उठा के देखा भी कि हैं तो सोने की मोहरें । लेकिन मैंने तो त्याग व्रत लिया है | मेरा धन, मेरा सोना तो मेरे राम हैं । मेरा सोना तो आत्मा है, मेरा सोना तो अचाह है । अब ये धन लूँ, धन में तो सब अनर्थ है । धन आते ही भोग की इच्छा बढ़ने लगती है । धन आते ही अहँकार बढ़ने लगता है । धन आते ही कुटुम्बियों और सज्जनों में राग और द्वेष होने लगता है । सम्पति आती है न तो राग-द्वेष, दुश्मन ये बढ़ने लगते हैं । तो महाराज स्नान करके, अशर्फियों को देखकर, रखकर चले गए । भगवान ने देखा कि ये तुलाधार तो एकदम पक्का है । भगवान से भी रहा नहीं गया । जितना पेपर बढ़िया जाता है न उतना और कड़क परीक्षा होती है । चौथी की परीक्षा अपने ढंग की होती है और उसमें पास हो गए तो अगले साल और कड़क आएगी । उसमें पास हो गए तो अगले साल और कड़क आएगी । महाराज तुम एम.ऐ. में पास हो गए तो पी.ऐच.डी. में और बढ़िया-कड़क प्रश्न आयेंगें । ऐसे ही भक्त जितना बढ़िया होता जाता है न, परीक्षा के पेपर भी उतने ही ऊँचे-ऊँचे आते हैं । ऊँचे-ऊँचे इसलिए आते हैं कि तुमको ऊँचा उठाना है । श्री राम ! भगवान एक ज्योतिषी का रूप लेकर नगर में प्रविष्ट हुए । किसी का हाथ देखते हैं, किसी का ललाट देखते हैं । देखते-देखते तुलाधार के पड़ोस में ही घुसे ज्योतिषी बनकर । तुलाधार की पत्नी ने देखा कि बहुत बड़े एक ज्योतिषी आये हैं और बहुत सच्चा-सच्चा बता देते हैं । पत्नी भागी । बोला कि तुम्हारे पति का नाम तुलाधार है, ऐसी तुम्हारी ललाट की रेखा बोलती है । उसके आगे तो सब रेखाएँ खुली होती हैं । पत्नी ने कहा- ‘हे ज्योतिषी महाराज! धन्य-धन्य!’  बोले, तुम्हारे पति त्याग व्रत पकड़ के बैठ गए हैं । तुम गरीबी नहीं चाहतीं, लेकिन पतिव्रता स्त्री होने के कारण पति की इच्छा में तूने अपनी इच्छा मिला दी है । बोले, महाराज सच बोले हो । वो देहाती माई बेचारी, तुलाधार की पत्नी । तुम्हारे को एक ही साड़ी है, उसी साड़ी में तुम स्नान करती हो और वही गीली साड़ी पहन के रसोईघर में जाती हो, रसोईघर के ताप से वो साड़ी सूखती है । महाराज सच बोले हो । तुम खेत में से अन्न के दाने चुन के आते हो और कूट काट के सत्तू बना के खाते हो । और भगवान को भोग लगाते हो । और आजतक भगवान ने तुमको कुछ नहीं दिया । उसी भगवान का तुम भजन कर रहे हो । बोले महाराज ऐसा मत बोलो । ऐसा मत बोलो, ये आपकी बात तो सच्ची है, लेकिन हम धन पाने के लिए उसको नहीं उसको रिझाते हैं, कपड़ा लाने के लिए उसको नहीं रिझाते हैं । हम तो उसी को पाने के लिए उसको रिझाते हैं महाराज । महाराज आप सच बोल रहे हो । बोले दो दिन पहले तुम्हारे पति नदी पर नहाने गए । और 5-6 सुंदर धोती पड़ी थीं, वस्त्र पड़े थे, साड़ियाँ भी पड़ी थीं, तुम्हारे पति ने देखी, छुइ तक नहीं और वापस चला आया । बोले महाराज बिलकुल सच बोले हैं आप अन्नदाता । ज्योतिषी तो भगवान का रूप हो आप । सच बोले हैं । भागी, अपने पति को कहा कि ज्योतिषी तो बस ऐसे हैं कि अंतर्यामी । आप चलो दर्शन करो । वो भी आये । तुलाधार ने ज्योतिषी को प्रणाम किया कि महाराज हाथ हमारा भले न देखो, ललाट भले न देखो लेकिन देने को दक्षिणा नहीं है । अगर ऐसे ही देखते हैं तो बोलिए । बोले मैं किसी से दक्षिणा लेता ही नहीं । मैं तो दक्षिणा देने को निकला हूँ, लेने को नहीं निकला हूँ । भगवान तो देने को ही निकले हैं । हाथ देखा बोले तुम्हारे को धोतियाँ मिलीं, साड़ियाँ मिलीं, तुमने नहीं लीं । तुमको कई लोगों ने धन का ऑफर किया तुमने नहीं लिया । ये धन की रेखा है लेकिन तुम नहीं-नहीं करके ये देखो चौकड़ी आ गई है । और आज सुबह तुमको एक कुल्हड़ भरा हुआ गिन्नियों का मिला था । तुलाधार ने कहा- ‘महाराज! ये बात तो मैंने किसी को नहीं बताई ।‘  बोले, किसी को नहीं बताई लेकिन रेखा साफ़ बोल रही है । आज अशर्फियों का भरा कुल्हड़ हुआ मिला था आपको, बराबर ! बोले, बात बराबर है । फिर तुमने देखा और तुम्हारे को अपनी गरीबी भी याद आई । और अशर्फियाँ लाने से सब छनाछन हो जायेगा ये भी याद आया । फिर तुमने वापस धर दी । बोले हाँ महाराज ! बोले तुलाधार तुम अपने भाग्य को ठोकर मारते हो । हम तो ज्योतिषी हैं, हम तो सही बात बताते हैं कि सर्वे गुणा: धनआश्रिता: । सब गुण जो हैं, धन में आश्रित होते हैं । धनवान के तो अवगुण भी दब जाते हैं । धन से आदमी होम-हवन कर सकता है । धन से आदमी यज्ञ-याग कर सकता है । धन से आदमी माँ-बाप की सेवा कर सकता है । धन से आदमी गुरुजनों के आशीर्वाद और सेवा पा सकता है । धन से क्या नहीं होता है ? तुलाधार ने कहा महाराज धन से क्या नहीं होता है ?! धन से सबकुछ होता है । धन से स्वर्ग का सुख मिलता है और स्वर्ग भोग-भोग कर फिर आदमी नरक में भी आता है । धन से अभिमान भी आता है । धन से भोग-वासना भी बढ़ती है । धन से लोलुपता भी बढ़ती है । और धन की रक्षा-रक्षा में आदमी की आयुष्य भी कम हो जाती है । महाराज वो बाहर के धन की चिंता-चिंता में अंदर का धन भी आदमी खो देता है । धन से सब कुछ होता है । ज्योतिष जी महाराज बोलते हैं, धन से सब कुछ होता है । और तुलाधार भी कहते हैं, धन से सब कुछ होता है । लेकिन ज्योतिष धन के प्रलोभन दिखा रहे हैं, लेकिन तुलाधार धन के दोष दिखा रहे हैं । जय-जय !
जिसको आत्मधन मिला वो धन की कामना क्या करें ?! जिसको आत्मसुख मिला वो संसार के सुख की क्या कामना करेगा ?! जिसको आत्म-जीवन मिला, वो देह के जीवन की आसक्ति क्या करेगा ?! तुलाधार अपने ढंग से धन की महिमा कर रहे हैं । और ज्योतिष जी अपने ढंग से महिमा कर रहे हैं । आखिर ज्योतिष जी चुप रहे । क्योंकि सत्य के आगे कभी-कभी तो न्यायाधीशों को भी चुप रहना पड़ता है । असेल-वकील अगर पूरे प्रमाण से कुछ बोलता है प्रतिवादी का, तो  सरकार के खिलाफ भी अगर पूरे सबूत भी अगर मिलते हैं तो सरकार के अनफेवर भी जजमेंट देनी पड़ती है । भले सरकार का चम्चा हो कोई, फिर भी सबूत पक्के मिलते हैं तो सरकार के अनफेवर में भी जजमेंट देनी पड़ती है । ऐसे ही महाराज! जब धन के पूरे दोष बताने में तुलाधार सफल हुए तो भगवान मौन हो गए । भगवान मौन हुए और अंदर से बड़े खुश हुए । बाहर से तो बता रहे थे, अंदर से खुश हुए । खुश-खुश में जरा निगाह डाली तो तुलाधार को हुआ कि हमारा हित चाहने की इतनी-इतनी बातें समझाईं और हमने सब बातें उनकी काट दीं, फिर भी इस ज्योतिषी को क्रोध नहीं आता है तो मालूम होता है ये तो ये महात्मा होगा या तो होगा परमात्मा । क्योंकि जिसको कामना होती है उसको क्रोध आता है । तुलाधार ने गहराई से गौर करके देखा तो उसके चित्त में शांति और शीतलता का साम्राज्य पाया । पैर पकड़ लिए बोले भगवान्! ये छलिया वेश धारण करके आये हो । असली वेश में जरा नारायण प्रकट तो हो जाओ । तब भगवान चतुर्भुजी नारायण के रूप में प्रकट हुए और तुलाधार को अपने वक्षस्थल से लगा लिया ॐ | जिनको कामना नहीं है उनको तो भगवान गले लगते हैं और जो कामनाओं के पुतले हैं न, रावण काम का पुतला था, तीरों का निशाना बना । आज का श्लोक है यह : काम ऐश क्रोध ऐश, रजोगुणात समोत भवेत ।
रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है । यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघाने वाला और बड़ा पापी है । इसको ही तू इस विषय में वैरी जान । ये तीसरे अध्याय का सैंतीसवाँ श्लोक है।
तो कृपानाथ, कामनाएँ घटाने के दो तरीके हैं । एक तो ईश्वर में इतनी प्रीति लग जाये, कि कामना स्फुरे ही नहीं । और दूसरा कामना अगर स्फुर्ति है सुख लेने की, तो सुख लेने की बजाए दूसरे को सुख दें । और जो सुख देता है वो सुख का दाता हो जाता है । उसका मतलब ये नहीं कि आप खाओ-पियो नहीं । सुख के लिए नहीं, शरीर के पोषण के लिए खा लें । ये शरीर भी आपका नहीं है । जैसे ये दूसरे लोग आपके नहीं हैं, ऐसे ही कुटुम्बी भी आपके नहीं हैं । अगले जन्म में ये कुटुम्बी न जाने किसके थे । ऐसे ही ये शरीर भी, ये पाँच भूत का जो अभी मिला है यह अगले जन्म में न जाने कहाँ था । तो जैसे आप दूसरों से व्यवहार करते हैं, ऐसे ही शरीर को भी अपना एक कुटुम्बी मानकर इसको खिलाओ-पिलाओ सही, लेकिन इसको मैं मत मानो । ये शरीर तुम नहीं हो । शरीर तुम नहीं हो ऐसा अगर पक्का हो गया- अकामान् च व्रतं सर्वं, अक्रोधात् तीर्थ सेवनं | कामना रहित हो गये, अक्रोध हो गये, तो आपके सब व्रत सिद्ध हो गए, सब तीर्थों का स्नान हो गया ।
दया जप्य क्षमा शुद्धम्, संतोषो धन मेव च ||



 

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