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तात्त्विक

‘मंशा पूरी करते हैं ये मुर्शिद !’


एक सुबह मैं सोनी टी.वी. पर पूज्य बापू जी का सत्संग सुन रहा था। गुरुदेव ने कहाः ‘जो गुटखा या पान मसाला खाते हों, वे हाथ ऊपर करें। मैं शंख बजाऊँगा तो उनका व्यसन छूट जायेगा।’ मैं सादा पान मसाला खाता था। मेरा हाथ अपने आप ऊपर उठ गया और गुरुदेव ने शंख बजा दिया। उस दिन से आज तक मुझे इच्छा ही नहीं हुई की मैं पान मसाला खाऊँ। ऐसी है मेरे गुरुदेव की कृपा !
मेरे भाई की शादी को 18 साल हो गये लेकिन उन्हें संतान नहीं हुई, वे रो रहे थे। मैंने उन्हें कहाः ‘मेरी बेटी को आप गोद ले लो।’ उन्होंने कहा कि ‘आपकी पहली संतान है, इसे आप ही रखो।’ तब मैंने कहाः ‘अब जो बच्चा होगा, वह आप ले लेना।’ फिर मुझे लड़का हुआ जो मैंने उन्हें दे दिया। मुझे एक पंडित जी ने कहा कि ‘तुम्हारी हस्तरेखा के अनुसार तुम्हारे भाग्य में तो दो ही बच्चे हैं, फिर तुमने अपना बच्चा भाई को क्यों दे दिया, मैंने कहाः ‘कोई बात नहीं, मुझे मेरे रब व गुरुदेव पर पूरा भरोसा है।’ मैंने बड़ बादशाह पर कलावा बाँध दिया और प्रार्थना की। जनवरी 2003 में हमें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई।

इस दिलबर को जो दिल से पुकारते है,
उनकी मंशा पूरी करते हैं ये मुर्शिद !

प्रेम अलवाड़ी, दिल्ली फोन न. 7058863
ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 30, अंक 129, सितम्बर 2003
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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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